नारदजी कहते हैं - श्रीरामचन्द्रजी के आदेश से अङ्गद रावण के पास गये और बोले - 'रावण! तुम जनककुमारी सीता को ले जाकर शीघ्र ही श्रीरामचन्द्रजी को सौंप दो, अन्यथा मारे जाओगे।' यह सुनकर रावण उनहें मारने को तैयार हो गया। अङ्गद राक्षसों को मार - पीटकर लौट आये और श्रीरामचन्द्रजी से बोले - 'भगवन! रावण केवल युद्ध करना चाहता है।' अङ्गद की बात सुनकर श्रीराम वानरों की सेना साथ ले युद्ध के लिए लङ्का में प्रवेश किया। हनुमान, मैन्द, द्विविद, जाम्बवान, नल, नील, तार, अङ्गद, धुम्र, सुषेण, केशरी, गज, पनस, विनत, रम्भ, शरभ, महाबली कम्पन, गवाक्ष, दधिमुख, गवय और गन्धमादन - ये सब तो वहॉं आये ही, अन्य भी बहुत से वानर आ पहुँचे। इन असंख्य वानरों सहित कपिराज सुग्रीव भी युद्ध के लिये उपस्थित थे। फिर तो राक्षसों और वानरों में घमासान युद्ध छिड़ गया। राक्षस वानरों को बाण, शक्ति और गदा आदि के द्वारा मारने लगे और वानर नख, दॉंत और शिला आदि के द्वारा राक्षसों का संहार करने लगे। राक्षसों की हाथी, घोड़े, रथ और पैदलों से युक्त चतुरङ्गिणी सेना नष्ट - भ्रष्ट हो गयी। हनुमान ने पर्वत शिखर से अपने वैरी धुम्राक्ष का वध कर डाला। नील ने भी युद्ध के लिये सामने आये हुये अकम्पन और प्रहस्त को मौत के घाट उतार दिया।।१-८।।
श्रीराम और लक्ष्मण यद्द्पि इन्द्रजित के नागास्त्र से बँध गये थे, तथापि गरुड़ की द्द्ष्टि पड़ते ही उससे मुक्त हो गए। तत्पश्चात उन दोनों भाइयों ने बाणों से राक्षसी सेना का संहार करना आरम्भ किया। श्रीराम ने रावण को युद्ध में अपने बाणों की मार से जर्जरित कर डाला। इससे दुःखित होकर रावण ने कुम्भकर्ण को सोते से जगाया। जागने पर कुम्भकर्ण ने हजार घड़े मदिरा पीकर कितने ही भैंस आदि पशुओं का भक्षण किया। फिर रावण से कुम्भकर्ण बोला - "सीता का हरण करके तुमने पाप किया है। तुम मेरे बड़े भाई हो, इसीलिए तुम्हारे कहने से युद्ध करने जाता हूँ। मैं वानरों सहित राम को मार दूँगा।।९-१२।।
ऐसा कहकर कुम्भकर्ण ने समस्त वानरों को कूचलना आरम्भ किया। एक बार उसने सुग्रीव को पकड़ लिया, तब सुग्रीव ने उसके नाक और कान काट लिये। नाक और कान से रहित होकर वह वानरों का भक्षण करने लगा। यह देख श्रीरामचन्द्रजी ने अपने बाणों से कुम्भकर्ण दोनों भुजाएँ काट डालें। इसके बाद उसके दोनों पैर तथा मस्तक काटकर उसे पृथ्वी पर गिरा दिया। इस तरह और भी बहुत से युद्ध परायण राक्षसों को श्रीराम, लक्ष्मण, विभिषण एवं वानरों ने पृथ्वी पर सुला दिया। तत्पश्चात इन्द्रजित ने माया से युद्ध करते हुए वरदान में प्राप्त हुए नागपाश द्वारा श्रीराम और लक्ष्मण को बॉंध लिया। उस समय हनुमानजी के द्वारा लाये हुए पर्वत पर उगी हुई "विशल्या" नाम की औषधि से श्रीराम और लक्ष्मण के घाव अच्छे हुए। उनके शरीर से बाण निकाल दिये गये। हनुमानजी पर्वत को जहॉं से लाये थे, वहीं उसे पुन: रख आये। इधर मेघनाद निकुम्भिलादेवी के मन्दिर में होम आदि करने लगा। उस समय लक्ष्मण ने अपने बाणों से इन्द्र को भी परास्त करनेवाले उस वीर को युद्ध में मार गिराया। पुत्र की मृत्यु पाकर रावण शोक से सन्तप्त हो उठा; और सीता को मार डालने के लिए उद्दत हो उठा; किंतु अविन्ध्य के मना करने से वह मान गया और रथ पर बैठकर सेना सहित युद्ध भूमि में गया। तब इन्द्र के आदेश से मातलि ने आकर श्रीरघुनाथजी को भी रथ पर बिठाया।।१३-२२।।
श्रीराम और रावण का युद्ध श्रीराम और रावण के युद्ध के समान ही था, उसकी कहीं भी कोई दुसरी उपमा नहीं थी। रावण वानरों पर प्रहार करता था और हनुमान आदि वानर रावण को चोट पहूँचाते थे। जैसे मेघ पानी बरसाता है, उसी प्रकार श्रीरघुनाथजी रावण के उपर अस्त्र - शस्त्रों की वर्षा आरम्भ कर दी। उन्होंने रावण के रथ, ध्वज, अश्व, सारथि, धनुष, बाहु और मस्तक काट डाले। कटे हुए मस्तक के स्थान पर दूसरे नये मस्तक उत्पन्न हो जाते थे। यह देखकर श्रीरामचन्द्रजी ने ब्र्म्हास्त्र के द्वारा रावण का वक्ष:स्थल विदीर्ण करके उसे रणभूमि में गिरा दिया। उस समय मरने से बचे हुए सब राक्षसों के साथ रावण की अनाथा स्त्रियॉं विलाप करने लगीं। तब श्रीरामचन्द्रजी के आज्ञा से विभिषण ने उन सबको सान्त्वना दे, रावण के शव का दाह-संस्कार किया। तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजी हनुमानजी के द्वारा सीताजी को बुलवाया। यद्यपि वे स्वरुप से ही नित्य शुद्ध थीं, तो भी उन्होंने अग्नि में प्रवेश करके अपनी विशुद्धता का परिचय दिया। तत्पश्चात रघुनाथजी ने उन्हें स्वीकार किया। इसके बाद इन्द्रादि देवताओ ने उनका स्तवन किया। फिर ब्रह्माजी तथा स्वर्गवासी महराज दशरथ ने आकर स्तुति करते हुए कहा - 'श्रीराम तुम राक्षसों का संहार करने वाले साक्षात श्रीविष्णु हो।' फिर श्रीराम के अनुरोध से इन्द्र ने अमृत बरसाकर मरे हुए वानरों को जीवित कर दिया। समस्त देवता युद्ध देखकर, श्रीरामचन्द्रजी के द्वारा पूजित हो, स्वर्गलोक में चले गये। श्रीरामचन्द्रजी ने लङ्का का राज्य विभिषण को दे दिया और वानरों का विशेष सम्मान किया।।२३-२९।।
फिर सबको साथ ले, सीता सहित पुष्पक विमान पर बैठकर श्रीराम जिस मार्ग से आये थे, उसी से लौट चले। मार्ग में वे सीता को प्रसन्नचित्त होकर वनों और दुर्गम स्थानों को दिखाते जा रहे थे। प्रयाग में वे महर्षि भारद्वाज को प्रणाम करके वे अयोध्या के पास नन्दिग्राम में आये। वहॉं भरत ने उनके चरणों में प्रणाम किया। फिर वे अयोध्या में आकर रहने लगे। सबसे पहले उन्होंने महर्षि वशिष्ठ आदि को नमस्कार करके क्रमश: कौशल्या, कैकयी और सुमित्रा के चरणों में मस्तक झुकाया। फिर राज्य ग्रहण करके ब्राह्मणों आदि का पूजन किया। अश्वमेध - यज्ञ करके उन्होंने अपने आत्मस्वरुप श्रीवासुदेव का यजन किया, सब प्रकार के दान दिये और प्रजाजनों का पुत्रवत पालन करने लगे। धर्म और कामादि भी सेवन किया तथा वे दुष्टों को सदा दण्ड देते रहे। उनके राज्य में सब लोग धर्म परायण थे तथा पृथ्वी पर सब प्रकार की खेती फूली - फली रहती थी। श्रीरघुनाथजी के समयकाल में किसी की भी अकालमृत्यु भी नही होती थी।।३०-३५।।
श्रीराम और लक्ष्मण यद्द्पि इन्द्रजित के नागास्त्र से बँध गये थे, तथापि गरुड़ की द्द्ष्टि पड़ते ही उससे मुक्त हो गए। तत्पश्चात उन दोनों भाइयों ने बाणों से राक्षसी सेना का संहार करना आरम्भ किया। श्रीराम ने रावण को युद्ध में अपने बाणों की मार से जर्जरित कर डाला। इससे दुःखित होकर रावण ने कुम्भकर्ण को सोते से जगाया। जागने पर कुम्भकर्ण ने हजार घड़े मदिरा पीकर कितने ही भैंस आदि पशुओं का भक्षण किया। फिर रावण से कुम्भकर्ण बोला - "सीता का हरण करके तुमने पाप किया है। तुम मेरे बड़े भाई हो, इसीलिए तुम्हारे कहने से युद्ध करने जाता हूँ। मैं वानरों सहित राम को मार दूँगा।।९-१२।।
ऐसा कहकर कुम्भकर्ण ने समस्त वानरों को कूचलना आरम्भ किया। एक बार उसने सुग्रीव को पकड़ लिया, तब सुग्रीव ने उसके नाक और कान काट लिये। नाक और कान से रहित होकर वह वानरों का भक्षण करने लगा। यह देख श्रीरामचन्द्रजी ने अपने बाणों से कुम्भकर्ण दोनों भुजाएँ काट डालें। इसके बाद उसके दोनों पैर तथा मस्तक काटकर उसे पृथ्वी पर गिरा दिया। इस तरह और भी बहुत से युद्ध परायण राक्षसों को श्रीराम, लक्ष्मण, विभिषण एवं वानरों ने पृथ्वी पर सुला दिया। तत्पश्चात इन्द्रजित ने माया से युद्ध करते हुए वरदान में प्राप्त हुए नागपाश द्वारा श्रीराम और लक्ष्मण को बॉंध लिया। उस समय हनुमानजी के द्वारा लाये हुए पर्वत पर उगी हुई "विशल्या" नाम की औषधि से श्रीराम और लक्ष्मण के घाव अच्छे हुए। उनके शरीर से बाण निकाल दिये गये। हनुमानजी पर्वत को जहॉं से लाये थे, वहीं उसे पुन: रख आये। इधर मेघनाद निकुम्भिलादेवी के मन्दिर में होम आदि करने लगा। उस समय लक्ष्मण ने अपने बाणों से इन्द्र को भी परास्त करनेवाले उस वीर को युद्ध में मार गिराया। पुत्र की मृत्यु पाकर रावण शोक से सन्तप्त हो उठा; और सीता को मार डालने के लिए उद्दत हो उठा; किंतु अविन्ध्य के मना करने से वह मान गया और रथ पर बैठकर सेना सहित युद्ध भूमि में गया। तब इन्द्र के आदेश से मातलि ने आकर श्रीरघुनाथजी को भी रथ पर बिठाया।।१३-२२।।
श्रीराम और रावण का युद्ध श्रीराम और रावण के युद्ध के समान ही था, उसकी कहीं भी कोई दुसरी उपमा नहीं थी। रावण वानरों पर प्रहार करता था और हनुमान आदि वानर रावण को चोट पहूँचाते थे। जैसे मेघ पानी बरसाता है, उसी प्रकार श्रीरघुनाथजी रावण के उपर अस्त्र - शस्त्रों की वर्षा आरम्भ कर दी। उन्होंने रावण के रथ, ध्वज, अश्व, सारथि, धनुष, बाहु और मस्तक काट डाले। कटे हुए मस्तक के स्थान पर दूसरे नये मस्तक उत्पन्न हो जाते थे। यह देखकर श्रीरामचन्द्रजी ने ब्र्म्हास्त्र के द्वारा रावण का वक्ष:स्थल विदीर्ण करके उसे रणभूमि में गिरा दिया। उस समय मरने से बचे हुए सब राक्षसों के साथ रावण की अनाथा स्त्रियॉं विलाप करने लगीं। तब श्रीरामचन्द्रजी के आज्ञा से विभिषण ने उन सबको सान्त्वना दे, रावण के शव का दाह-संस्कार किया। तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजी हनुमानजी के द्वारा सीताजी को बुलवाया। यद्यपि वे स्वरुप से ही नित्य शुद्ध थीं, तो भी उन्होंने अग्नि में प्रवेश करके अपनी विशुद्धता का परिचय दिया। तत्पश्चात रघुनाथजी ने उन्हें स्वीकार किया। इसके बाद इन्द्रादि देवताओ ने उनका स्तवन किया। फिर ब्रह्माजी तथा स्वर्गवासी महराज दशरथ ने आकर स्तुति करते हुए कहा - 'श्रीराम तुम राक्षसों का संहार करने वाले साक्षात श्रीविष्णु हो।' फिर श्रीराम के अनुरोध से इन्द्र ने अमृत बरसाकर मरे हुए वानरों को जीवित कर दिया। समस्त देवता युद्ध देखकर, श्रीरामचन्द्रजी के द्वारा पूजित हो, स्वर्गलोक में चले गये। श्रीरामचन्द्रजी ने लङ्का का राज्य विभिषण को दे दिया और वानरों का विशेष सम्मान किया।।२३-२९।।
फिर सबको साथ ले, सीता सहित पुष्पक विमान पर बैठकर श्रीराम जिस मार्ग से आये थे, उसी से लौट चले। मार्ग में वे सीता को प्रसन्नचित्त होकर वनों और दुर्गम स्थानों को दिखाते जा रहे थे। प्रयाग में वे महर्षि भारद्वाज को प्रणाम करके वे अयोध्या के पास नन्दिग्राम में आये। वहॉं भरत ने उनके चरणों में प्रणाम किया। फिर वे अयोध्या में आकर रहने लगे। सबसे पहले उन्होंने महर्षि वशिष्ठ आदि को नमस्कार करके क्रमश: कौशल्या, कैकयी और सुमित्रा के चरणों में मस्तक झुकाया। फिर राज्य ग्रहण करके ब्राह्मणों आदि का पूजन किया। अश्वमेध - यज्ञ करके उन्होंने अपने आत्मस्वरुप श्रीवासुदेव का यजन किया, सब प्रकार के दान दिये और प्रजाजनों का पुत्रवत पालन करने लगे। धर्म और कामादि भी सेवन किया तथा वे दुष्टों को सदा दण्ड देते रहे। उनके राज्य में सब लोग धर्म परायण थे तथा पृथ्वी पर सब प्रकार की खेती फूली - फली रहती थी। श्रीरघुनाथजी के समयकाल में किसी की भी अकालमृत्यु भी नही होती थी।।३०-३५।।
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