गुरुवार, 2 अप्रैल 2020

रामायण - सुन्दरकाण्ड की संक्षिप्त कथा (अग्निपुराण - नवाँ अध्याय)

नारदजी कहते हैं - सम्पति की बात सुनकर हनुमान आदि वानरों ने समुद्र की ओर देखा। फिर वे कहने लगे - 'कौन समुद्रों को लाँघकर वानरों को जीवन दान देगा?' वानरों की जीवन - रक्षा और श्रीरामचन्द्रजी के कार्य के प्रक्रिष्ट सिद्दी के लिये पवनकुमार हनुमानजी सौ योजन विस्तृत समुद्र को लॉंघ गये। लॉंघते समय अवलम्बन देने के लिये समुद्र से मैनाक पर्वत उठा। हनुमान ने द्दष्टि मात्र से उसका सत्कार किया। फिर छायाग्राहिणी सिंहिका ने सिर उठाया। वह उन्हें वह अपना ग्रास बनाना चाहती थी, इसलिए हनुमानजी ने उसे मार गिराया। समुद्र के पार जाकर उन्होंने लङ्कापुरी देखी। राक्षसों के घरों में खोज की; रावण के अन्त:पुर में तथा कुम्भ, कुम्भकर्ण, विभिषण, इन्द्रजित तथा अन्य राक्षसों के गृहों में जा - जाकर तलाश की; मद्यपान के स्थानों आदि में भी चक्कर लगाया। किंतु कहीं भी सीता उनकी द्दष्टि में नहीं पड़ी। अब वे बड़ी चिन्ता में पड़े। अन्त में जब अशोक वाटिका की ओर गये तो वहॉं शिंशपा वृक्ष के नीचे सीताजी उन्हें बैठी दिखाईं दीं। वहॉं राक्षसियॉं उनकी रखवाली कर रहीं थी। हनुमानजी ने शिंशपा वृक्ष पर चढकर देखा। रावण सीताजी से कह रहा था - 'तू मेरी स्त्री हो जा'; किंतु वे स्पष्ट शब्दों में 'ना' कर रहीं थीं। वहॉं बैठी राक्षसियॉं भी यही कहती थी - 'तू रावण की स्त्री हो जा।'

जब रावण चला गया तो हनुमानजी इस प्रकार कहना आरम्भ किया - ' अयोध्या में दशरथ नामवाले एक राजा थे। उनके दो पुत्र वनवास के लिए गये। वे दोनों भाई श्रेष्ठ पुरुष हैं। उनमें श्रीरामचन्द्रजी की पत्नी जनककुमारी सीता तुम्हीं हो। रावण तुम्हें बलपुर्वक हर ले आया है। श्रीरामचन्द्रजी इस समय सुग्रीव के मित्र हो गये हैं। उन्होंने तुम्हारी खोज करने के लिए ही मुझे भेजा है। पहचान के लिए गूढ सन्देश के साथ श्रीरामचन्द्र्जी ने अँगूठी दी है। उनकी दी हुई यह अँगूठी ले लो'।।१-९।।

सीताजी ने अँगूठी ले ली। उन्होंने वृक्ष पर बैठे हुए हनुमानजी को देखा। फिर हनुमानजी वृक्ष से उतरकर उनके सामने आ बैठे, तब सीता ने उनसे कहा - 'यदि श्रीरघुनाथजी जीवित हैं तो वे मुझे यहॉं से ले क्यों नहीं जाते?' इस प्रकार शंका करती हुई सीताजी से हनुमानजी ने इस प्रकार कहा - 'देवि सीते! तुम यहॉं हो, यह बात श्रीरामचन्द्र्जी नहीं जानते। मुझसे यह समाचार जान लेने के पश्चात सेनासहित राक्षस रावण को मारकर वे तुम्हें अवश्य ले जायेंगें। तुम चिन्ता न करो। मुझे कोई अपनी पहचान दो।' तब सीताजी ने हनुमानजी को अपनी चुड़ामणि उतारकर दे दी और कहा - 'भैया! अब ऐसा उपाय करो, जिससे श्रीरघुनाथजी शीघ्र आकर मुझे यहॉं से ले चलें। उन्हें कौए की आँख नष्ट कर देनेवाली घटना का स्मरण दिलाना; आज यहीं रहो, कल सबेरे चले जाना; तुम मेरा शोक दूर करने वाले हो। तुम्हारे आने से मेरा दु:ख बहुत कम हो गया है।' चुड़ामणि और काकवाली कथा को पहचान के रुप में लेकर हनुमानजी ने कहा - 'कल्याणि! तुम्हारे पतिदेव अब तुम्हें शीघ्र ही ले जायेंगें। अथवा यदि तुम्हें चलने की जल्दी हो, तो मेरी पीठ पर बैठ जाओ। मैं तुम्हें आज ही श्रीराम और सुग्रीव के दर्शन कराउँगा।' सीता बोलीं - 'नही, श्रीरघुनाथजी ही मुझे आकर ले जायें'।।१०-१५।।

तदनन्तर हनुमानजी ने रावण से मिलने की युक्ति सोच निकाली। उन्होंने रक्षकों मारकर उस वाटिका को उजाड़ डाला। फिर दॉंत और नख आदि आयुधों से वहॉं से आये हुए रावण के समस्त सेवकों को मारकर सात मन्त्रिकुमारों तथा रावणपुत्र अक्षयकुमार को भी यमलोक पहुँचा दिया। तत्पश्चात इन्द्रजीत ने आकर उन्हें नागपाश से बॉंध लिया और उन वानरवीर को रावण के पास ले जाकर उससे मिलाया। उस समय रावण ने पूछा - ' तू कौन है?' तब हनुमानजी ने रावण को उत्तर दिया - "मैं श्रीरामचन्द्रजी का दूत हुँ। तूम श्रीसीताजी को श्रीरघुनाथजी की सेवा में लौटा दो; अन्यथा लङ्कानिवासी समस्त राक्षसों के साथ तुम्हें श्रीराम के बाणों से घायल होकर निश्चय ही मरना पड़ेगा।' यह सुनकर रावण हनुमानजी को मारने के लिए उद्दत हो गया; किंतु विभिषण ने उसे रोक दिया। तब रावण ने उनकी पूँछ में आग लगा दी। पूँछ जल उठी। यह देख पवनपुत्र हनुमानजी ने राक्षसों की पूरी लङ्का को जला डाला और सीताजी का पुन: दर्शन करके उन्हें प्रणाम किया। फिर समुद्र के पार आकर अङ्गद आदि से कहा - 'मैं ने सीताजी का दर्शन कर लिया है।' तत्पश्चात अङ्गद आदि के साथ सुग्रीव के मधुवन में आकर, दधिमुख आदि रक्षकों को परास्त करके, मधुपान करने के अनन्तर वे सब लोग श्रीरामचन्द्रजी के पास आये और बोले - 'सीताजी का दर्शन हो गया।' श्रीरामचन्द्रजी ने भी अत्यन्त प्रसन्न होकर हनुमानजी से पुछा ।।१६-२४।।

श्रीरामचन्द्रजी बोले - कपिवर! तुम्हें सीता का दर्शन कैसे हुआ? उसने मेरे लिए क्या संदेश दिया है? मैं विरह की आग में जल रहा हूँ। तुम सीता की अमृतमयी कथा सुनाकर मेरा संताप शान्त करो।।२५।।

नारदजी कहते हैं - यह सुनकर हनुमानजी ने श्रीरघुनाथजी से कहा - 'भगवन! मैं समुद्र लॉंघकर लङ्का में गया था। वहॉं सीताजी का दर्शन करके, लङ्कापुरी को जला कर यहॉं आ रहा हूँ। यह सीताजी की दी हुई चुड़ामणि लिजिये। आप शोक न करें; रावण का वध करने के पश्चात निश्च्य ही आपको सीताजी की प्राप्ति होगी।' श्रीरामचन्द्रजी उस मणि को हाथ में ले, विरह से व्याकुल होकर रोने लगे और बोले - 'इस मणि को देखकर ऐसा जान पड़ता है, मानो मैं ने सीता को ही देख लिया। अब मुझे सीता के पास ले चलो। मैं उसके बिना जीवित नहीं रह सकता।' उस समय सुग्रीव आदि ने श्रीरामचन्द्रजी को समझाकर शान्त किया। तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजी समुद्र  के तट पर गये। वहॉं उनसे विभिषण आकर मिले। विभिषण के भाई दुरात्मा रावण ने उनका तिरस्कार किया था। विभिषण ने इतना ही कहा था कि 'भैया! आप सीता को श्रीरामचन्द्रजी की सेवा में समर्पित कर दिजिये।' इसी अपराध के कारण उसने उन्हें ठुकरा दिया था। अब वे असहाय थे। श्रीरामचन्द्रजी ने विभिषण को अपना मित्र बनाया और लङ्का के राजपद पर अभिषिक्त्त कर दिया। इसके बाद श्रीराम ने समुद्र से लङ्का जाने का रास्ता मॉंगा। जब उसने मार्ग नहीं दिया तो उन्होंने बाणों से उसे बींध डाला। अब समुद्र भयभीत होकर श्रीरामचन्द्रजी के पास आकर बोला - 'भगवन! नल के द्वारा मेरे उपर पुल बॉंधकर आप लङ्का में जाइये। पूर्वकाल में आप ही ने मुझे गहरा बनाया था।' यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजी ने नल के द्वारा वृक्ष और शिलाखण्डों से एक पुल बनवाया और उसी से वे वानरों सहित समुद्र के पार गये। वहॉं सुवेल पर्वत पर पड़ाव डालकर वहीं से उन्होंने लङ्कापूरी का निरीक्षण किया।।२६-३३।। 


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