रविवार, 3 मई 2020

स्वायम्भूव मनु के वंश का वर्णन (अग्निपुराण - अठारहवॉं अध्याय)

अग्निदेव कहते हैं - मुने! स्वायम्भूव मनु से उनकी तपस्विनी भार्या शतरुपा ने प्रियव्रत और उत्तानपाद नामक दो पुत्र और एक सुन्दर कन्या उत्पन्न की। वह कमनीया कन्या (देवहूति) कर्दम ऋषि की भार्या हुई।

राजा प्रियव्र्त से सम्राट कुक्षि और विराट नामक सामर्थ्यशाली पुत्र उत्पन्न हुए।

उत्तानपाद से सुरुचि के गर्भ से उत्तम नामक पुत्र उत्पन्न हुआ और सुनिती के गर्भ से ध्रुव का जन्म हुआ। हे मुने! कुमार ध्रुव ने सुन्दर कीर्ति बढाने के लिए तीन हजार दिव्य वर्षों तक तप किया। (श्रीमद्भागवत के वर्णानुसार ध्रुव केवल छ: मास तपस्या करके सिद्धि के भागी हुए थे। अग्निपुराण में तपस्या काल बहुत अधिक कहा गया है। कल्पभेद से दोनों ही वर्णन संगत हो सकते हैं।) उस पर भगवान विष्णु ने उसे सप्तर्षियों के आगे स्थिर स्थान (ध्रुवपद) दिया। ध्रुव के इस अभ्युदय को देखकर शुक्राचार्य ने उनके सुयश का सूचक यह श्लोक पढा - "अहो! इस ध्रुव के तपस्या का कितना प्रभाव है, इसका शास्त्र - ज्ञान कितना अद्भुत है, जिसे आज सप्तर्षि भी आगे करके स्थित हैं।" उस ध्रुव से उनकी पत्नी शम्भु ने श्लिष्टि और भव्य नामक पुत्र उत्पन्न किये।

श्लिष्टि से उसकी पत्नी सुच्छाया ने क्रमश: रिपु, रिपुंजय, पुष्य, वृकल और वृकतेजा - इन पॉंच निष्पाप पुत्रों को अपने गर्भ में धारण किया। रिपु से बृहती ने चाक्षुष और सर्वतेजा को अपने गर्भ में स्थान दिया।।१-७।।

चाक्षुष ने वीरण प्रजापति की कन्या पुष्करिणी के गर्भ से मनु को जन्म दिया।

मनु से नड्वला के गर्भ से दस उत्तम पुत्र उत्पन्न हुए। उनके नाम क्रमश: उरु, पुरु, शतद्द्युम्न, तपस्वी, सत्यवाक, कवि, अग्निष्टुत, अतिरात्र, सुद्द्युम्न और अभिमन्यु हैं।

उरु के अंश से आग्नेयी ने अङ्ग, सुमना, स्वाति, क्रतु, अङ्गिरा और गय नामक छ: पुत्र उत्पन्न किये।

अङ्ग से सुनिथा ने एक ही संतान वेन को जन्म दिया। वह प्रजाओ की रक्षा न करके सदा पाप में ही लगा रहता था। उसे मुनियों ने कुशों से ही मार डाला। तदनन्तर ऋषियों ने संतान के लिए वेन के दायें हाथ का मंथन किया। हाथ का मन्थन करने से राजा पृथु प्रकट हुए। उन्हें देखकर मुनियों ने कहा - " ये महान तेजस्वी राजा अवश्य ही समस्त प्रजा को आनन्दित करेंगे तथा महान यश प्राप्त करेंगे।" क्षत्रिय वंश के पूर्वज वेन कुमार राजा पृथु अपने तेज से सबको दग्ध करते हुए - से धनुष और कवच धारण किये हुए ही प्रकट हुए थे; वे सम्पूर्ण प्रजा की रक्षा करने लगे।।८-१४।।

राजसूय यज्ञ में दीक्षित होनेवाले नरेशों में वे सबसे पहले भूपाल थे। उनके दो पुत्र हुए। स्तुति कर्म में निपुण अद्भुत कर्मा सूत और मागधों ने उनका स्तवन किया। वे प्रजाओ का रंजन करने के कारण "राजा" नाम से विख्यात हुए। उन्होंने प्रजाओ के जीवन - रक्षा के निमित्त अन्न की उपज बढाने के लिए गोरुप धारिणी पृथ्वी का दोहण किया। उस समय एक साथ ही देवता, मुनिवृन्द, गन्धर्व, अप्सरागण, पितर, दानव, सर्प, लता, पर्वत और मनुष्यों आदि के द्वारा अपने - अपने विभिन्न पात्रों में दुही जानेवाली पृथ्वी ने सबको इच्छानुसार दुध दिया, जिससे सबने प्राण धारण किये। पृथु के जो दो धर्मज्ञ पुत्र उत्पन्न हुए, उनके नाम अन्तर्धि और पालित थे।

अनर्धि के अंश से उनकी शिखण्डिनी नामवाली पत्नि ने हविर्धान को जन्म दिया।

अग्निकुमारी घिषणा ने हविर्धान के अंश से छ: पुत्रों को उत्पन्न किया। उनके नाम क्रमश: प्राचिनबर्हिष, शुक्र, गय, कृष्ण, व्रज और अजिन थे।

राजा प्राचीनबर्हिष सदैव यज्ञ में ही लगे रहते थे, जिससे उस समय पृथ्वी पर दूर - दूर तक पूर्वाग्र कुश फैल गये थे। इससे वे ऐश्वर्यशाली राजा "प्राचीनबर्हिष" नाम से विख्यात हुए। वे एक महान प्रजापति थे।।१५-२१।।

प्राचीनबर्हिष से उनकी पत्नी समुद्र - कन्या सवर्णा ने दस पुत्रों को अपने गर्भ में धारण किया। वे सभी 'प्र्चेता' नाम से प्रसिद्ध हुए और सब के सब धनुर्वेद में पारंगत थे। वे एक समान धर्म का पालन करते हुए समुद्र के जल में रहकर दस हजार वर्षो तक महान तप में लगे रहे। अन्त में भगवान विष्णु से प्रजापति होने का वरदान पाकर वे संतुष्ट हो जल से बाहर निकले। उस समय प्राय: समस्त भूमण्डल और आकाश बड़े - बड़े सघन वृक्षों से व्याप्त हो गया था। यह देख उन्होंने अपने मुख से प्रकट अग्नि और वायु के द्वारा सब वृक्षों को जला दिया। तब वृक्षों का यह संहार देख राजा सोम इन प्रचेताओ के पास जाकर बोले - "आप लोग अपना कोप शान्त करें; ये वृक्षगण आपको एक "मारिषा" नामवाली सुन्दर कन्या अर्पण करेंगे। यह कन्या तपस्वी मुनि कण्डु के अंश से प्रम्लोचा अप्सरा गर्भ से(स्वेद-बिन्दु के रुप में) प्रकट हुई है। मैं ने ही भविष्य की बातें जानकर इसे कन्या रूप में पाला पोसा है। इसके गर्भ से दक्ष उत्पन्न होंगे, जो प्रजा की वृद्धि करेंगे"।।२२-२७।।

प्रचेताओ ने उस कन्या को ग्रहण किया। तत्पश्चात उसके गर्भ से दक्ष उत्पन्न हुए। दक्ष ने चर, अचर, द्विपद और चतुष्पद आदि प्राणियों की मानसिक सृष्टि करके अन्तमें बहुत सी स्त्रियों को उत्पन्न किया। उनमें से दस को तो उन्होंने धर्मराज को अर्पण किया और तेरह कन्याएँ कश्यप को दीं। सत्ताईस कन्याएँ चन्द्रमा को, चार अरिष्टनेमि को, दो बहुपुत्र को और दो कन्याएँ अङ्गिरा को दीं। पूर्वकाल में मानसिक संकल्प से सृष्टि होती थी। उसके बाद उन द्क्ष कन्याओ से मैथुन द्वारा देवता और नाग आदि प्रकट हुए।

अब मैं धर्मराज से उनकी दस पत्नियों के गर्भ से जो संतानें हुई, उस धर्मसर्ग का वर्णन करूँगा। विश्वा नामवाली पत्नी से विश्वेदेव प्रकट हुए। साध्या ने साध्यों को जन्म दिया। मरुत्वती से मरूत्वान और वसु से वसुगण प्रकट हुए। भानु से भानु और मुहूर्ता से मुहूर्त नामक पुत्र उत्पन्न हुए। धर्मराज के द्वारा लम्बा से घोष नामक पुत्र हुआ और यामि नामक पत्नी से नागवीथी नामवाली कन्या उत्पन्न हुई। पृथ्वी का सम्पूर्ण विषय़ भी मरूत्वती से ही प्रकट हुआ। संकल्पा के गर्भ से संकल्पों की सृष्टि हुई। चन्द्र्मा से उनकी नक्षत्र रूपिणी पत्नियों के गर्भ से आठ पुत्र उत्पन्न हुए।।२८-३४।।

उनके नाम ये हैं - आप, ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्युष और प्रभास - ये आठ वसु हैं।

आप के वैतण्ड्य, श्रम, शान्त और मुनि नामक पुत्र हुए.। ध्रुव का पुत्र लोकान्तकारी काल हुआ और सोम का पुत्र वर्चा हुआ। धर की पत्नी मनोहरा के गर्भ से द्रविण, हुतह्व्यवह, शिशिर, प्राण और रमण उत्पन्न हुए। अनल का पुत्र पुरोजव और अनल (अग्नि) क अविज्ञात था। अग्नि का पुत्र कुमार हुआ, जो संरकंडों की ढेरी पर उत्पन्न हुआ। उसके पीछे शाख, विशाख और नैगमेय नामक पुत्र हुए। कुमार कृत्तिका के गर्भ से उत्पन्न होने के कारण 'कार्तिकेय' कहलाये तथा कृत्तिका के दुसरे पुत्र सनत्कुमार नामक यति हुए। प्रत्युष से देवल का जन्म हुआ तथा प्रभास से विश्वकर्मा का। ये विश्वकर्मा देवताओ के बढई थे और हजारों प्रकार के शिल्पकारी का काम करते थे। उनके ही निर्माण किये हुए शिल्प और भूषण आदि के सहारे आज भी मनुष्य अपनी जिवीका चलाते हैं।

सुरभी ने कश्यपजी के अंश से ग्यारह रूद्रों को उत्पन्न किया तथा हे साधुश्रेष्ठ! सती ने अपनी तपस्या एवं महादेवजी के अनुग्रह से चार पुत्र उत्पन्न किये। उनके नाम अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य, त्वष्टा और रूद्र हैं। त्वष्टा के पुत्र महायशस्वी श्रीमान विश्वरुप हुए। हर, बहुरूप, त्र्यम्बक, अपराजित, वृषाकपि, शम्भू, कपर्दी, रैवत, मृगव्याध, सर्प और कपाली - ये ग्यारह रूद्र प्रधान हैं। यों तो सैकड़ो - लाखों रूद्र हैं, जिनसे यह चराचर जगत व्याप्त है।।३५-४५।।

बुधवार, 29 अप्रैल 2020

विश्व के सृष्टि का वर्णन (अग्निपुराण - सत्रहवॉं अध्याय)

अग्निदेव कहते हैं - ब्र्ह्मन! मैं जगत की सृष्टि का, जो श्रीहरि की लीला मात्र है, वर्णन करूँगा। श्रीहरि ही स्वर्ग आदि के रचयिता हैं। सृष्टि और प्रलय आदि उन्हीं के स्वरुप हैं। सृष्टि के आदिकारण भी वे ही हैं। सबसे पहले सत्यस्वरुप अव्यक्त ब्र्ह्म ही था; उस समय न तो आकाश था और न ही दिन - रात आदि का ही विभाग था। तदनन्तर सृष्टि काल में परम परुष श्रीहरि विष्णु ने प्रकृति में प्रवेश करके उसे विकृत कर दिया। फिर प्रकृति से मह्त्तत्व और उससे अहंकार प्रकट हुआ।

अहंकार तीन प्रकार का है - वैकारिक (सात्त्विक), तैजस (राजस), भूतादिरूप (तामस)। तामस अहंकार से शब्द - तन्मात्रा वाला आकाश उत्पन्न हुआ। आकाश से स्पर्श - तन्मात्रा वाले वायु का प्रादुर्भाव हुआ। वायु से रूप - तन्मात्रा वाले अग्नितत्व प्रकट हुआ। अग्नि से रस - तन्मात्रा वाले जल की उत्पति हुई और जल से गन्ध - तन्मात्रा वाली भूमि का प्रादुर्भाव हुआ। यह सब तामस अहंकार से होने वाली सृष्टि है।

इन्द्रियॉं तैजस अर्थात राजस अहंकार से प्रकट हुई हैं। दस इन्द्रियों के अधिष्ठाता दस देवता और ग्यारहवीं इन्द्रिय मन - ये वैकारिक अर्थात सात्त्विक अहंकार की सृष्टि हैं। तत्पश्चात नाना प्रकार की प्रजा को उत्पन्न करने की इच्छा रखने वाले भगवान स्वयंभू ने सबसे पहले जल की ही सृष्टि की और उसमें अपने शक्ति (वीर्य) का आधान किया। जल को "नार" कहा गया है; क्योकि वह नर से उत्पन्न हुआ है। "नार" (जल) ही पूर्वकाल में भगवान का "अयन" (निवास स्थान) था; इसलिए भगवान को "नारायण" कहा गया है।।१-७।।

स्वयंभू श्रीहरि ने जो वीर्य स्थापित किया था, वह सुवर्णमय अण्ड के रूप में प्रकट हुआ। उसमें साक्षात स्वयंभू भगवान ब्र्ह्माजी प्रकट हुए, ऐसा हमने सुना है। भगवान हिरण्यगर्भ ने एक वर्ष तक उस अण्ड के भीतर निवास करके उसके दो भाग किये। एक का नाम "द्द्युलोक" और दुसरे का "भूलोक"। उन दोनों अण्ड - खण्डों के बीच में उन्होंने "आकाश" की सृष्टि की। जल के ऊपर तैरती हुई पृथ्वी को रखा और दसों दिशाओ के विभाग किये। फिर सृष्टि की इच्छावाले प्रजापति ने वहॉं काल, मन, वाणी, काम, क्रोध तथा रति आदि की तत्तदरूप से सृष्टि की। उन्होंने आदि में विद्द्युत, वज्र, मेघ, रोहित, इन्द्र्धनुष, पक्षियों तथा पर्जन्य का निर्माण किया। तत्पश्चात यज्ञ की सिद्धि के लिए मुख से ऋक, यजु और सामवेद को प्रकट किया। उनके द्वारा साध्यगणों ने देवताओ का यजन किया। फिर ब्र्ह्माजी ने अपनी भुजा से छोटे - बड़े भूतों को उत्पन्न किया, सनतकुमार की उत्पति की तथा क्रोध से प्रकट होने वाले रूद्र को जन्म दिया। मरिचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्र्तु और वशिष्ठ - इन सात ब्र्ह्मपुत्रों को ब्र्ह्माजी ने निश्चय ही अपने मन से प्रकट किया। साधुश्रेष्ठ! ये तथा रूद्रगण प्रजावर्ग की सृष्टि करते हैं।

ब्र्ह्माजी ने अपने शरीर के दो भाग किये। आधे भाग से वे पुरुष हुए और आधे से स्त्री बन गये; फिर उस नारी के गर्भ से उन्होंने प्रजाओ की सृष्टि की। ये ही स्वयंभूव मनु तथा शतरुपा के नाम से प्र्सिद्ध हुए। इनसे ही मानवीय सृष्टि हुई।।८-१७।।

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शनिवार, 18 अप्रैल 2020

बुद्ध और कल्कि अवतारों की कथा (अग्निपुराण - सोलहवॉं अध्याय)

अग्निदेव कहते हैं - अब मैं बुद्धावतार का वर्णन करूँगा, जो पढ्ने और सुननेवालों के मनोरथ को सिद्ध करने वाला है। पूर्वकाल में देवता और असुरों में घोर संग्राम हुआ। उसमें दैत्यों ने देवताओ को परास्त कर दिया। तब देवतालोग त्राहि - त्राहि पुकारते हुए भगवान की शरण में गये। भगवान मायामोहमय रुप में आकर राजा शुद्धोदन के पुत्र हुए। उन्होंने दैत्यों को मोहित किया और उनसे वैदिक धर्म का परित्याग करा दिया। वे बुद्ध के अनुयायी दैत्य "बौद्ध" कहलाये। फिर उन्होंने दुसरे लोगों से बौद्ध धर्म का त्याग करवाया। इसके बाद माया - मोह ही "आर्ह्त" रुप में प्रकट हुआ। उसने दुसरे लोगों को भी "आर्ह्त" बनाया। इस प्रकार उनके अनुयायी वेद - धर्म से वञ्चित होकर पाखण्डी बन गये। उन्होंने नरक में ले जाने वाले कर्म करना आरम्भ कर दिया। वे सब के सब वर्णशंकर होंगे और नीच पुरुषों से दान लेंगें। इतना ही नहीं, वे लोग डाकू और दुराचारी भी होंगे। वाजसनेय मात्र ही "वेद" कहलायेगा। वेद की द्स - पॉंच शाखाऍं ही प्रमाणभूत मानी जायँगी। धर्म का चोला पहने हुए सब लोग अधर्म में ही रुचि रखने वाले होंगे। राजारुपधारी म्लेच्छ मनुष्यों का ही भक्षण करेंगें।।१-७।।

तदनन्तर भगवान कल्कि प्रकट होंगें। वे श्रीविष्णुयशा के पुत्र रूप से अवतीर्ण हो याज्ञवल्क्य को अपना पुरोहित बनायेंगें। उन्हें अस्त्र - शस्त्र विद्या का पूर्ण परिज्ञान होगा। वे हाथ में अस्त्र - शस्त्र लेकर म्लेच्छों का संहार कर डालेंगें तथा चारों वर्णों और समस्त आश्रमों में शास्त्रीय मर्यादा स्थापित करेंगें। समस्त प्रजा को धर्म के उत्तम मार्ग में लगायेंगे। उसके बाद श्रीहरि कल्कि रुप का परित्याग करके अपने धाम में चले जायेंगे। फिर तो पूर्ववत सतयुग का साम्राज्य होगा। साधुश्रेष्ठ! सभी वर्ण और आश्रम के लोग अपने - अपने धर्म में दृढ्तापूर्वक लग जायेंगे। इस प्रकार सभी कल्पों तथा मन्वन्तरों में श्रीहरि के अवतार होते हैं। उनमें से कुछ हो चुके, कुछ आगे होनेवाले हैं; उन सबकी कोई नियत संख्या नहीं है। जो मनुष्य श्रीविष्णु के अंशावतार तथा पूर्णावतार सहित दस अवतारों के पाठ अथवा श्रवण करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओ को प्राप्त कर लेता है तथा निर्मल ह्र्दय होकर परिवार सहित स्वर्ग को जाता है। इस प्रकार अवतार लेकर श्रीहरि धर्म की व्यवस्था और अधर्म का निराकरण करते हैं। वे ही जगत की सृष्टि आदि के कारण हैं।।८-१४।।

यदुकूल का संहार और पाण्डवों का स्वर्गगमन (अग्निपुराण - पन्द्रहवॉं अध्याय)

अग्निदेव कहते हैं - ब्रह्मन! जब युद्धिष्ठिर राजसिंहासन पर विराजमान हो गये, तब धृतराष्ट्र गृहस्थ - आश्रम से वानप्रस्थ - आश्रम में प्रविष्ट हो वन में चले गये। उनके साथ देवी गान्धारी और कुन्ती भी थी। विदुरजी दावानल से दग्ध हो स्वर्ग सिधारे। इस प्रकार भगवान श्रीविष्णु ने पृथ्वी का भार उतारा और धर्म की स्थापना तथा अधर्म का नाश करने के लिए पाण्डवों को निमित्त बनाकर दानव - दैत्य आदि का संहार किया। तत्पश्चात भूमि का भार बढाने वाले यादवकूल का भी ब्राह्मणों के शाप के बहाने मूसल के द्वारा संहार कर डाला। अनिरूद्ध के पुत्र वज्र को राजा के पद पर अभिशिक्त किया। तदनन्तर देवताओ के अनुरोध से प्रभास क्षेत्र में श्रीहरि स्वयं ही स्थूल शरीर की लीला का संवरण करके अपने धाम को पधारे।।१-४।।

वे इन्द्रलोक और ब्र्ह्मलोक में स्वर्गवासी देवताओ द्वारा पूजित होते हैं। बलभद्रजी शेषनाग के स्वरूप थे; अत: उन्होंने पातालरूपी स्वर्ग का आश्रय लिया। अविनाशी भगवान श्रीहरि ध्यानी पुरूषों के ध्येय है। उनके अन्तर्धान हो जानेपर समुद्र ने उनकी निजी निवास स्थान को छोड़कर शेष द्वारकापुरी को जल में डुबा दिया।

अर्जुन ने मरे हुए यादवों का दाह संस्कार करके उनके लिए जलाञ्जलि दी और धन आदि का दान किया। भगवान श्रीकृष्ण की रानियों को, जो पहले अप्सराएँ और अष्टावक्र के शाप से मानवीरूप में प्रकट हुईं थीं, लेकर ह्स्तिनापुर को चले। मार्ग मे डंडे लिए हुए ग्वालों ने अर्जुन का तिरस्कार करके उन सबको छीन लिया। यह भी अष्टावक्र के शाप से ही सम्भव हुआ था। इससे अर्जुन के मन में बड़ा शोक हुआ। फिर महर्षि व्यास के सान्त्वना देने पर उन्हें यह निश्चय हुआ कि 'भगवान श्रीकृष्ण के समीप रहने से ही मुझमें बल था।' हस्तिनापुर में आकर उन्होंने भाइयों सहित राजा युद्धिष्ठिर से, जो उस समय प्रजावर्ग का पालन करते थे, यह सब समाचार निवेदन किया। वे बोले - 'भैया! वही धनुष है, वे ही बाण हैं, वही रथ हैं और वही घोड़े हैं; किन्तु भगवान श्रीकृष्ण के बिना सब कुछ उसी प्रकार नष्ट हो गया, जैसे अश्रोत्रिय को दिया हुआ दान।' यह सुनकर धर्मराज युद्धिष्टिर ने राज्य सिंहासन पर परीक्षित को स्थापित कर दिया।।५-११।।

इसके बाद बुद्धिमान राजा संसार की अनित्यता का विचार करके द्रौपदी तथा भाईयों को साथ लेकर महाप्रस्थान के पथ पर अग्रसर हुए। मार्ग में वे श्रीहरि के अष्टोत्तरशत नामों का जाप करते हुए यात्रा करते थे। उस महापथ में क्रमश: द्रौपदी, सहदेव, नकुल, अर्जुन और भीमसेन एक - एक करके गिर पड़े। इससे राजा शोकमग्न हो गये। तदनन्तर वे इन्द्र के द्वारा लाये हुए रथ पर आरूढ हो भाइयों सहित स्वर्ग को चले गये। वहॉं उन्होंने दुर्योधन सहित धृतराष्ट्र पुत्रों को देखा। तदनन्तर, उनपर कृपा करने के लिए अपने धाम से पधारे हुए भगवान वासुदेव का भी दर्शन किया। इससे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई.। यह तुम्हें मैं ने महाभारत का प्रसंग सुनाया है। जो इसका पाठ करेगा, वह स्वर्गलोक में सम्मानित होगा।।१२-१५।।

शुक्रवार, 17 अप्रैल 2020

महाभारत के युद्ध का परिणाम (अग्निपुराण - चौदहवॉं अध्याय)

अग्निदेव कहते हैं - युधिष्ठिर और दुर्योधन की सेनाएँ कुरुक्षेत्र के मैदान में जा डटीं। अपने विपक्ष में पितामह भीष्म तथा आचार्य द्रोण आदि गुरूजनों को देखकर अर्जुन युद्ध से विरत हो गये, तब भगवान श्रीकृष्ण ने कहा - " पार्थ! भीष्म आदि गुरूजन शोक के योग नहीं हैं। मनुष्य का शरीर विनाशशील है; किन्तु आत्मा का कभी नाश नही होता। यह आत्मा परब्रह्म है। " मैं ब्रह्म हूँ" - इस प्रकार तुम उस आत्मा को समझो। कार्य की सिद्धि या असिद्धि में समान भाव से रहकर कर्मयोग का आश्रय ले क्षात्रधर्म का पालन करो।" श्रीकृष्ण के ऐसा कहने पर अर्जुन रथारुढ़ हो युद्ध में प्रवृत्त हुए। उन्होंने शंङ्खध्वनि की। दुर्योधन की सेना में पहले पितामह भीष्म सेनापति हुए। पाण्डवों के सेनापति शिखण्डी थे। इन दोनों में भारी युद्ध छिड़ गया। भीष्म सहित कौरव पक्ष के योद्धा उस युद्ध में पाण्डव पक्ष के सैनिकों पर प्रहार करने लगे और शिखण्डी आदि पाण्डव पक्ष के वीर कौरव सैनिकों को अपने बाणों का निशाना बनाने लगे। कौरवों और पाण्डवों का वह युद्ध, देवासुर - संग्राम के समान जान पड़ता था। आकाश में खड़े होकर देखनेवाले देवताओ को वह युद्ध बड़ा आनन्ददायक प्रतीत हो रहा था। भीष्म ने दस दिनों तक युद्ध करके पाण्डवों के अधिकांश सेना को अपने बाणों से मार गिराया।।१ - ७।।


दसवें दिन अर्जुन ने वीरवर भीष्म पर बाणों की भारी वृष्टि की। उधर द्रुपद की प्रेरणा से शिखण्डी ने भी पानी बरसाने वाले मेघ की भॉंति भीष्म पर बाणों की झड़ी लगा दी। दोनों ओर के हाथीसवार, घुड़सवार, रथी और पैदल एक - दुसरे के बाणों से मारे गये। भीष्म की मृत्यु उनकी इच्छा के अधीन थी। उन्होने युद्ध का मार्ग दिखाकर वसु देवता के कहने पर वसुलोक में जाने की तैयारी की और बाणशय्या पर सो रहे। वे उत्तरायण की प्रतीक्षा में भगवान श्रीविष्णु का ध्यान और स्तवन करते हुए समय व्यतीत करने लगे। भीष्म के बाण- शय्या पर गिर जाने के बाद जब दुर्योधन शोक से व्याकुल हो उठा, तब आचार्य द्रोण ने सेनापतित्व का भार ग्रहण किया। उधर हर्ष मनाती हुई पाण्डवों की सेना में धृष्ट्द्द्युम्न सेनापति हुए। उन दोनों में बड़ा भयंकर युद्ध हुआ, जो यमलोक की आबादी बढाने वाला था। विराट और द्रुपद आदि राजा द्रोणरूपी समुद्र में डुब गये। हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिकों से युक्त दुर्योधन की विशाल वाहिनी धृष्ट्द्द्युम्न के हाथ से मारी जाने लगी। उस समय द्रोण काल के समान जान पड़ते थे। इतने में ही उनके कानों में यह आवाज आयी की 'अश्वत्थामा मारा गया'। इतना सुनते ही आचार्य द्रोण ने अस्त्र - शस्त्र त्याग दिये। ऐसे समय में धृष्ट्द्द्युम्न के बाणों से आहत होकर वे पृथ्वी पर गिर पड़े।।८ - १४।।

द्रोण बड़े दुर्धर्ष थे। वे सम्पूर्ण क्षत्रियों का विनाश करके पॉंचवें दिन मारे गये। दुर्योधन पुन: शोक से आतुर हो उठा। उस समय कर्ण उसके सेना का कर्णधार हुआ। पाण्ड्व सेना का आधिपत्य अर्जुन को मिला। कर्ण और अर्जुन में भॉंति - भॉंति केअस्त्र - शस्त्रों की मार - काट से युक्त महाभयानक युद्ध हुआ, जो देवासुर संग्राम को भी मात करनेवाला था। कर्ण और अर्जुन के संग्राम में कर्ण ने अपने बाणों से शत्रु पक्ष के बहुत से वीरों का संहार कर डाला; किन्तु दुसरे दिन अर्जुन ने उसे मार गिराया।।१५ - १७।।

तदनन्तर राजा शल्य कौरव सेना के सेनापति हुए; किंतु वे युद्ध में आधे दिन तक ही टिक सके। दोपहर होते - होते राजा युद्धिष्ठिर ने उन्हें मार गिराया। दुर्योधन की प्राय: सारी सेना युद्ध में मारी गयी थी। अन्ततोगत्वा उसका भीमसेन के साथ युद्ध हुआ। उसने पाण्ड्व - पक्ष के पैदल आदि बहुत से सैनिकों का भीमसेन पर धावा किया। उस समय गदा से प्रहार करते हुए दुर्योधन को भीमसेन ने मौत के घाट उतार दिया। दुर्योधन के अन्य छोटे भाई भी भीमसेन के हाथ से ही मारे गये थे।

महाभारत संग्राम के उस अठारहवें दिन रात्री काल में महाबली अश्वत्मा ने पाण्ड्वों की सोयी हुई एक अक्षौहिणी सेना को सदा के लिए सुला दिया। उसने द्रौपदी के पॉंचों पुत्रों, उसके पाञ्चाल देशीय बन्धुओ तथा धृष्ट्द्द्युम्न को भी जीवित नहीं छोड़ा। द्रौपदी पुत्रहीन होकर रोने - बिलखने लगी। तब अर्जुन ने सींक के अस्त्र से अश्वत्मा को परास्त करके उसकी मणि निकाल ली। उसे मारा जाता देख द्रौपदी ने ही अनुनय - विनय करके उसके प्राण बचाये।।१८-२२।।

इतने पर भी दुष्ट अश्वत्मा ने उत्तरा के गर्भ को नष्ट करने के लिए उस पर अस्त्र का प्रयोग किया। वह गर्भ उसके प्रहार से प्राय: दग्ध हो गया था; किंतु भगवान श्रीकृष्ण ने उसको पुन: जीवन - दान दिया। उत्तरा का वही गर्भस्थ शिशु आगे चलकर राजा परीक्षित के नाम से विख्यात हुआ।

कृतवर्मा, कृपाचार्य तथा अश्वत्मा - ये तीन कौरव पक्षीय वीर उस संग्राम से जीवित बचे। दूसरी ओर पॉंच पाण्डव, सात्यकि तथा भगवान श्रीकृष्ण - ये सात ही जीवित रह सके; दुसरे कोई नहीं बचे।

उस समय सब ओर अनाथा स्त्रीयों का आर्तनाद वयाप्त हो रहा था। भीमसेन आदि भाईयों के साथ जाकर युद्धिष्ठिर ने उन्हें सात्वना दी तथा रणभूमि में मारे गये सभी वीरों का दाह - संस्कार करके उनके लिए जलाञ्जलि दे धन आदि का दान किया।

तत्पश्चात कुरुक्षेत्र में शरशय्यापर आसीन शान्तनुनन्दन भीष्म के पास जाकर युद्धिष्ठिर ने उनसे समस्त शान्तिदायक धर्म, राजधर्म, मोक्षधर्म तथा दानधर्म की बातें सुनीं। फिर वे राजसिंहासन पर आसीन हुए। इसके बाद उस शत्रुमर्दन राजा ने अश्वमेध - यज्ञ करके उसमें ब्राह्मणों को बहुत धन दान किया। तदनन्तर द्वारका से लौटे हुए अर्जुन के मुख से मूसलकाण्ड के कारण प्राप्त हुए शाप से पारस्परिक युद्ध द्वारा यादवों के संहार का समाचार सुनकर युद्धिष्ठिर ने परीक्षीत को राजासन पर बिठाया और स्वयं भाईयों के साथ महाप्रस्थान कर स्वर्गलोक को चले गये।।२३-२७।।


मंगलवार, 14 अप्रैल 2020

महाभारत की संक्षिप्त कथा (अग्निपुराण - तेरहवॉं अध्याय)

अग्निदेव कहते है - अब मैं श्रीकृष्ण की महिमा को लक्षित करने वाले महाभारत का उपाख्यान सुनाता हूँ , जिसमें श्रीहरि ने पाण्ड्वों को निमित्त बनाकर इस पृथ्वी का भार उतारा था। भगवान श्रीविष्णु के नाभिकमल से ब्रह्माजी उत्पन्न हुए। ब्रह्माजी से अत्रि, अत्रि से चन्द्र्मा, चन्द्र्मा से बुध और बुध से इलानन्दन पुरूरवा का जन्म हुआ। पुरुरवा से आयु, आयु से राजा नहुष और नहुष से ययाति उत्पन्न हुए। ययाति से पुरू हुए। पूरू के वंश में भरत और भरत के कुल में राजा कुरू हुए। कुरू के वंश में शान्तनु का जन्म हुआ। शान्तनु से गङ्गानन्दन भीष्म उत्पन्न हुए। उनके दो छोटे भाई और थे - चित्राङ्गद और विचित्रवीर्य। ये शान्तनु से सत्यवती के गर्भ से उत्पन्न हुए थे। शान्तनु के स्वर्ग चले जाने पर भीष्म ने अविवाहित रहकर अपने भाई विचित्रवीर्य के राज्य का पालन किया। चित्राङ्गद बाल्यावस्था में ही चित्राङ्गद नामक गन्धर्व के द्वारा गये। फिर भीष्म संग्राम में विपक्षी को परास्त करके काशिराज की दो कन्याओ - अम्बिका और अम्बालिका को हर लाये। वे दोनों विचित्रवीर्य की भार्याऍं हुईं।

कुछ समय के पश्चात राजा विचित्रवीर्य राजयक्ष्मा से ग्रस्त हो स्वर्गवासी हो गये। तब सत्यवती के अनुमति से व्यासजी के द्वारा अम्बिका के गर्भ से धृतराष्ट्र और अम्बालिका के गर्भ से पाण्डू उत्पन्न हुए। धृतराष्ट्र ने गान्धारी के गर्भ से सौ पुत्रों को जन्म दिया, जिनमें दुर्योधन सबसे बड़ा था।।१-८।।

राजा पाण्डू वन में रहते थे। वे एक ऋषि के शापवश शतश्रङ्ग मुनि के आश्रम के पास स्त्री समागम के कारण मृत्यु को प्राप्त हुए। इसलिए आज्ञा के अनुसार कुन्ती के गर्भ से धर्म के अंश से युधिष्ठिर का जन्म हुआ। वायु से भीम और इन्द्र से अर्जुन उत्पन्न हुए। पाण्डू की दुसरी पत्नी माद्री के गर्भ से अश्विनीकुमारों के अंश से नकुल - सहदेव का जन्म हुआ। शापवश एक दिन माद्री के साथ सम्भोग होने से पाण्डू की मृत्यू हो गयी और माद्री भी उनके साथ सती हो गयी।

जब कुन्ती का विवाह नही हुआ था, उसी समय सूर्य के अंश से कर्ण का जन्म हुआ था। वह दूर्योधन के आश्रय में रहता था। दैवयोग से कौरवों और पाण्डवों में वैर की आग प्रज्वलित हो उठी। दुर्योधन बहुत खोटी बुद्धि का मनुष्य था। उसने लाक्षा से बने हुए घर में पाण्ड्वों को रखकर आग लगाकर उन्हें जलाने का प्रयत्न किया; किंतु पॉंचो पाण्डव अपनी माता के साथ उस जलते हुए घर से बाहर निकल गये। वहॉं से एकचक्रा नगरी में जाकर वे मुनि के वेश में एक ब्राह्मण के घर में निवास करने लगे। फिर बक नामक राक्षस का वध करके वे पाञ्चाल राज्य में, जहॉं द्रौपदी का स्वयंवर होने वाला था, गये। वहॉं अर्जुन के बाहुबल से मत्स्यभेद होने पर, पाण्डवों ने द्रौपदी को पत्नी रूप में प्राप्त किया। तत्पश्चात दुर्योधन आदि को उनके जीवित होने का पता चलने पर उन्होंने कौरवों से अपना आधा राज्य भी प्राप्त कर लिया। अर्जून अग्निदेव से दिव्य गाण्डीव धनुष और उत्तम रथ प्राप्त किया था। उन्हें युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण जैसे सारथि मिले थे तथा उन्होंने आचार्य द्रोण से ब्रह्मास्त्र आदि दिव्य आयुध और कभी नष्ट न होने वाले बाण प्राप्त किये थे। सभी पाण्डव सब प्रकार की विद्याओं में प्रवीण थे।।९-१६।।

पाण्डुकुमार अर्जुन ने श्रीकृष्ण के साथ खाण्डव वन में इन्द्र के द्वारा की हुई वृष्टि का अपने बाणों की छ्त्राकार बान्ध से निवारण करते हुए अग्नि को तृप्त किया था। पाण्डवों ने सम्पूर्ण दिशाओ पर विजय पायी। युद्धिष्ठिर राज्य करने लगे। उन्होंने प्रचूर स्वर्णराशि से परिपूर्ण राजसूय यज्ञ का अनुष्ठान किया। उनका यह वैभव दुर्योधन के लिए असह्य हो गया। उसने अपने भाई दु:शासन वैभव प्राप्त सुह्रद कर्ण के कहने से शकुनि को साथ ले, द्द्यूत सभा में जूए में प्रवृत होकर, युद्धिष्ठिर और उनके राज्य को कपट - द्द्यूत के द्वारा हँसते - हँसते जीत लिया। जूए में परास्त होकर युद्धिष्ठिर अपने भाईयों के साथ वन में चले गये। वहॉं उन्होंने अपने प्रतिज्ञा के अनुसार बारह वर्ष व्यतीत किये। वे वन में पहले ही की भॉंति प्रतिदिन बहुसंख्यक ब्राह्मणों को भोजन कराते थे। एक दिन उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से अठासी - हजार द्विजों सहित दुर्वासा को परितृप्त किया। वहॉं उनके साथ उनकी पत्नी द्रौपदी तथा पूरोहित धौम्यजी भी थे।

बारहवॉं वर्ष बीतने पर वे विराट नगर में गये। वहॉं युधिष्ठिर सबसे अपरिचित रहकर "कङ्क" नामक ब्राह्मण के रूप में रहने लगे। भीमसेन रसोइया बने थे। अर्जुन ने अपना नाम "बृहन्नला" रखा था। पाण्डव पत्नी द्रौपदी रनिवास में "सैरन्ध्री" के रूप में रहने लगी। इसी प्रकार नकुल - सहदेव ने भी अपने नाम बदल लिये थे। भीमसेन ने रात्रीकाल में द्रौपदी का सतीत्व हरण करने वाले कीचक को मार डाला। तत्पश्चात कौरव विरात की गौओ को हरकर ले जाने लगे, तब उन्हें अर्जुन ने परास्त किया। उस समय कौरवों ने पाण्डवों को पहचान लिया। श्रीकृष्ण की बहन सुभद्रा ने अर्जुन से अभिमन्यु नामक पुत्र उत्पन्न किया था। उसे राजा विराट ने अपनी कन्या उत्तरा से विवाह किया।।१७-२५।।

धर्मराज युधिष्ठिर सात अक्षौहिणी सेना के स्वामी होकर कौरवों के साथ युद्ध करने को तैयार हुए। पहले भगवान श्रीकृष्ण परम क्रोधी दुर्योधन के पास दूत बनकर गये। उन्होंने ग्यारह अक्षौहिणी सेना के स्वामी राजा दुर्योधन से कहा - ' राजन! तुम युधिष्ठिर को आधा राज्य दे दो या उन्हें पॉंच ही गॉंव अर्पित कर दो; नहीं तो उनके साथ युद्ध करो।' श्रीकृष्ण की बात सुनकर दुर्योधन ने कहा - ' मैं उन्हें सूई की नोक के बराबर भूमि भी नहीं दूंँगा; हॉं, उनसे युद्ध अवश्य करूँगा।' ऐसा कहकर वह भगवान श्रीकृष्ण को बन्दी बनाने के लिए उद्द्त हो गया। उस समय राजसभा में भगवान श्रीकृष्ण ने अपने परम दुर्धर्ष विश्वरुप का दर्शन कराकर दुर्योधन को भयभीत कर दिया। फिर विदुर ने अपने घर ले जाकर भगवान का पूजन और सत्कार किया।

तदनन्तर वे युधिष्ठिर के पास लौट गये और बोले - "महाराज! आप दुर्योधन के साथ युद्ध किजिये"।।२६-२९।।

रविवार, 12 अप्रैल 2020

श्रीकृष्णावतार(हरिवंश) की संक्षिप्त कथा (अग्निपुराण - बारहवॉं अध्याय)

अग्निदेव कहते हैं - श्रीविष्णु के नाभि कमल से ब्रह्मा का प्रादुर्भाव हूआ। ब्रह्माजी से अत्रि, अत्रि से सोम, सोम से बुध एवं बुध से पुरुरवा उत्पन्न हुए। पुरुरवा से आयु, आयु से नहूष तथा नहूष से ययाति का जन्म हुआ। ययाति की पहली पत्नी देवयानि ने यदु और तुर्वसु नामक दो पुत्रों को जन्म दिया। उनकी दूसरी पत्नी शर्मिष्ठा के गर्भ से, जो वृषपर्वा की पुत्री थी, द्रुह्यु, अनु और पुरु - ये तीन पुत्र उत्पन्न हुए। यदु के वंश "यादव" नामसे प्रसिद्ध क्षत्रिय हुए। उन सबमें भगवान वासुदेव सर्वश्रेष्ठ थे। परम पुरुष भगवान विष्णु इस पृथ्वी का भार उतारने के लिए वसुदेव और देवकी के पुत्र रूप में प्रकट हुए थे। भगवान विष्णु की प्रेरणा से योग निद्रा ने क्रमशः छः गर्भ, जो पूर्वेजन्म में हिरण्यकशिपु के पुत्र थे, देवकी के उदर में स्थापित किये। सातवें गर्भ के रूप में बलभद्रजी प्रकट हुए थे। ये देवकी से रोहिणी के गर्भ में खींचकर लाये गये थे, इसलिए रोहिणेय कहलाये।

तदनन्तर श्रावण मास के (शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से लेकर कृष्णपक्ष की आमावस्या तक एक मास होता है। इस मान्यता के अनुसार गणना करने पर आज की गणना के अनुसार जो भाद्रपद कृष्ण अष्टमी है वही श्रावण कृष्ण अष्टमी सिद्ध होती है।) कृष्ण पक्ष की अष्टमी को आधी रात के समय चार भुजाधारी भगवान श्रीहरि प्रकट हुए। उस समय देवकी और वसुदेव ने उनका स्तवन किया। फिर वे दो बॉंहों वाले नन्हें से बालक बन गये। वसुदेव कंश के भय से अपने शिशु को यशोदा की शय्या पर पहुँचा दिया और यशोदा की नवजात बालिका को देवकी की शय्या पर लाकर सुला दिया। बच्चे के रोने की आवाज सुनकर कंश आ पहुँचा और देवकी के मना करने पर भी उसने उस बालिका को उठाकर शिला पर पटक दिया। उसने आकाशवाणी से सुन रखा था कि देवकी के आठवें गर्भ से मेरी मृत्यु होगी। इसलिए उसने देवकी के उत्पन्न हुए सभी शिशुओ को मार डाला।।१-९।।

कंश के द्वारा शिला पर पटकी हुई वह बालिका आकाश में उड़ गई और बोली - ' कंश! मुझे पटकने से तुम्हारा क्या लाभ हुआ? जिनके हाथों से तुम्हारा वध होगा वे देवताओ के सर्वस्वभूत भगवान तो इस पृथ्वी का भार उतारने के लिए अवतार ले चुके'।।१०-११।।

ऐसा कहकर वह चली गई। उसी ने देवताओ की प्रार्थना से शुम्भ आदि दैत्यों का वध किया। तब इन्द्र ने इस प्रकार स्तुति की - ' जो आर्या, दुर्गा, वेदगर्भा, अम्बिका, भद्रकाली, भद्रा, क्षेम्या, क्षेमकरी तथा नैकबाहु(अनेक बॉंहोंवाली) आदि नामों से प्रसिद्ध हैं, उन जगदम्बा को मैं नमस्कार करता हूँ।' जो तीनों समय इन नामों का पाठ करता है, उसकी सब कामनाऍं पूर्ण होती है।

उधर कंश ने भी बालिका की बात सुनकर नवजात शिशुओ का वध करने के लिए पूतना आदि को सब ओर भेजा। कंश आदि से डरे हुए वसुदेव ने अपने दोनों पुत्रों की रक्षा के लिए उन्हें गोकुल में यशोदापति नन्दजी को सौप दिया था। वहॉं बलराम और श्रीकृष्ण - दोनों भाई गौओ तथ ग्वालबालों के साथ विचरा करते थे। यद्दपि वे सम्पूर्ण जगत के पालक थे, तो भी व्रज में गो पालक बन कर रहे। एक बार श्रीकृष्ण ऊधम से तंग आकर मैया यशोदा ने उन्हें रस्सी से ऊखल में बॉंध दिया। वे ऊखल घसीटते हुए दो अर्जून - वृक्षों के बीच से निकले। इससे वे दोनों वृक्ष टूटकर गिर पड़े। एक दिन श्रीकृष्ण एक छकड़े के नीचे सो रहे थे। वे माता के स्तनपान करने की इच्छा से अपने पैर फेंक - फेंककर रोने लगे। उनके पैर का हल्का सा आघात लगते ही छकड़ा उलट गया।।१२-१७।।

पूतना अपना स्तन पिलाकर श्रीकृष्ण को मारने के लिए उद्दत थी; किन्तु श्रीकृष्ण ने ही उसका काम तमाम कर दिया। उन्होंने वृन्दावन में जाने के पश्चात कालिय नाग को परास्त किया और उसे यमुना के कुण्ड से निकालकर समुद्र में भेज दिया। बलरामजी के साथ जा, गदहे का रुप धारण करनेवाले धेनुकासुर को मारकर, उन्होंने तालवन को क्षेमयुक्त स्थान बना दिया तथा वृषभरुपधारी अरिष्टासुर और अश्वरुपधारी केशी को मार डाला। फिर श्रीकृष्ण ने इन्द्रयाग के उत्सव को बंद कराया और उसके स्थान में गिरीराज गोवर्धन की पूजा प्रचलित की। इससे कूपित हो इन्द्र ने जो वर्षा आरम्भ की, उसका निवारण श्रीकृष्ण गोवर्धन पर्वत को धारण करके किया। अन्त में महेन्द्र ने आकर उनके चरणों में मस्तक झुकाया और उन्हें " गोविन्द" की  पदवी दी। फिर अपने पुत्र अर्जून को उन्हें सौंपा। इससे संतुष्ट होकर श्रीकृष्ण ने पुन: इन्द्रयाग का भी उत्सव कराया। तदनन्तर एक दिन वे दोनों भाई कंश का संदेश लेकर आए हुए अक्रूर के साथ रथ पर बैठकर मथुरा चले गये। जाते समय श्रीकृष्ण में अनुराग रखने वाली गोपियॉं, जिनके साथ वे भॉंति - भॉंति की मधुर लीलाएँ कर चुके थे, उन्हें बहुत देर तक निहारती रहीं। मार्ग में अक्रूर ने उनकी स्तुति की।

मथुरा में एक धोबी को, जो बहुत बढ - चढ्कर बातें बना रहा था, मारकर श्रीकृष्ण ने उससे सारे वस्त्र ले लिए।।१८-२३।।

एक माली के द्वार पर उन्होंने बलरामजी के साथ फूल की मालाएँ धारण कीं और माली को उत्तम वर दिया । कंस की दासी कुब्जा ने उनके शरीर में चंदन का लेप कर दिया, इससे प्रसन्न होकर उन्होंने उसका कुबड़ापन दूर कर दिया - उसे सुडौल एवं सुन्दर बना दिया। आगे जाने पर रङ्गशाला के द्वार पर खड़े हुए कूबलयपीड नामक मतवाले हाथी को मारा और रङ्गभूमि में प्रवेश करके श्रीकृष्ण ने मञ्चपर बैठे हुए कंस आदि राजाओ के समक्ष चाणूर मल्ल के ललकारने पर उस से कूश्ती लड़ी और बलराम ने मुष्टिक नाम वाले पहलवान के साथ दंगल शुरु किया। उन दोनों भाईयों ने चाणूर, मूष्ठिक तथा अन्य पहलवानों को भी मार गिराया। तत्पश्चात श्रीहरि ने मथूराधिपति कंश को मारकर उसके पिता उग्रसेन को यदुवंशियों का राजा बनाया। कंश की दो रानियॉं थीं - अस्ति और प्राप्ति। वे दोनों जरासंध की पुत्रियॉं थी। उनकी प्रेरणा से जरासन्ध ने मथुरापुरी पर घेरा डाल दिया और यदुवंशियों के साथ बाणों से युद्ध करने लगा। बलराम और श्रीकृष्ण जरासन्ध को परास्त करके मथुरा छोड़कर गोमन्त पर्वत पर चले आये और द्वारका नगरी का निर्माण करके वहीं यदुवंशियों के साथ रहने लगे।

उन्होंने युद्ध में वासुदेव नाम धारण करने वाले पौण्ड्र्क को भी मारा तथा भूमिपुत्र नरकासुर का वध करके उसके द्वारा हरकर लायी हुई देवता, गन्धर्व तथा यक्षों की कन्याओ के साथ विवाह किया। श्रीकृष्ण की सोलह हजार आठ रानियॉं थीं, उनमें रुक्मिणी आदि प्रधान थीं।।२४-३१।।

इसके बाद नरकासुर का दमन करनेवाले भगवान श्रीकृष्ण सत्यभामा के साथ गरुड़ पर आरुढ होकर स्वर्गलोक में गये। वहॉं से इन्द्र को परस्त करके रत्नोंसहित मणिपर्वत तथा पारिजात वृक्ष उठा लाये और उन्हें सत्यभामा के भवन में स्थापित कर दिया।

श्रीकृष्ण ने सान्दीपनि मुनि से अस्त्र - शस्त्रों की शिक्षा ग्रहण की थी। शिक्षा पाने के अनन्तर उन्होंने गुरु दक्षिणा के रुप में गुरू के मरे हुए बालक को लाकर दिया था। इसके लिए उन्हें ' पञ्चजन' नामक दैत्य को परास्त करके यमराज के लोक में भी जाना पड़ा था। वहॉं यमराज ने उनकी बड़ी पूजा की थी।

उन्होंने राजा मुचुकन्द के द्वारा कालयवन का वध करवा दिया। उस समय राजा मुचुकन्द ने भी भगवान की पूजा की थी। भगवान श्रीकृष्ण वसुदेव, देवकी तथा भगवद्भक्त ब्राह्मणों का बड़ा आदर-सत्कार करते थे।

बलभद्रजी के द्वारा रेवती के गर्भ से निसठ और उल्मुक नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए। श्रीकृष्ण द्वारा जाम्बन्ती के गर्भ से साम्ब का जन्म हुआ। इसी प्रकार अन्य रानियों से अन्यान्य पुत्र उत्पन्न हुए।

रुक्मिणी के गर्भ से प्रद्द्युम्न का जन्म हुआ था। वे छ: दिन के थे, तभी शम्बरासुर उन्हें मायाबल से हर ले गया। उसने बालक को समुद्र में फेंक दिया। समुद्र में उसे एक मत्स्य निगल गया। उस मत्स्य को एक मल्लाह ने पकड़ा और शम्बरासुर को भेंट किया। फिर शम्बरासुर ने उस मत्स्य को मायावती के हवाले कर दिया। मायावती ने मत्स्य के पेट में अपने पति को देखकर बड़े आदर से उसका पालन पोषण किया। बड़े हो जाने पर मायावती ने प्रद्द्युम्न से कहा - ' नाथ! मैं आपकी पत्नी रति हूँ और आप मेरे पति कामदेव हैं। पूर्वकाल में भगवान शङ्कर ने आपको अनङ्ग (शरीर रहित) कर दिया था। आपके न रहने से शम्बरासुर मुझे हर लाया है। मैंने उसकी पत्नी होना स्वीकार नहीं किया है। आप माया के ज्ञाता हैं, अतः शम्बरासूर को मार डालिए'।।३२-३९।।

यह सुनकर प्रद्द्युम्न ने शम्बरासूर का वध किया और अपनी भार्या मायावती के साथ वे श्रीकृष्ण के पास चले गये। प्रद्द्युम्न से उदारबुद्धि अनिरुद्ध का जन्म हुआ। बड़े होने पर वे उषा के स्वामी हुए। राजा बलि के बाण नामक पुत्र था। उषा उसी की पुत्री थी। उसका निवास स्थान शोणितपुर में था। बाण ने बड़ी भारी तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे अपना पुत्र मान लिया।

एक दिन शिवजी ने बलोन्मत्त बाणासुर की युद्ध विषयक इच्छा से संतुष्ट होकर उससे कहा - ' बाण! जिस दिन तुम्हारे महल का मयूरध्वज अपने - आप टूटकर गिर जाय, उस दिन यह समझना कि तुम्हें युद्ध प्राप्त होगा।'

एक दिन कैलाश पर्वत पर भगवती पार्वती भगवान शङ्कर के साथ क्रीडा कर रहीं थीं। उन्हें देखकर उषा के मन में भी पति की अभिलाषा जाग्रत हुई। पार्वतीजी ने उसके मनोभाव को समझकर कहा - ' वैशाख मास की द्वादशी तिथि को रात के समय स्वप्न में जिस पुरूष का तुम्हें दर्शन होगा, वही तुम्हारा पति होगा।' पार्वतीजी की यह बात सुनकर उषा बहुत प्रसन्न हूई। उक्त तिथी को जब वह अपने घर में सो गयी, तब उसे वैसा ही स्वप्न दिखाई दिया। उषा की एक सखी चित्रलेखा थी। वह बाणासुर के मन्त्री कुष्भाण्ड की कन्या थी। उसके बनाये हुए चित्रपट से उषा ने अनिरूद्ध को पहचाना कि वे ही स्वप्न में उससे मिले थे। उसने चित्रलेखा के ही द्वारा श्रीकृष्ण - पौत्र अनिरूद्ध को द्वारका से अपने यहॉं बुला लिया। अनिरूद्ध आये और उषा के साथ विहार करते हुए रहने लगे। इसी समय मयूरध्वज के रक्षकों ने बाणासुर को ध्वज के गिरने की सूचना दी। फिर तो अनिरूद्ध और बाणासूर में भयंकर युद्ध हुआ।।४०-४७।।

नारदजी के मुख से अनिरुद्ध के शोणितपुर पहुँचने का समाचार सुनकर, भगवान श्रीकृष्ण प्रद्युम्न और बलभद्र को साथ ले, गरूड पर बैठकर वहॉं गये और अग्नि एवं माहेश्वर ज्वर को जीतकर शङ्करजी के साथ युद्ध करने लगे। श्रीकृष्ण और शङ्कर में परस्पर बाणों के आघात - प्रत्याघात से युक्त्त भीषण युद्ध होने लगा। नन्दी, गणेश और कार्तिकेय आदि प्रमुख वीरों को गरूड आदि ने तत्काल परास्त कर दिया। श्रीकृष्ण ने जृम्भणास्त्र का प्रयोग किया, जिससे भगवान शङ्कर जँभाई लेते हुये सो गये। इसी बीच में श्रीकृष्ण ने बाणसुर के हजार भुजाएँ काट डालीं। जृम्भणास्त्र का प्रभाव कम होने पर शिवजी ने बाणासुर के लिए अभयदान मॉंगा, तब श्रीकृष्ण ने दो भुजाओ के साथ बाणासुर को छोड़ दिया और शङ्करजी से कहा - ।।४८-५१।।

श्रीकृष्ण बोले - भगवन! आपने जब बाणासुर के लिए अभयदान दिया है, तो मैं ने भी दे दिया। हम दोनों में कोई भेद नहीं है। जो भेद मानता है, वह नरक में पड़ता है।।५२।।

अग्निदेव कहते हैं - तदनन्तर शिव आदिने श्रीकृष्ण का पूजन किया। वे अनिरूद्ध और उषा आदि के साथ द्वारका में जाकर उग्रसेन आदि यादवों के साथ आनन्द पूर्वक रहने लगे।।५३।।

अनिरूद्ध के वज्र नामक पुत्र हुआ। उसने मार्कण्डेय मुनि से सब विद्याओं का ज्ञान प्राप्त किया। बलभद्रजी ने प्रलम्बासुर को मारा, यमुनाजी के धारा को खींचकर फेर दिया, द्विविद नामक बानर का संहार किया तथा अपने हल के अग्र भाग से हस्तिनापुर को गङ्गा में झुकाकर कौरवों के घमंड को चूर - चूर कर दिया।

भगवान श्रीकृष्ण अनेक रूप धारण करके अपनी रुक्मिणी आदि रानियो के साथ विहार करते रहे। उन्होंने असंख्य पुत्रों को जन्म दिया। अन्त में यादवों का उपसंहार करके वे परमधाम को पधारे। जो इस हरिवंश का पाठ करता है, वह सम्पूर्ण कामनाएँ प्राप्त करके अन्त में श्रीहरि के पास जाता है।।५४-५६।।

रविवार, 5 अप्रैल 2020

रामायण - उत्तरकाण्ड की संक्षिप्त कथा (अग्निकाण्ड - ग्यारहवॉं अध्याय)

नारदजी कहते हैं - जब श्रीरघुनाथजी अयोध्या के राजसिंहासन पर आसीन हो गये, तब अगस्त्य आदि महर्षि उनका दर्शन करने के लिए गये। वहॉं उनका भली - भॉंति स्वागत - सत्कार हुआ। तदनन्तर उन ऋषियों ने कहा - 'भगवन! आप धन्य हैं, जो लङ्का में विजयी हुए और इन्द्रजित जैसे राक्षसों को मार गिराया। अब हम उनकी उत्पति की कथा बतलाते हैं, सुनिये -

ब्राह्माजी के पुत्र मुनिवर पुलस्त्य हुए और पुलस्त्य से महर्षि विश्रवा का जन्म हुआ। उनकी दो पत्नियॉं थी - पुण्योत्कटा और कैकसी। उनमें पुन्योत्कटा ज्येष्ठ थी। उसके गर्भ से धनाध्यक्ष कुबेर का जन्म हुआ। कैकसी के गर्भ से पहले रावण का जन्म हुआ, जिसके दस मुख और बीस भुजाएँ थीं। रावण ने तपस्या की और ब्रह्माजी ने उसे वरदान दिया, जिससे उसने समस्त देवताओ को जीत लिया। कैकसी के दुसरे पुत्र का नाम कुम्भकर्ण और तीसरे का विभिषण था। कुम्भकर्ण सदा निंद में ही पड़ा रहता था; किंतु विभिषण बड़े धर्मात्मा हुए। इन तीनों की बहन शूर्पणखा हुई। रावण से मेघनाद का जन्म हुआ। उसने इन्द्र को जीत लिया था, इसलिए "इन्द्रजित" के नाम से उसकी प्रसिद्धि हुई। वह रावण से भी अधिक बलवान था। परंतु देवताओ आदि के कल्याण की इच्छा रखने वाले आपने लक्ष्मण के द्वारा उसका वध करा दिया।' ऐसा कहकर वे अगस्त्य आदि ब्रह्मर्षि श्रीरघुनाथजी के द्वारा अभिनन्दित हो अपने - अपने आश्रम को चले गये।

तदनन्तर देवताओ की प्रार्थना से प्रभावित श्रीरामचन्द्रजी के आदेश से शत्रुघ्न ने लवणासुर को मारकर एक पूरी बसायी, जो "मथूरा" नाम से प्रसिद्ध हुई।

तत्पश्चात भरत ने श्रीराम की आज्ञा पाकर सिन्धु - तीर  निवासी शैलूष नामक बलोन्मत्त गन्धर्व का तथा उसके करोड़ वंशजों का अपने तीखे बाणों से संहार किया। फिर उस देश के गान्धार और मद्र दो विभाग करके, उनमें अपने पुत्र तक्ष और पुष्कर को स्थापित कर दिये।।१-९।।

इसके बाद भरत और शत्रुघ्न अयोध्या में चले आये और वहॉं श्रीरघुनाथजी की आराधना करते हुए रहने लगे। श्रीरामचन्द्रजी ने दुष्ट पुरुषों का युद्ध में संहार किया और शिष्ट पुरुषों का दान आदि के द्वारा भलीभॉंति पालन किया। उन्होंने लोकापवाद के भय से अपनी धर्मपत्नी सीता को वन में छोड़ दिया था। वहॉं वाल्मिकी मुनि के आश्रम में उनके गर्भ से दो श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न हुए, जिनके नाम कुश और लव थे। उनके उत्तम चरित्रों को सुनकर श्रीरामचन्द्रजी को भलीभॉंति निश्चय हो गया कि ये मेरे ही पुत्र हैं। तत्पश्चात उन दोनों को कोशल के दो राज्यों पर अभिषिक्त करके, 'मैं ब्रह्म हूँ' इसकी भावना पूर्वक ध्यानयोग में स्थित होकर उन्होंने देवताओ की प्रार्थना से भाईयों और पुरवासियों सहित अपने परमधाम में प्रवेश किया। अयोध्या में ग्यार हजार वर्षों तक राज्य करके वे अनेक यज्ञों का अनुष्ठान कर चुके थे। उनके बाद सीता के पुत्र कोशल जनपद के राजा हुए।।१०-१३।।

अग्निदेव कहते हैं - वसिष्ठ्जी! देवर्षि नारद से यह कथा सुनकर महर्षि वाल्मीकि ने विस्तार पूर्वक रामायण नामक महाकाव्य की रचना की। जो इस प्रसङ्ग को सुनता है, वह स्वर्गलोक को जाता है।।१४।।

रामायण - युद्धकाण्ड की संक्षिप्त कथा (अग्निपुराण - दसवॉं अध्याय)

नारदजी कहते हैं - श्रीरामचन्द्रजी के आदेश से अङ्गद रावण के पास गये और बोले - 'रावण! तुम जनककुमारी सीता को ले जाकर शीघ्र ही श्रीरामचन्द्रजी को सौंप दो, अन्यथा मारे जाओगे।' यह सुनकर रावण उनहें मारने को तैयार हो गया। अङ्गद राक्षसों को मार - पीटकर लौट आये और श्रीरामचन्द्रजी से बोले - 'भगवन! रावण केवल युद्ध करना चाहता है।' अङ्गद की बात सुनकर श्रीराम वानरों की सेना साथ ले युद्ध के लिए लङ्का में प्रवेश किया। हनुमान, मैन्द, द्विविद, जाम्बवान, नल, नील, तार, अङ्गद, धुम्र, सुषेण, केशरी, गज, पनस, विनत, रम्भ, शरभ, महाबली कम्पन, गवाक्ष, दधिमुख, गवय और गन्धमादन - ये सब तो वहॉं आये ही, अन्य भी बहुत से वानर आ पहुँचे। इन असंख्य वानरों सहित कपिराज सुग्रीव भी युद्ध के लिये उपस्थित थे। फिर तो राक्षसों और वानरों में घमासान युद्ध छिड़ गया। राक्षस वानरों को बाण, शक्ति और गदा आदि के द्वारा मारने लगे और वानर नख, दॉंत और शिला आदि के द्वारा राक्षसों का संहार करने लगे। राक्षसों की हाथी, घोड़े, रथ और पैदलों से युक्त चतुरङ्गिणी सेना नष्ट - भ्रष्ट हो गयी। हनुमान ने पर्वत शिखर से अपने वैरी धुम्राक्ष का वध कर डाला। नील ने भी युद्ध के लिये सामने आये हुये अकम्पन और प्रहस्त को मौत के घाट उतार दिया।।१-८।।

श्रीराम और लक्ष्मण यद्द्पि इन्द्रजित के नागास्त्र से बँध गये थे, तथापि गरुड़ की द्द्ष्टि पड़ते ही उससे मुक्त हो गए। तत्पश्चात उन दोनों भाइयों ने बाणों से राक्षसी सेना का संहार करना आरम्भ किया। श्रीराम ने रावण को युद्ध में अपने बाणों की मार से जर्जरित कर डाला। इससे दुःखित होकर रावण ने कुम्भकर्ण को सोते से जगाया। जागने पर कुम्भकर्ण ने हजार घड़े मदिरा पीकर कितने ही भैंस आदि पशुओं का भक्षण किया। फिर रावण से कुम्भकर्ण बोला - "सीता का हरण करके तुमने पाप किया है। तुम मेरे बड़े भाई हो, इसीलिए तुम्हारे कहने से युद्ध करने जाता हूँ। मैं वानरों सहित राम को मार दूँगा।।९-१२।।

ऐसा कहकर कुम्भकर्ण ने समस्त वानरों को कूचलना आरम्भ किया। एक बार उसने सुग्रीव को पकड़ लिया, तब सुग्रीव ने उसके नाक और कान काट लिये। नाक और कान से रहित होकर वह वानरों का भक्षण करने लगा। यह देख श्रीरामचन्द्रजी ने अपने बाणों से कुम्भकर्ण दोनों भुजाएँ काट डालें। इसके बाद उसके दोनों पैर तथा मस्तक काटकर उसे पृथ्वी पर गिरा दिया। इस तरह और भी बहुत से युद्ध परायण राक्षसों को श्रीराम, लक्ष्मण, विभिषण एवं वानरों ने पृथ्वी पर सुला दिया। तत्पश्चात इन्द्रजित ने माया से युद्ध करते हुए वरदान में प्राप्त हुए नागपाश द्वारा श्रीराम और लक्ष्मण को बॉंध लिया। उस समय हनुमानजी के द्वारा लाये हुए पर्वत पर उगी हुई "विशल्या" नाम की औषधि से श्रीराम और लक्ष्मण के घाव अच्छे हुए। उनके शरीर से बाण निकाल दिये गये। हनुमानजी पर्वत को जहॉं से लाये थे, वहीं उसे पुन: रख आये। इधर मेघनाद निकुम्भिलादेवी के मन्दिर में होम आदि करने लगा। उस समय लक्ष्मण ने अपने बाणों से इन्द्र को भी परास्त करनेवाले उस वीर को युद्ध में मार गिराया। पुत्र की मृत्यु पाकर रावण शोक से सन्तप्त हो उठा; और सीता को मार डालने के लिए उद्दत हो उठा; किंतु अविन्ध्य के मना करने से वह मान गया और रथ पर बैठकर सेना सहित युद्ध भूमि में गया। तब इन्द्र के आदेश से मातलि ने आकर श्रीरघुनाथजी को भी रथ पर बिठाया।।१३-२२।।

श्रीराम और रावण का युद्ध श्रीराम और रावण के युद्ध के समान ही था, उसकी कहीं भी कोई दुसरी उपमा नहीं थी। रावण वानरों पर प्रहार करता था और हनुमान आदि वानर रावण को चोट पहूँचाते थे। जैसे मेघ पानी बरसाता है, उसी प्रकार श्रीरघुनाथजी रावण के उपर अस्त्र - शस्त्रों की वर्षा आरम्भ कर दी। उन्होंने रावण के रथ, ध्वज, अश्व, सारथि, धनुष, बाहु और मस्तक काट डाले। कटे हुए मस्तक के स्थान पर दूसरे नये मस्तक उत्पन्न हो जाते थे। यह देखकर श्रीरामचन्द्रजी ने ब्र्म्हास्त्र के द्वारा रावण का वक्ष:स्थल विदीर्ण करके उसे रणभूमि में गिरा दिया। उस समय मरने से बचे हुए सब राक्षसों के साथ रावण की अनाथा स्त्रियॉं विलाप करने लगीं। तब श्रीरामचन्द्रजी के आज्ञा से विभिषण ने उन सबको सान्त्वना दे, रावण के शव का दाह-संस्कार किया। तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजी हनुमानजी के द्वारा सीताजी को बुलवाया। यद्यपि वे स्वरुप से ही नित्य शुद्ध थीं, तो भी उन्होंने अग्नि में प्रवेश करके अपनी विशुद्धता का परिचय दिया। तत्पश्चात रघुनाथजी ने उन्हें स्वीकार किया। इसके बाद इन्द्रादि देवताओ ने उनका स्तवन किया। फिर ब्रह्माजी तथा स्वर्गवासी महराज दशरथ ने आकर स्तुति करते हुए कहा - 'श्रीराम तुम राक्षसों का संहार करने वाले साक्षात श्रीविष्णु हो।' फिर श्रीराम के अनुरोध से इन्द्र ने अमृत बरसाकर मरे हुए वानरों को जीवित कर दिया। समस्त देवता युद्ध देखकर, श्रीरामचन्द्रजी के द्वारा पूजित हो, स्वर्गलोक में चले गये। श्रीरामचन्द्रजी ने लङ्का का राज्य विभिषण को दे दिया और वानरों का विशेष सम्मान किया।।२३-२९।।

फिर सबको साथ ले, सीता सहित पुष्पक विमान पर बैठकर श्रीराम जिस मार्ग से आये थे, उसी से लौट चले। मार्ग में वे सीता को प्रसन्नचित्त होकर वनों और दुर्गम स्थानों को दिखाते जा रहे थे। प्रयाग में वे महर्षि भारद्वाज को प्रणाम करके वे अयोध्या के पास नन्दिग्राम में आये। वहॉं भरत ने उनके चरणों में प्रणाम किया। फिर वे अयोध्या में आकर रहने लगे। सबसे पहले उन्होंने महर्षि वशिष्ठ आदि को नमस्कार करके क्रमश: कौशल्या, कैकयी और सुमित्रा के चरणों में मस्तक झुकाया। फिर राज्य ग्रहण करके ब्राह्मणों आदि का पूजन किया। अश्वमेध - यज्ञ करके उन्होंने अपने आत्मस्वरुप श्रीवासुदेव का यजन किया, सब प्रकार के दान दिये और प्रजाजनों का पुत्रवत पालन करने लगे। धर्म और कामादि भी सेवन किया तथा वे दुष्टों को सदा दण्ड देते रहे। उनके राज्य में सब लोग धर्म परायण थे तथा पृथ्वी पर सब प्रकार की खेती फूली - फली रहती थी। श्रीरघुनाथजी के समयकाल में किसी की भी अकालमृत्यु भी नही होती थी।।३०-३५।।

गुरुवार, 2 अप्रैल 2020

रामायण - सुन्दरकाण्ड की संक्षिप्त कथा (अग्निपुराण - नवाँ अध्याय)

नारदजी कहते हैं - सम्पति की बात सुनकर हनुमान आदि वानरों ने समुद्र की ओर देखा। फिर वे कहने लगे - 'कौन समुद्रों को लाँघकर वानरों को जीवन दान देगा?' वानरों की जीवन - रक्षा और श्रीरामचन्द्रजी के कार्य के प्रक्रिष्ट सिद्दी के लिये पवनकुमार हनुमानजी सौ योजन विस्तृत समुद्र को लॉंघ गये। लॉंघते समय अवलम्बन देने के लिये समुद्र से मैनाक पर्वत उठा। हनुमान ने द्दष्टि मात्र से उसका सत्कार किया। फिर छायाग्राहिणी सिंहिका ने सिर उठाया। वह उन्हें वह अपना ग्रास बनाना चाहती थी, इसलिए हनुमानजी ने उसे मार गिराया। समुद्र के पार जाकर उन्होंने लङ्कापुरी देखी। राक्षसों के घरों में खोज की; रावण के अन्त:पुर में तथा कुम्भ, कुम्भकर्ण, विभिषण, इन्द्रजित तथा अन्य राक्षसों के गृहों में जा - जाकर तलाश की; मद्यपान के स्थानों आदि में भी चक्कर लगाया। किंतु कहीं भी सीता उनकी द्दष्टि में नहीं पड़ी। अब वे बड़ी चिन्ता में पड़े। अन्त में जब अशोक वाटिका की ओर गये तो वहॉं शिंशपा वृक्ष के नीचे सीताजी उन्हें बैठी दिखाईं दीं। वहॉं राक्षसियॉं उनकी रखवाली कर रहीं थी। हनुमानजी ने शिंशपा वृक्ष पर चढकर देखा। रावण सीताजी से कह रहा था - 'तू मेरी स्त्री हो जा'; किंतु वे स्पष्ट शब्दों में 'ना' कर रहीं थीं। वहॉं बैठी राक्षसियॉं भी यही कहती थी - 'तू रावण की स्त्री हो जा।'

जब रावण चला गया तो हनुमानजी इस प्रकार कहना आरम्भ किया - ' अयोध्या में दशरथ नामवाले एक राजा थे। उनके दो पुत्र वनवास के लिए गये। वे दोनों भाई श्रेष्ठ पुरुष हैं। उनमें श्रीरामचन्द्रजी की पत्नी जनककुमारी सीता तुम्हीं हो। रावण तुम्हें बलपुर्वक हर ले आया है। श्रीरामचन्द्रजी इस समय सुग्रीव के मित्र हो गये हैं। उन्होंने तुम्हारी खोज करने के लिए ही मुझे भेजा है। पहचान के लिए गूढ सन्देश के साथ श्रीरामचन्द्र्जी ने अँगूठी दी है। उनकी दी हुई यह अँगूठी ले लो'।।१-९।।

सीताजी ने अँगूठी ले ली। उन्होंने वृक्ष पर बैठे हुए हनुमानजी को देखा। फिर हनुमानजी वृक्ष से उतरकर उनके सामने आ बैठे, तब सीता ने उनसे कहा - 'यदि श्रीरघुनाथजी जीवित हैं तो वे मुझे यहॉं से ले क्यों नहीं जाते?' इस प्रकार शंका करती हुई सीताजी से हनुमानजी ने इस प्रकार कहा - 'देवि सीते! तुम यहॉं हो, यह बात श्रीरामचन्द्र्जी नहीं जानते। मुझसे यह समाचार जान लेने के पश्चात सेनासहित राक्षस रावण को मारकर वे तुम्हें अवश्य ले जायेंगें। तुम चिन्ता न करो। मुझे कोई अपनी पहचान दो।' तब सीताजी ने हनुमानजी को अपनी चुड़ामणि उतारकर दे दी और कहा - 'भैया! अब ऐसा उपाय करो, जिससे श्रीरघुनाथजी शीघ्र आकर मुझे यहॉं से ले चलें। उन्हें कौए की आँख नष्ट कर देनेवाली घटना का स्मरण दिलाना; आज यहीं रहो, कल सबेरे चले जाना; तुम मेरा शोक दूर करने वाले हो। तुम्हारे आने से मेरा दु:ख बहुत कम हो गया है।' चुड़ामणि और काकवाली कथा को पहचान के रुप में लेकर हनुमानजी ने कहा - 'कल्याणि! तुम्हारे पतिदेव अब तुम्हें शीघ्र ही ले जायेंगें। अथवा यदि तुम्हें चलने की जल्दी हो, तो मेरी पीठ पर बैठ जाओ। मैं तुम्हें आज ही श्रीराम और सुग्रीव के दर्शन कराउँगा।' सीता बोलीं - 'नही, श्रीरघुनाथजी ही मुझे आकर ले जायें'।।१०-१५।।

तदनन्तर हनुमानजी ने रावण से मिलने की युक्ति सोच निकाली। उन्होंने रक्षकों मारकर उस वाटिका को उजाड़ डाला। फिर दॉंत और नख आदि आयुधों से वहॉं से आये हुए रावण के समस्त सेवकों को मारकर सात मन्त्रिकुमारों तथा रावणपुत्र अक्षयकुमार को भी यमलोक पहुँचा दिया। तत्पश्चात इन्द्रजीत ने आकर उन्हें नागपाश से बॉंध लिया और उन वानरवीर को रावण के पास ले जाकर उससे मिलाया। उस समय रावण ने पूछा - ' तू कौन है?' तब हनुमानजी ने रावण को उत्तर दिया - "मैं श्रीरामचन्द्रजी का दूत हुँ। तूम श्रीसीताजी को श्रीरघुनाथजी की सेवा में लौटा दो; अन्यथा लङ्कानिवासी समस्त राक्षसों के साथ तुम्हें श्रीराम के बाणों से घायल होकर निश्चय ही मरना पड़ेगा।' यह सुनकर रावण हनुमानजी को मारने के लिए उद्दत हो गया; किंतु विभिषण ने उसे रोक दिया। तब रावण ने उनकी पूँछ में आग लगा दी। पूँछ जल उठी। यह देख पवनपुत्र हनुमानजी ने राक्षसों की पूरी लङ्का को जला डाला और सीताजी का पुन: दर्शन करके उन्हें प्रणाम किया। फिर समुद्र के पार आकर अङ्गद आदि से कहा - 'मैं ने सीताजी का दर्शन कर लिया है।' तत्पश्चात अङ्गद आदि के साथ सुग्रीव के मधुवन में आकर, दधिमुख आदि रक्षकों को परास्त करके, मधुपान करने के अनन्तर वे सब लोग श्रीरामचन्द्रजी के पास आये और बोले - 'सीताजी का दर्शन हो गया।' श्रीरामचन्द्रजी ने भी अत्यन्त प्रसन्न होकर हनुमानजी से पुछा ।।१६-२४।।

श्रीरामचन्द्रजी बोले - कपिवर! तुम्हें सीता का दर्शन कैसे हुआ? उसने मेरे लिए क्या संदेश दिया है? मैं विरह की आग में जल रहा हूँ। तुम सीता की अमृतमयी कथा सुनाकर मेरा संताप शान्त करो।।२५।।

नारदजी कहते हैं - यह सुनकर हनुमानजी ने श्रीरघुनाथजी से कहा - 'भगवन! मैं समुद्र लॉंघकर लङ्का में गया था। वहॉं सीताजी का दर्शन करके, लङ्कापुरी को जला कर यहॉं आ रहा हूँ। यह सीताजी की दी हुई चुड़ामणि लिजिये। आप शोक न करें; रावण का वध करने के पश्चात निश्च्य ही आपको सीताजी की प्राप्ति होगी।' श्रीरामचन्द्रजी उस मणि को हाथ में ले, विरह से व्याकुल होकर रोने लगे और बोले - 'इस मणि को देखकर ऐसा जान पड़ता है, मानो मैं ने सीता को ही देख लिया। अब मुझे सीता के पास ले चलो। मैं उसके बिना जीवित नहीं रह सकता।' उस समय सुग्रीव आदि ने श्रीरामचन्द्रजी को समझाकर शान्त किया। तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजी समुद्र  के तट पर गये। वहॉं उनसे विभिषण आकर मिले। विभिषण के भाई दुरात्मा रावण ने उनका तिरस्कार किया था। विभिषण ने इतना ही कहा था कि 'भैया! आप सीता को श्रीरामचन्द्रजी की सेवा में समर्पित कर दिजिये।' इसी अपराध के कारण उसने उन्हें ठुकरा दिया था। अब वे असहाय थे। श्रीरामचन्द्रजी ने विभिषण को अपना मित्र बनाया और लङ्का के राजपद पर अभिषिक्त्त कर दिया। इसके बाद श्रीराम ने समुद्र से लङ्का जाने का रास्ता मॉंगा। जब उसने मार्ग नहीं दिया तो उन्होंने बाणों से उसे बींध डाला। अब समुद्र भयभीत होकर श्रीरामचन्द्रजी के पास आकर बोला - 'भगवन! नल के द्वारा मेरे उपर पुल बॉंधकर आप लङ्का में जाइये। पूर्वकाल में आप ही ने मुझे गहरा बनाया था।' यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजी ने नल के द्वारा वृक्ष और शिलाखण्डों से एक पुल बनवाया और उसी से वे वानरों सहित समुद्र के पार गये। वहॉं सुवेल पर्वत पर पड़ाव डालकर वहीं से उन्होंने लङ्कापूरी का निरीक्षण किया।।२६-३३।। 


मंगलवार, 31 मार्च 2020

रामायण - किष्किन्धा काण्ड (अग्निपुराण - आठवाँ अध्याय)

नारदजी कहते हैं - श्रीरामचन्द्रजी पम्पा सरोवर पर जाकर सीता के लिये शोक करने लगे। वहाँ वे शबरी से मिले। फिर हनुमानजी से उनकी भेट हुई। हनुमानजी उन्हें सुग्रीव के पास ले गये और सुग्रीव के साथ उनकी मित्रता करायी। श्रीरामचन्द्रजी सबके देखते - देखते ताड़ के सात वृक्षों को एक ही बाण से बीन्ध डाला और दुन्दुभि नामक दानव के विशाल शरीर को पैर की ठोकर से दस योजन दूर फेंक दिया। इसके बाद सुग्रीव के शत्रु वाली को, जो भाई होते हुये भी उसके साथ वैर रखता था, मार डाला और किष्किन्धापुरी, वानरो का साम्राज्य, रुमा और तारा इन सबको ऋष्यमूक पर्वत पर वानरराज सुग्रीव के अधीन कर दिया। तदनन्तर किष्किन्धापुरी के स्वामी सुग्रीव ने कहा - ' श्रीराम! आपको सीताजी की प्राप्ति जिस प्रकार भी हो सके, ऐसा उपाय मैं कर रहा हूँ।' यह सुनने के बाद श्रीरामचन्द्रजी ने माल्यवान पर्वत के शिखर पर वर्षा के चार महीने व्यतीत किये और सुग्रीव किष्किन्धा में रहने लगे। चौमासे के बाद भी जब सुग्रीव दिखाई नही दिये, तब श्रीरामचन्द्रजी की आज्ञा से लक्ष्मण ने किष्किन्धा में जाकर कहा - 'सुग्रीव! तुम श्रीरामचन्द्रजी के पास चलो। अपनी प्रतिज्ञा पर अटल रहो, नही तो वाली मरकर जिस मार्ग से गया है, वह मार्ग अभी बन्द नही हुआ है। अतएव वाली के पथ का अनुसरण न करो।' सुग्रीव ने कहा - 'सुमित्रानन्दन! विषय भोग में आसक्त हो जाने के कारण मुझे बीते हुए समय का भान न रहा। अतः मेरे अपराध को क्षमा किजीए'।।१-७॥

ऐसा कहकर वानरराज सुग्रीव श्रीरामचन्द्रजी के पास गये और उन्हें नमस्कार करके बोले - 'भगवन! मैंने सब वानरों को बुला लिया है। अब आपकी इच्छा के अनुसार सीताजी की खोज करने के लिए उन्हें भेजुँगा। वे पूर्वादि दिशाओं में जाकर एक महिने तक सीताजी की खोज करें। जो एक महिने के बाद लौटेगा मैं उसे मार डालूँगा। यह सुनकर बहुत - से वानर पूर्व, पश्चिम और उत्तर दिशाओं के मार्ग पर चल पड़े तथा वहाँ जनककुमारी को न पाकर नियत समय के भीतर श्रीराम और सुग्रीव के पास लौट आए। हनुमानजी श्रीरामचन्द्रजी की दी हुई अँगूठी लेकर अन्य वानरों के साथ दक्षिण दिशा में जानकीजी की खोज कर रहे थे। वे लोग सुप्रभा की गुफा के निकट विन्ध्यपर्वत पर ही एक माससे अधिक काल तक ढुँढते फिरे; किंतु उन्हें सीताजी का दर्शन हुआ। अन्त में निराश होकर आपस में कहने लगे - "हमलोगों को व्यर्थ ही प्राण देने पड़ेंगे, धन्य है वह जटायु, जिसने सीता के लिए रावण के द्वारा मारा जाकर युद्ध में प्राण त्याग दिया था"॥८ - १३॥

उनकी यह बातें संपाति नामक गिद्ध के कानों में पड़ी। वह वानरों के प्राण त्यागने की चर्चा से उनको खाने की ताक में लगा था। किंतु जटायु की चर्चा सुनकर रुक गया और बोला - 'वानरों! जटायु मेरा भाई था। वह मेरे ही साथ सुर्य मण्डल की ओर उड़ा चला जा रहा था। मैंने अपनी पंखों की ओट में रखकर सूर्य की प्रखर किरणों के ताप से बचाया। अतः वह तो सकुशल बच गया; किंतु मेरे पंखें जल गयीं, इसलिए मैं यहीं गिर पड़ा। आज श्रीरामचन्द्रजी की वार्ता सुनने से फिर मेरे पंख निकल आये। अब मैं जानकीजी को देखता हूँ; वे लंका में अशोक वाटिका के भीतर हैं। लवण समुद्र के द्वीप में त्रिकूट पर्वत पर लंका बसी हुई है। यहाँ से वहाँ तक का समुद्र सौ योजन विस्तृत है। यह जानकर सब वानर श्रीराम और सुग्रीव के पास जायें और उन्हें सब समाचार बता दें॥१४-१७ ॥

रामायण - अरण्यकाण्ड की संक्षिप्त कथा ( अग्निपुराण - सातवाँ अध्याय )

नारदजी कहते हैं - मुने! श्रीरामचन्द्रजी ने महर्षि वशिष्ठ तथा माताओं को प्रणाम करके उन सबको भरत के साथ विदा कर दिया। तत्पश्चात महर्षि अत्री तथा उनकी पत्नी अनसूया को, शरभंग मुनि को, सुतीक्षण को तथा अगस्त्यजी के भ्राता अग्निजिह्व मुनि को प्रणाम करते हुए श्रीरामचन्द्रजी ने अगस्त्य मुनि के आश्रम पर जा उनके चरणों में मस्तक झुकाया और मुनि की कृपा से दिव्य धनुष एवं दिव्य खड्ग प्राप्त करके वे दण्डकारण्य में आये। वहाँ जनस्थान के भीतर पञ्चवटी नामक स्थान में गोदावरी के तट पर रहने लगे।

एक दिन शूर्पणखा नामवाली भयंकर राक्षसी राम, लक्ष्मण सीता को खा जाने के लिए पंचवटी में आयी; किंतु श्रीरामचन्द्रजी का अत्यन्त मनोहर रूप देखकर वह काम के अधीन हो गयी और बोली॥१-४॥

शूर्पणखा ने कहा - तुम कौन हो? कहाँ से आये हो? मेरी प्रार्थना से अब तुम मेरे पति हो जाओ। यदि मेरे साथ तुम्हारा सम्बन्ध होने में ये दोनों बाधक हैं तो, मैं इन दोनों को अभी खाये लेती हूँ॥५॥

ऐसा कहकर वो उन्हें खा जाने को तैयार हो गई। तब श्रीरामचन्द्रजी के कहने पर लक्ष्मण ने शूर्पणखा की नाक और दोनों कान भी काट लिये। कटे हुये अंगों से रक्त की धार बहाती हुई शूर्पणखा अपने भाई खर के पास गयी और इस प्रकार बोली - "खर! मेरी नाक कट गई। इस अपमान के बाद मैं जीवित नहीं रह सकती। अब तो मेरा जीवन तभी रह सकता है, जब तुम मुझे राम का, उनकी पत्नी सीता का तथा उनके भाई लक्ष्मण का गरम - गरम रक्त पिलाओ। खर ने उसे 'बहुत अच्छा' कहकर शान्त किया और दूषण तथा त्रिशिरा के साथ चौदह हजार राक्षसों की सेना लेकर श्रीरामचन्द्रजी पर चढ़ाई की। श्रीराम ने भी उनका सामना किया और राक्षसों को बींधना आरम्भ किया। शत्रुओं के हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सहित समस्त चतुरङ्गिनी सेना को उन्होंने यमलोक पहुँचा दिया तथा अपने साथ युद्ध करने वाले खर, दूषण और त्रिशिरा को भी मौत के घाट उतार दिया। अब शूर्पणखा लंका में पहुँची और रावण के सामने जा पृथ्वी पर गिर पड़ी । उसने क्रोध से भरकर रावण से कहा -" अरे ! तु राजा और राक्षस कहलाने के योग्य नहीं  है। खर आदि समस्त राक्षसों का संहार करने वाले राम की पत्नी सीता को हर ले। मैं राम और लक्ष्मण का रक्त पीकर ही जिवीत रहुँगी, अन्यथा नहीं ॥६ - १२ ॥

शूर्पणखा की बात सुनकर रावण ने कहा -  "अच्छा, ऐसा ही होगा।"  फिर उसने मारीच से कहा - " तुम स्वर्णमय विचित्र मृग का रूप धारण करके सीता के पास जाओ और राम तथा लक्ष्मण को अपने पीछे आश्रम से दूर हटा ले जाओ। मैं सीता का हरण करूँगा। यदि मेरी बात न मानोगे, तो तुम्हारी मृत्यु निश्चित है।" मारीच ने रावण से कहा - " रावण! धनुर्धर राम सक्षात मृत्यु हैं।" फिर उसने मन ही मन सोचा - 'यदि नहीं जाऊँगा तो रावण के हाथ से मरना होगा और जाऊँगा तो श्रीराम के हाथ से। इस प्रकार अगर मरना अनिवार्य है, तो इसके लिए श्रीराम ही श्रेष्ठ हैं, रावण नहीं; क्योंकि श्रीराम के हाथ से मरने पर मेरी मुक्ति हो जायेगी। ऐसा विचारकर वह मृगरूप धारण करके वह सीता के सामने बारंबार आने जाने लगा। तब सीताजी की प्रेरणा से श्रीराम दूर तक उसका पीछा करके उसे बाण से मार डाला। मरते समय उस मृग ने 'हा सीते! हा लक्ष्मण!' कहकर पुकार लगायी। उस समय सिता के कहने पर लक्ष्मण अपनी इच्छा के विरुद्ध  श्रीरामचन्द्रजी के पास गये। इसी बीच में रावण ने भी मौका पाकर सिता को हर लिया। मार्ग में जाते समय उसने गिद्धराज जटायु का वध करके सीता को लङ्का ले जाकर अशोक वाटिका में रखा। वहाँ सीता से बोला - 'तुम मेरी पटरानी बन जाओ।' फिर राक्षसियों के तरफ देखकर बोला - 'निशाचरियों! इसकी रखवाली करो' ॥१३-१९॥

उधर श्रीरामचन्द्रजी जब मारीच को मारकर लौटे, तो लक्ष्मण को आते देखकर बोले - 'सुमित्रानंदन! वह मृग तो मायामय था, वास्तव में वह एक राक्षस था;किंतु तुम जो इस समय यहाँ आ गये, इससे जान पड़ता है, निश्च्य ही कोई सिता को हर ले गया।' श्रीरामचन्द्रजी आश्रम पर गये; किन्तु वहाँ सीता नही दिखाई दी। उस समय वे आर्त होकर शोक और विलाप करने लगे - 'हा प्रिये जानकी! तु मुझे छोड़कर कहा चली गयी?'  लक्ष्मण ने श्रीराम को सन्त्वना दी। तब वे वन मे घुम - घुमकर सीता की खोज करने लगे। इसी समय उनकी जटायु से भेट हुई। जटयु ने यह कहकर कि 'सीता को रावण हर ले गया है' प्राण त्याग दिये। तब श्रीरघुनाथजी ने अपने हाथ से जटायु का दाह - सन्स्कार किया। इसके बाद उन्होने कबन्ध का वध किया। कबन्ध ने शाप मुक्त होने पर श्रीरामचन्द्रजी से कहा - आप सुग्रीव से मिलिय़े।।२०-२४।।

रविवार, 29 मार्च 2020

रामायण - अयोध्याकाण्ड की संक्षिप्त कथा (अग्निपूराण - छठा अध्याय)

नारदजी कहते हैं - भरत के ननिहाल चले जाने पर श्रीरामचन्द्रजी ही पिता- माता आदि के सेवा - सत्कार में रहने लगे । एक दिन राजा दशरथ ने  श्रीरामचन्द्रजी से कहा - ' रघुनन्दन! मेरी बात सुनो । तुम्हारे गुणों पर अनुरक्त हो प्रजाजनों ने मन - ही - मन तुम्हें राजसिंहासन अभिषिक्त कर दिया है - प्रजा की यह हार्दिक इच्छा है कि तुम युवराज बनो; अतः कल प्रातःकाल मैं तुम्हें युवराज पद प्रदान कर दूंगा | आज रात में तुम सीता सहित उत्तम व्रत का पालन करते हुए संयमपूर्वक रहो।'

राजा के आठ मन्त्रियों तथा वशिष्ठजी ने भी उनके इस बात का अनुमोदन किया। उन आठ मन्त्रियों के नाम इस प्रकार हैं - दृष्टि, जयन्त, विजय, सिद्धार्थ, राज्यवर्धन, अशोक धर्मपाल तथा सुमंत्र। इनके अतिरिक्त वशिष्ठजी भी मन्त्रणा देते थे।

पिता और मन्त्रियों की बातें सुनकर श्री रघुनाथजी ने 'तथास्तु' कहकर उनकी आज्ञा शिरोधार्य की और माता कौशल्या को यह शुभ समाचार बताकर देवताओं की पूजा करके वे संयम में स्थित हो गये। उधर महाराज दशरथ वशिष्ठ आदि मन्त्रियों को यह कहकर कि 'आपलोग श्रीरामचन्द्र के  राज्यामिषेक की सामग्री जुटायें', कैकेयी के भवन में चले गये।

कैकेयी के मन्थरा नामक एक दासी थी, जो बड़ी दुष्टा थी। उसने आयोध्या की सजावट होती देख श्रीरामचन्द्रजी के राज्याभिषेक की बात जानकर रानी कैकेयी से सारा हाल सुनाया ॥ १ - ८ ॥

मंथरा बोली -" तुम उठो! राम का राज्याभिषेक हो ने जा रहा है यह तुम्हारे पुत्र के लिए, मेरे लिए और तुम्हारे लिए भी मृत्यु के समान भयंकर वृत्तान्त है - इसमें कोई संदेह नहीं॥९॥

मंथरा कुबड़ी थी। उसकी बात सुनकर रानी कैकेयी को प्रसन्नता हुई। उन्होंने कुब्जा को एक आभूषण उतारकर दिया और कहा - मेरे लिए तो जैसे राम हैं, वैसे ही मेरे पुत्र भरत हैं। मुझे ऐसा कोई उपाय नहीं दिखायी देता, जिससे भरत को राज्य मिल सके।' मंथरा ने उस हार को फेंक दिया और कुपित होकर कैकेयी से कहा॥१०-११॥

मंथरा बोली - ओ नादान! तू अपने को, भरत को और मुझे भी राम से बचा। कल राम राजा होंगे। फिर राम के पूत्रों को राज्य मिलेगा। कैकेयी! अब राजवंश भरत से दूर हो जाएगा।

मैं भरत को राज्य दिलाने का एक उपाय बताती हूँ। पहले की बात है। देवासुर - संग्राम में शाम्बरा सुर ने देवताओं को मार भगाया था। तेरे स्वामी भी उस युद्ध में गये थे। उस समय तूने अपनी विद्या से रात में स्वामी की रक्षा की थी। इसके लिए महाराज ने तुझे दो वर देने की प्रतिज्ञा की थी। इस समय उन्हीं दो वरों को उनसे मांग। एक वर के द्वारा राम का चौदह वर्षो के लिए वनवास और दूसरे के द्वारा भरत का युवराज पद पर अभिषेक माँग ले। राजा इस समय वे दोनों वर दे देंगें॥१२-१५॥

इस प्रकार मंथरा के प्रोत्साहन देने पर कैकेयी अनर्थ में ही अर्थ की सिद्धि देखने लगी और बोली - 'कुब्जे! तूने बड़ा अचछा उपाय बताया है। राजा मेरा मनोरथ अवश्य पूर्ण करेंगें।' ऐसा कहकर वह कोपभवन में चली गयी और पृथ्वी पर अचेत - सी होकर पड़ रही। उधर महाराज दशरथ ब्राह्मण आदि का पूजन करके जब कैकेयी के भवन में आये तो उसे रोष में भरी हुई देखा। तब राजा ने पूछा - ' सुन्दरी! तुम्हारी ऐसी दशा क्यों हो रही है? तुम्हें कोई रोग तो नहीं सता रहा है? अथवा किसी भय से व्याकुल तो नहीं हो? बताओ, क्या चाहती हो? मैं अभी तुम्हारी इच्छा पूर्ण करता हूं। जिन श्रीराम के बिना मैं क्षणभर भी जीवित नहीं रह सकता, उन्हीं की शपथ खाकर कहता हूँ, तुम्हारा मनोरथ अवश्य पूर्ण करूँगा। सच - सच बताओ, क्या चाहती हो?" कैकेयी बोली - राजन! यदि आप मुझे कुछ देना चाहते हों, तो अपने सत्य की रक्षा के लिए पहले के दिये हुए दो वरदान देने की कृपा करें। मैं चाहती हूं, राम चौदह वर्षों तक संयम पूर्वक वन में निवास करें और इन सामग्रियों के द्वारा आज ही भरत युवराज पद पर अभिषेक हो जाय। महाराज! ये दोनों वरदान आप मुझे नहीं तो मैं विष पीकर मर जाऊँगी।" यह सुनकर राजा दशरथ वज्र से आहत हुए की भाँति मूर्छित होकर गिर पड़े। फिर थोड़ी देर में चेत होने पर उन्हेंने कैकेयी से कहा॥१६-२३॥

दशरथ बोल - "पापपूर्ण विचार रखनेवाली तू समस्त संसार का अप्रिय करनेवाली है। अरि! मैंने या राम ने तेरा क्या बिगाड़ा है, जो तू मुझसे एसी बात कर रही है। केवल तुझे प्रिय लगने वाला यह कार्य करके मैं संसार में भलीभाँति निन्दित हो जाऊँगा तु मेरी स्त्री नहीं कालरात्रि है । मेरा पुत्र भरत ऐसा नहीं है। पाणिनी! मेरे पुत्र के चले जाने पर जब मैं मर जाऊँगा तो तू विधवा होकर राज्य करना ॥ २४ - २५ ॥

राजा दशरथ सत्य के बन्धन में बंधे थे। उन्होंने श्रीराम को बुलाकर कहा - " बेटा! कैकेयी ने मुझे ठग लिया। तुम मुझे कैद करके राज्य को अपने अधिन कर लो। अन्यथा तुम्हें वन में निवास करना होगा और कैकेयी का पुत्र भरत राजा बनेगा।" श्रीरामचन्द्रजी ने पिता और कैकेयी को प्रणाम करके उनकी प्रदक्षिणा की और कौसल्या के चरणों में मस्तक झुकाकर उन्हें सांत्वना दी। फिर लक्ष्मण और पत्नी सीता को साथ ले ब्राह्मणों, दीनों और अनाथों को दान देकर सुमन्त्र सहित रथ पर बैठ कर नगर से बाहर निकल गए। उस समय माता - पिता आदि शोक से आतुर हो रहे थे। उस रात में श्रीरामचन्द्रजी ने तमसा नदि के तट पर निवास किया। उनके साथ बहुत - से पुरवासी भी गए थे। उन सबको सोता छोड़कर वे आगे बढ़ गए। प्रातःकाल होने पर जब श्रीरामचन्द्रजी नहीं दिखाई दिये तो नगरवासी निराश होकर पुनः आयोध्या लौट आए। श्रीराम के चले जाने से राजा दशरथ बहुत दुःखी हुए। वे रोते-रोते कैकेयी का महल छोड़कर कौशल्या के भवन में चले आये। उस समय नगर के समस्त स्त्री - पुरुष और रनिवास की स्त्रीयाँ फूट - फूटकर रो रही थीं। श्रीरामचन्द्रजी ने चीरवस्त्र धारण कर रखा था। वे रथ पर बैठे - बैठे श्रृंगवेरपुर जा पहुँचे। वहाँ निषादराज गुह ने उनका पूजन, स्वागत - सत्कार किया। श्रीरघुनाथजी ने इंगूदी - वृक्ष की जड़ के निकट विश्राम किया। लक्ष्मण और गुह रात भर जागकर पहरा देते रहे॥२६-३३॥

प्रातः समय श्रीराम ने रथ सहित सुमन्त्र को विदा कर दिया तथा स्वयं लक्ष्मण और सीता के साथ नाव से गंगा पार हो वे प्रयाग में गये। वहाँ उन्होंने महर्षि भारद्वाज को प्रणाम किया और उनकी आज्ञा ले वहाँ से चित्रकूट पर्वत को प्रस्थान किये। चित्रकूट पहुंचकर वास्तु पूजा करने के अनन्तर पर्णकूटी बनाकर मन्दाकिनी के तट पर निवास किया।

श्रीराम के वन जाने के पश्चात छठे दिन के रात में राजा दशरथ ने कौशल्या को पहले की एक घटना सुनायी, जिसमें उनके द्वारा सरयू के तट पर अनजाने में यज्ञदत पुत्र श्रवण कुमार के मारे जाने एवम् उनके द्वारा दी गयी शाप का वृत्तान्त था।

इतनी कथा कहने के पश्चात राजा ने 'हा राम!' कहकर स्वर्गलोक प्रयाण किया। कौशल्या ने समझा, महाराज शोक से आतुर हैं; इस समय निंद आ गई होगी। ऐसा विचार करके वे सो गयी। प्रातःकाल सभी सोते हुए महाराज को जगाने लगे; किन्तु वे न जगे॥३४-४२॥

तब उन्हें मरा हुआ जान समस्त नर-नारी फूट-फूटकर रोने लगे। तत्पश्चात महर्षि वशिष्ठ ने राजा के शव को तेल भरी नौका में रखवाकर भरत को ननिहाल से तत्काल बुलवाया। भरत और शत्रुघ्न, सुमन्त्र के साथ शीघ्र ही अयोध्यापूरी आए। यहाँ का समाचार जानकर भरत को बडा दुःख हुआ। कैकेयी को शोक करती देख उसकी कठोर शब्दों में निन्दा करते हुए बोले - "तुने मेरे माथे कलंक का टीका दिया। मेरे सिर पर अपयश का भारी बोझ लाद दिया।" फिर उन्होंनें कौशल्या की प्रशंसा करके तेलपूर्ण नौका में रखे हुए पिता के शव का सरयू तर पर अन्त्येष्टि - संस्कार किया। तदन्तर वसिष्ठ आदि गुरुओं ने कहा - "भरत अब राज्य ग्रहण करो।" भरत  बोले - मैं तो श्रीरामजी को ही राजा मानता हूँ। अब उन्हें यहाँ लाने के लिए वन में जाता हूँ। ऐसा कहकर वे वहाँ से दल - बल सहित चल दिये और श्रङ्गवेरपुर होते हुए प्रयाग पहुँचे। वहाँ महर्षि भरद्वाज ने उन्हें भोजन कराया । फिर भरद्वाज को नमस्कार करके वे सब प्रयाग से निकले और चित्रकूट में श्रीराम और लक्ष्मण के समीप आ पहुंचे। वहाँ भरत ने श्रीराम से कहा - " रघुनाथजी! हमारे पिता महाराजा दशरथ स्वर्गवासी हो गए। अब आप आयोध्या चलकर राज्य ग्रहण करें। मैं आपकी आज्ञा का पालन करते हुए वन में जाऊंगा।" यह सुनकर श्रीराम ने पिता का तर्पण किया और भरत से कहा - " तुम मेरी चरण पादुका लेकर आयोध्या लौट जाओ। मैं राज्य करने के लिए नहीं चलूँगा। पिता के सत्य की रक्षा के लिए चीर एवम् जटा धारण करके वन में ही रहूँगा।" श्रीराम के ऐसा कहने पर भरत सदल-बल लैट गये और अयोध्या छोड़कर नन्दिग्राम में रहने लगे। वहाँ चरण- पादुकाओं की पूजा करते हुए वे राज्य का भली-भाँति पालन करने लगे॥४३-५१॥

गुरुवार, 26 मार्च 2020

रामायण - बालकाण्ड की संक्षिप्त कथा (अग्निपुराण - पाँचवाँ अध्याय)

अग्निदेव कहते हैं - वशिष्ठ! अब मैं ठीक उसी प्रकार रामायण का वर्णन करूंगा, जैसे पूर्वकाल में नारदजी ने महर्षि वाल्मीकीजी को सुनाया था।

देवर्षि नारद कहते हैं - वाल्मीकीजी! भगवान् विष्णु के नाभिकमल से ब्रह्माजी उत्पन्न हुए हैं।

ब्रह्माजी के पुत्र हैं मरीचि।
मरीचि के पुत्र हैं कश्यप।
कश्यप के पुत्र हैं सूर्य ।
सूर्य के पुत्र हैं वैवस्वतमनुl
वैवस्वतमनु के पुत्र हैं इक्ष्वाकू।
इक्ष्वाकू के पुत्र हैं ककूतस्थ।
ककूतस्थ के पुत्र हैं रघु है ।

रघु के पुत्र हैं अज और अज के पुत्र दशरथ से रावण आदि राक्षसों का वध करने के लिए साक्षात भगवान विष्णु चार रूपों में प्रकट हुए। उनकी बड़ी रानी कौशल्या के गर्भ से श्रीरामचन्द्रजी का प्रादुर्भाव हुआ। कैकेयी से भरत और सुमित्रा से लक्ष्मण एवं शत्रुघ्न का जन्म हुआ ऋष्यशृंग ने उन तीनों रानियों को यज्ञ सिद्ध चरु दिये थे, जिन्हें खाने से इन चारोंकुमारों का अभिभाव हुआ। श्री राम आदि सभी अपने पिता के समान ही पराक्रमी थे। एक समय मुनिवर विश्वमित्र ने अपने यज्ञ में विघ्न डालनेवाले निशचरों का नाश करने के लिए राजा दशरथ से प्रार्थन की -" आप अपने पुत्र श्रीराम को मेरे साथ भेज दें ।" तब राजा ने श्रीराम और लक्ष्मण को मुनि के साथ भेज दिया। श्रीरामचन्द्रजी ने जाकर मुनि से अस्त्र - शास्त्रों की शिक्षा पाई और ताड़का नाम वाली निशाचरी का वध किया । फिर उन बलवान विरों ने मारीच नामक राक्षस को मानवास्त्र से मोहित करके दूर फेंक दिया और यज्ञविघातक राक्षस सुबाहु को दल - बलसहित मार डाला । इसके बाद वे कुछ काल तक मुनि सिद्धाश्रम में हि रहे। । तत्पश्चात विश्ववामित्र आदि महर्षियों के साथ लक्ष्मण सहित श्रीराम मिथिला - नरेश का धनुष - यज्ञ देखने के लिए गए ॥२-९॥

शतानन्दजी ने निमित्त - कारण बनकर श्रीराम से विश्वामित्र मुनि के प्रभाव का वर्णन किया। राजा जनक ने अपने यज्ञ में मुनियोंसहित श्रीरामचन्द्रजी का पूजन किया। श्रीराम ने धनुष को चढ़ा दिया और उसे अनायास ही तोड़ डाला। तदनन्तर महाराज जनक ने अपनी अयोनिजा कन्या सीता को, जिसके विवाह के लिए पराक्रम ही शुल्क निश्चित किया गया था, श्रीरामचन्द्रजी को समर्पित किया । श्रीराम ने भी अपने पिता राजा दशरथ आदि गरुजनों को मिथिला में पधार ने पर सबके सामने सीता का विधिपूर्वक पाणिग्रहण किया। उस समय लक्ष्मण ने भी मिथिलेश कन्या उर्मिला को अपनी पत्नी बनाया। राजा जनक के छोटे भाई कुशध्वज थे। उनकी दो कन्याएँ थी - श्रुतकीर्ति और माण्डवी । इनमें माण्डवी के साथ भरत ने और श्रुतकीर्ति के साथ शत्रुघ्न ने विवाह किया। तदनन्तर राजा जनक से भलीभाँति पूजित हो श्रीरामचन्द्रजी ने वशिष्ठ आदि महर्षियों के साथ वहाँ से प्रस्थान किया। मार्ग में जमदगिन नन्दन परशुराम को जीतकर वे अयोध्या पहुंचे। वहाँ जाने पर भरत और शत्रुघ्न अपने मामा राजा युधाजित की राजधानी को चले गये ॥१० - १५॥

परशुराम अवतार के कथा ( अग्निपुराण - चौथा अध्याय)

देवता और ब्रह्मण आदि का पालन करने वाले श्रीहरि ने जब देखा कि भूमण्डल के क्षत्रिय उद्धत स्वभाव के हो गये हैं, तो वे उन्हें मारकर पृथ्वी का भार उतारने और सर्वत्र शान्ति स्थापित करने के लिए जमदग्नि के अंशद्वारा रेणुका के गर्भ से अवतीर्ण हुए ।

भृगुनन्दन परशुराम शस्त्र विद्या के परांगत विद्वान थे । उन दिनों कृतवीर्य का पुत्र राजा अर्जुन भगवान् दत्तात्रेयजी की कृपा से हजार बाँहें पाकर समस्त भूमण्डल पर राज करता था । एक दिन वह वन में शिकार खेलने के लिए गया ॥ ८-१४॥

वहाँ वह बहुत थक गया । उस समय जमदग्नि मुनि ने उसे सेना सहित अपने आश्रम पर निमन्त्रित किया और कामधेनु के प्रभाव से सबको भोजन कराया। राजा ने मुनि से कामधेनु को अपने लिए माँगा; किन्तु उन्होने देने से इन्कार कर दिया। तब उसने बलपूर्वक उस धेनु को छीन लिया। यह समाचार पाकर परशुरामजीने हैहयपूरी में जा उसके साथ युद्ध किया और अपने फरसे से उसका मस्तक काटकर रणभूमि में उसे मार गिराया। फिर वे कामधेनु को साथ लेकर अपने आश्रम पर लौट आये।

एक दिन परशुरामजी जब वन में गये हुए थे, कृतवीर्य के पुत्रों ने आकर अपने पिता के वैर का बदला लेने के लिए जमदग्नि मुनि को मार डाला। जब परशुरामजी लौट कर आए तो अपने पिता को मारा गया देख उनके मन में बड़ा क्रोध हुआ उन्होंने इक्कीस बार समस्त भूमण्डल के क्षेत्रियों का संहार किया । फिर कुरुक्षेत्र में पाँच कुण्ड बनाकर वहीं उन्होंने अपने पितरों का तर्पण किया और सारी पृथ्वी कश्यप मुनि को दान देकर,वे महेन्द्रपर्वत पर रहने लगे ॥१५- २१॥

वामन अवतार के कथा ( अग्निपुराण - चौथा अध्याय)

पूर्वकाल में देवता और असुरों में युद्ध हुआ । उस युद्ध में बलि आदि दैrयों ने देवताओं को परास्त करके उन्हें स्वर्ग से निकाल दिया । तब वे श्रीहरि के शरण में गये । भगवान् ने उन्हें अभयदान दिया कश्यप तथा अदिति की स्तुति से प्रसन्न हो, वे अदिति के गर्भ से वामन रूप में प्रकट हुए ।

उस समय दैत्यराज बलि गंगाद्वार में यज्ञ कर रहे थे । भगवान् उनके यज्ञ में गये और वहाँ यजमान की स्तुति गान करने लगे ॥ ४ -७॥

वामन के मुख से वेदों का पाठ सुनकर राजा बलि उन्हें वर देने को उदृत हो गये और शुक्राचार्य के मना करने पर भी बोले - "ब्रह्मन! आपकी जो इच्छा हो, मुझसे मांगें। मैं आपको वह वस्तु अवश्य दूंगा। वामन ने बलि से कहा - " मुझे अपने गुरु के लिए तीन पग भूमि की आवश्यकता है; वही दिजिए।'' बलि ने कहा - " अवश्य दूँगा।" तब संकल्प का जल हाथ में पड़ते ही भगवान् वामन " अवामन" हो गये। उन्होंने विराट रूप धारण कर लिया, और भूर्लोक, भुवर्लेक एवं स्वर्गलोक को अपने तीन पगों नाप लिया । श्रीहरि ने बलि को सुतललोक में भेज दिया, और त्रिलोकी का राज्य इन्द्र को दे डाला । इन्द्र ने देवताओं के साथ भगवान् श्रीहरि का स्तवन किया। वे तीनों लोकों के स्वामी होकर सुख से रहने लगे ।

बुधवार, 25 मार्च 2020

नृसिंह अवतार के कथा ( अग्निपुराण - चौथा अध्याय)

हिरण्याक्ष के एक भाई था, जो " हिरण्यकशिपू" के नाम से प्रसिद्ध था। उसने देवताओं के यज्ञ भाग अपने अधीन कर लिए और उन सबके अधिकार छीनकर वह स्वयं ही उसका उपभोग करने लगा। भगवान् नृसिंह रूप धारण करके उसके सहायक असुरों सहित उस दैत्य का वध किया। तrपश्चात सम्पूर्ण देवताओं को अपने - अपने पद पर प्रतिष्ठत कर दिया। उस समय देवताओं ने उन नृसिंह का स्तवन किया। 

वराह अवतार के कथा ( अग्निपुराण - चौथा अध्याय)

अग्निदेव कहते हैं - वशिष्ठ! पूर्वकाल में " हिरण्याक्ष" नामक दैत्य असुरों का राजा था। वह देवताओं को जीतकर स्वर्ण में रहने लगा। देवताओं ने भगवान विष्णु के पास जाकर उनकी स्तुति की। तब उन्होंने यज्ञवाराह रूप धारण किया और देवताओं के कण्टक रूप उस दानव को दैत्य सहित मारकर एवम् देवताओं आदि की रक्षा की । उसके बाद भगवान श्रीहरि अन्तर्धान हो गये॥ १- ५ ॥

समुद्र - मंथन, कूर्म तथा मोहिनी - अवतार की कथा (आग्निपुराण - तीसरा अध्याय)

अग्नि देव कहते हैं - पूर्वकाल की बात हैं, देवासुर - संग्राम में दैत्यों ने देवताओं को परास्त कर दिया । वे दुर्वासा के शाप से भी लक्ष्मी से रहित हो गए थे । तब सम्पूर्ण देवता क्षीरसागर में शयन करने वाले भगवान विष्णु के पास जाकर बोले -'' भगवन् ! आप देवनाओं की रक्षा कीजिए ।'' यह सुनकर श्रीहरिने ब्रह्मा आदि देवताओं से कहा -'' देवगण! तुमलोग क्षीरसमुद्र को मथने, अमृत प्राप्त करने और लक्ष्मी को पाने के लिए असुरों से सन्धि कर लेनी चाहिए । मैं तुमलोगों को अमृत का भागी बनाऊँगा और दैत्यों को उसे वञ्चित रखूँगा । मन्दराचल को मथानी और वासु की नाग को नेती बनाकर आलस्यरहित हो मेरी सहायता से क्षीरसागर का मन्थन करो ।'' भगवान् विष्णु एसा कह ने पर देवता दैत्यों के साथ संधि करके क्षीरसमुद्र पर आये । फिर तो उन्हें एक साथ मिलकर समुद्र - मंथन आरम्भ किया जिस ओर वासु कि नाग की पुंछ थी, उसी ओर देवता खड़े थे । दानव वासु कि नाग के निःश्वास से क्षीण हो रहे थे और देवताओं को भगवान् अपनी कृपा दृष्टि से परिपुष्ट कर रहे थे । समुद्र - मन्थनआरम्भ होने पर कोई आधार न मिलने से मन्दराचल पर्वत समुद्र में डुब गया ॥ १ -७॥
तब भगवान विष्णु ने कूर्म (कछुए) का रूप धारण करके मन्दराचल को अपनी पीठ पर रख लिया । फिर जब समुद्र मथा जाने लगा, तो उसके भीतर से हलाहल विष प्रकट हुआ । उसे भगवान शंकर ने अपने कण्ठ में धारण कर लिया । इससे कण्ठ में काला दाग पड़ जाने के कारण वे 'नीलकण्ठ' नाम से प्रसिद्ध हुए । तत्पश्चात समुद्र से वारुणी देवी, पारिजात वृक्ष, कौस्तुभमणि, गौएँ तथा दिव्य अप्सराएँ प्रकट हुईं। फिर लक्ष्मी देवी का प्रादुर्भाव हुआ । वे भगवान विष्णु को प्राप्त हुई। सम्पूर्ण देवताओं ने उनका दर्शन और स्तवन किया। इससे वे लक्ष्मीवान हो गये । तदनन्तर भगवान विष्णुके अंशभूत धन्वन्तरि, जो आयुर्वेद के प्रवर्तक हैं, हाथ में अमृत से भरा हुआ कलश लिए प्रकट हुए । दैत्यों ने उनके हाथ से अमृत छीन लिया और उसमें से आधा देवताओं देकर वे सब चलते बने। उनमें जम्भ आदि दैत्य प्रधान थे। उन्हें जाते देख भगवान् विष्णु ने स्त्री का रूप धारण किया। उस रुपवती स्त्री को देखकर दैत्य मोहित हो गये और बोले -' सुमुखि! तुम हमारी भार्या हो जाओ और यह अमृत लेकर हमें पिलाओ ।' ' बहुत अच्छा' कहकर भगवान् ने उनके हाथ से अमृत ले लिया और उसे देवताओं को पिला दिया । उस समय राहु चन्द्रमा का रूप धारण करके अमृत पीने लगा । तब सूर्य और चन्द्रमा उसके कपट वेष को प्रकट कर दिया ॥ ८ - १४ ॥
यह देख भगवान श्रीहरि ने चक्र से उसका मस्तक काट डाला । उसका सिर अलग हो गया और भुजाओंसहित धर अलग रह गया । फिर भगवान् को दया आई उन्होंने राहु को अमर कर दिया । तब ग्रहस्वरूप राहु भगवान् श्रीहरि से कहा -' इन सूर्य और चन्द्रमा को मेरे द्वारा अनेको बार ग्रहण लगेगा । उस समय समय संसार के लोग जो कुछ दान करें, वह सब अक्षय हो । भगवान् विष्णु ने 'तथास्तु' कहकर सम्पूर्ण देवताओं के साथ राहु की बात का अनुमोदन किया । इसके बाद भगवान् ने स्त्री रूप त्याग दिया; किंतु महादेवजी को भगवान् के उस रूप का पुनदर्शन करने की इच्छा हुई। अतः उन्होंने अनुरोध किया -' भगवन् आप अपने स्त्रीरूप का दर्शन करावें । महादेवजी की प्रार्थना से भगवान श्रीहरि ने उन्हें अपने स्त्रीरूप का दर्शन कराया । वे भगवान् की माया से एसे मोहित हो गए की पार्वतीजी को त्यागकर उस स्त्री के पीछे लग गए। उन्होंनें नग्न और उन्मत्त होकर मोहिनी के केश पकड़ लिए । मोहिनी अपने केशों को छुड़ा कर चल दी। उसे जाती देख महादेवजी भी उसके पीछे - पीछे दौड़ने लगे। उस समय पृथ्वी पर जहाँ - जहाँ भगवान् शंकर का वीर्य गिरा, वहाँ - वहाँ शिवलिंगों का क्षेत्र एवं सुवर्ण की खानें हो गई। तत्पश्चात ' यह माया है' - ऐसा जानकर भगवान् शंकर अपने स्वरूप में स्थित हुए। तब भगवान् श्रीहरि ने प्रकट होकर शिवजी से कहा - ' रूद्र तुमने मेरी माया को जीत लिया । पृथ्वी पर तुम्हारे शिवा दूसरा कोई ऐसा पुरुष नहीं है, जो मेरी इस माया को जीत सके ।'
भगवान् के प्रयत्न से दैत्यों को अमृत नहीं मिलने पाया; अतः देवताओं ने उन्हें युद्ध में मार गिराया। फिर देवता स्वर्ग में विराजमान हुए और दैत्य लोग पाताल में रहने लगे ॥१५-२३॥ 

मंगलवार, 24 मार्च 2020

मात्स्यावतार की कथा (अग्निपुराण - दूसरा अध्याय )

वशिष्ठजी ने कहा - अग्निदेव! आप सृष्टि आदि के कारणभूत भगवान विष्णु के मत्स्य आदि अवतारों का वर्णन किजिये। साथ ही ब्रह्मस्वरूप अग्निपुराण को भी सुनाइये, जिसे पुर्वकाल में आपने श्रीविष्णु भगवान के मुख से सुना था ।।१।।








अग्निदेव बोले - वशिष्ठ! सुनो, मैं श्रीहरि के मत्स्यावतार का वर्णन करता हूँ । अवतार- धारण का कार्य दुष्टों के विनाश और साधु - पुरुषों की रक्षा के लिए होता है | बीते हुए कल्प के अन्त में  "ब्राह्म" नामक नैमित्तिक प्रलय हुआ था । मुने! उस समय " भू " आदि लोक समुद्र के जल में डुब गये थे । प्रलय के पहले की बात है । वैवस्वत मनु भोग और मोक्ष की सिद्धि के लिए तपस्या कर रहे थे। एक दिन जब वे कृतमाला नदि में जल से पितरों का तर्पण कर रहे थे, उनकी अन्जलि के जल में एक बहुत छोटा- सा मत्स्य आ गया। राजा ने उसे जल में फेंक देने का विचार किया । तब मत्स्य ने कहा - 'महाराज मुझे जल में न फेंके । यहाँ ग्राह आदि जल - जन्तुओं से मुझे भय है ।' यह सुनकर मनु ने उसे अपके कलश के जल में डाल दिया । मत्स्य उसमें पड़ते ही बड़ा हो गया और पुनः मनु से कहा -' राजन् मुझे इससे बड़ा स्थान दो ।' उसकी यह बात सुनकर राजा ने उसे एक बड़े जलपात्र में डाल दिया । उसमें भी बड़ा होकर मत्स्य ने राजा से बोला - ' मनो! मुझे कोई विस्तृत स्थान दो।' तब उन्होंने पुनः उसे सरोवर के जल में डाला; किंतु वहाँ भी बढ़कर वह सरोवर के बराबर हो गया और बोला - ' मुझे इससे बड़ा स्थान दो ।' तब मनु ने उसे फिर समुद्र में ही ले जाकर डाल दिया । वहाँ वह मत्स्य क्षण भर में लाख योजन बडा हो गया । उस अदभुत मत्स्य को देखकर मनु को बडा विस्मय हुआ । वे बोले - 'आप कौन हैं? निश्चय ही आप भगवान् श्रीविष्णु जान पड़ते हैं । नारायण! आपको नमस्कार है । जनार्दन! आप किसलिए अपनी माया से मुझे मोहित कर रहे हैं ।।२-१०।।

मनु के एसा कहने पर सबके पालन में संलग्र रहने वाले मत्स्य रूप धारी भगवान् उनसे बोले -' राजन् ! मैं दुष्टों का नाश और जगत की रक्षा करने के लिए अवतीर्ण हुआ हूँ । आज से सातवें दिन समुद्र सम्पूर्ण जगत को डुबा देगा उस समय तुम्हारे पास नौक उपस्थित होगी । तुम उस पर सब प्रकार के बीज आदि रखकर बैठ जाना । सप्तर्षि भी तुम्हारे साथ रहेंगे। जब तक ब्रह्या की रात रहेगी, तबतक तुम उसी नाव पर विचरते रहोगे । नाव आने के बाद मैं भी इसी रूप में उपस्थित होऊँगा । उस समय तुम मेरे सिंग में महासर्पमयी रस्सी से उस नाव को बाँध देना । ऐसा कहकर भगवान मत्स्य अन्तर्धान हो गये और वैवस्वत मनु उनके बताये हुए समय की प्रतीक्षा करते हुए वहीं रहने लगे । जब नियत समय पर समुद्र अपनी सीमा लांघकर बढ़ने लगा, तब वे पूर्वोक्त नौकापर बैठ गये । उस समय एक सींग धारण करने सुवर्णमय मत्स्य भगवान का प्रादुर्भाव हुआ। उनका विशाल शरीर दस लाख योजन लंबा था। उनके सींग में नाव बांध कर राजा ने उसे 'मत्स्य' नामक पुराण का श्रवण किया, जो सब पापों का नाश करनेवाला है। मनु मत्स्य भगवान की नाना प्रकार के स्तोत्रों द्वारा स्तुति भी करते थे । प्रलय के अन्त में ब्रह्या जी से वेद को हर लेनेवाले ' हयग्रीव' नामक दानव का वध करके भगवान ने वेद मन्त्र आदि की रक्षा की। तत्पश्चात वाराहकल्प आने पर श्रीहरि ने कच्छप रूप धारण किया ॥११ - १७॥