मंगलवार, 31 मार्च 2020

रामायण - किष्किन्धा काण्ड (अग्निपुराण - आठवाँ अध्याय)

नारदजी कहते हैं - श्रीरामचन्द्रजी पम्पा सरोवर पर जाकर सीता के लिये शोक करने लगे। वहाँ वे शबरी से मिले। फिर हनुमानजी से उनकी भेट हुई। हनुमानजी उन्हें सुग्रीव के पास ले गये और सुग्रीव के साथ उनकी मित्रता करायी। श्रीरामचन्द्रजी सबके देखते - देखते ताड़ के सात वृक्षों को एक ही बाण से बीन्ध डाला और दुन्दुभि नामक दानव के विशाल शरीर को पैर की ठोकर से दस योजन दूर फेंक दिया। इसके बाद सुग्रीव के शत्रु वाली को, जो भाई होते हुये भी उसके साथ वैर रखता था, मार डाला और किष्किन्धापुरी, वानरो का साम्राज्य, रुमा और तारा इन सबको ऋष्यमूक पर्वत पर वानरराज सुग्रीव के अधीन कर दिया। तदनन्तर किष्किन्धापुरी के स्वामी सुग्रीव ने कहा - ' श्रीराम! आपको सीताजी की प्राप्ति जिस प्रकार भी हो सके, ऐसा उपाय मैं कर रहा हूँ।' यह सुनने के बाद श्रीरामचन्द्रजी ने माल्यवान पर्वत के शिखर पर वर्षा के चार महीने व्यतीत किये और सुग्रीव किष्किन्धा में रहने लगे। चौमासे के बाद भी जब सुग्रीव दिखाई नही दिये, तब श्रीरामचन्द्रजी की आज्ञा से लक्ष्मण ने किष्किन्धा में जाकर कहा - 'सुग्रीव! तुम श्रीरामचन्द्रजी के पास चलो। अपनी प्रतिज्ञा पर अटल रहो, नही तो वाली मरकर जिस मार्ग से गया है, वह मार्ग अभी बन्द नही हुआ है। अतएव वाली के पथ का अनुसरण न करो।' सुग्रीव ने कहा - 'सुमित्रानन्दन! विषय भोग में आसक्त हो जाने के कारण मुझे बीते हुए समय का भान न रहा। अतः मेरे अपराध को क्षमा किजीए'।।१-७॥

ऐसा कहकर वानरराज सुग्रीव श्रीरामचन्द्रजी के पास गये और उन्हें नमस्कार करके बोले - 'भगवन! मैंने सब वानरों को बुला लिया है। अब आपकी इच्छा के अनुसार सीताजी की खोज करने के लिए उन्हें भेजुँगा। वे पूर्वादि दिशाओं में जाकर एक महिने तक सीताजी की खोज करें। जो एक महिने के बाद लौटेगा मैं उसे मार डालूँगा। यह सुनकर बहुत - से वानर पूर्व, पश्चिम और उत्तर दिशाओं के मार्ग पर चल पड़े तथा वहाँ जनककुमारी को न पाकर नियत समय के भीतर श्रीराम और सुग्रीव के पास लौट आए। हनुमानजी श्रीरामचन्द्रजी की दी हुई अँगूठी लेकर अन्य वानरों के साथ दक्षिण दिशा में जानकीजी की खोज कर रहे थे। वे लोग सुप्रभा की गुफा के निकट विन्ध्यपर्वत पर ही एक माससे अधिक काल तक ढुँढते फिरे; किंतु उन्हें सीताजी का दर्शन हुआ। अन्त में निराश होकर आपस में कहने लगे - "हमलोगों को व्यर्थ ही प्राण देने पड़ेंगे, धन्य है वह जटायु, जिसने सीता के लिए रावण के द्वारा मारा जाकर युद्ध में प्राण त्याग दिया था"॥८ - १३॥

उनकी यह बातें संपाति नामक गिद्ध के कानों में पड़ी। वह वानरों के प्राण त्यागने की चर्चा से उनको खाने की ताक में लगा था। किंतु जटायु की चर्चा सुनकर रुक गया और बोला - 'वानरों! जटायु मेरा भाई था। वह मेरे ही साथ सुर्य मण्डल की ओर उड़ा चला जा रहा था। मैंने अपनी पंखों की ओट में रखकर सूर्य की प्रखर किरणों के ताप से बचाया। अतः वह तो सकुशल बच गया; किंतु मेरे पंखें जल गयीं, इसलिए मैं यहीं गिर पड़ा। आज श्रीरामचन्द्रजी की वार्ता सुनने से फिर मेरे पंख निकल आये। अब मैं जानकीजी को देखता हूँ; वे लंका में अशोक वाटिका के भीतर हैं। लवण समुद्र के द्वीप में त्रिकूट पर्वत पर लंका बसी हुई है। यहाँ से वहाँ तक का समुद्र सौ योजन विस्तृत है। यह जानकर सब वानर श्रीराम और सुग्रीव के पास जायें और उन्हें सब समाचार बता दें॥१४-१७ ॥

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