पूर्वकाल में देवता और असुरों में युद्ध हुआ । उस युद्ध में बलि आदि दैrयों ने देवताओं को परास्त करके उन्हें स्वर्ग से निकाल दिया । तब वे श्रीहरि के शरण में गये । भगवान् ने उन्हें अभयदान दिया कश्यप तथा अदिति की स्तुति से प्रसन्न हो, वे अदिति के गर्भ से वामन रूप में प्रकट हुए ।
उस समय दैत्यराज बलि गंगाद्वार में यज्ञ कर रहे थे । भगवान् उनके यज्ञ में गये और वहाँ यजमान की स्तुति गान करने लगे ॥ ४ -७॥
वामन के मुख से वेदों का पाठ सुनकर राजा बलि उन्हें वर देने को उदृत हो गये और शुक्राचार्य के मना करने पर भी बोले - "ब्रह्मन! आपकी जो इच्छा हो, मुझसे मांगें। मैं आपको वह वस्तु अवश्य दूंगा। वामन ने बलि से कहा - " मुझे अपने गुरु के लिए तीन पग भूमि की आवश्यकता है; वही दिजिए।'' बलि ने कहा - " अवश्य दूँगा।" तब संकल्प का जल हाथ में पड़ते ही भगवान् वामन " अवामन" हो गये। उन्होंने विराट रूप धारण कर लिया, और भूर्लोक, भुवर्लेक एवं स्वर्गलोक को अपने तीन पगों नाप लिया । श्रीहरि ने बलि को सुतललोक में भेज दिया, और त्रिलोकी का राज्य इन्द्र को दे डाला । इन्द्र ने देवताओं के साथ भगवान् श्रीहरि का स्तवन किया। वे तीनों लोकों के स्वामी होकर सुख से रहने लगे ।
उस समय दैत्यराज बलि गंगाद्वार में यज्ञ कर रहे थे । भगवान् उनके यज्ञ में गये और वहाँ यजमान की स्तुति गान करने लगे ॥ ४ -७॥
वामन के मुख से वेदों का पाठ सुनकर राजा बलि उन्हें वर देने को उदृत हो गये और शुक्राचार्य के मना करने पर भी बोले - "ब्रह्मन! आपकी जो इच्छा हो, मुझसे मांगें। मैं आपको वह वस्तु अवश्य दूंगा। वामन ने बलि से कहा - " मुझे अपने गुरु के लिए तीन पग भूमि की आवश्यकता है; वही दिजिए।'' बलि ने कहा - " अवश्य दूँगा।" तब संकल्प का जल हाथ में पड़ते ही भगवान् वामन " अवामन" हो गये। उन्होंने विराट रूप धारण कर लिया, और भूर्लोक, भुवर्लेक एवं स्वर्गलोक को अपने तीन पगों नाप लिया । श्रीहरि ने बलि को सुतललोक में भेज दिया, और त्रिलोकी का राज्य इन्द्र को दे डाला । इन्द्र ने देवताओं के साथ भगवान् श्रीहरि का स्तवन किया। वे तीनों लोकों के स्वामी होकर सुख से रहने लगे ।
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