नारदजी कहते हैं - मुने! श्रीरामचन्द्रजी ने महर्षि वशिष्ठ तथा माताओं को प्रणाम करके उन सबको भरत के साथ विदा कर दिया। तत्पश्चात महर्षि अत्री तथा उनकी पत्नी अनसूया को, शरभंग मुनि को, सुतीक्षण को तथा अगस्त्यजी के भ्राता अग्निजिह्व मुनि को प्रणाम करते हुए श्रीरामचन्द्रजी ने अगस्त्य मुनि के आश्रम पर जा उनके चरणों में मस्तक झुकाया और मुनि की कृपा से दिव्य धनुष एवं दिव्य खड्ग प्राप्त करके वे दण्डकारण्य में आये। वहाँ जनस्थान के भीतर पञ्चवटी नामक स्थान में गोदावरी के तट पर रहने लगे।
एक दिन शूर्पणखा नामवाली भयंकर राक्षसी राम, लक्ष्मण सीता को खा जाने के लिए पंचवटी में आयी; किंतु श्रीरामचन्द्रजी का अत्यन्त मनोहर रूप देखकर वह काम के अधीन हो गयी और बोली॥१-४॥
शूर्पणखा ने कहा - तुम कौन हो? कहाँ से आये हो? मेरी प्रार्थना से अब तुम मेरे पति हो जाओ। यदि मेरे साथ तुम्हारा सम्बन्ध होने में ये दोनों बाधक हैं तो, मैं इन दोनों को अभी खाये लेती हूँ॥५॥
एक दिन शूर्पणखा नामवाली भयंकर राक्षसी राम, लक्ष्मण सीता को खा जाने के लिए पंचवटी में आयी; किंतु श्रीरामचन्द्रजी का अत्यन्त मनोहर रूप देखकर वह काम के अधीन हो गयी और बोली॥१-४॥
शूर्पणखा ने कहा - तुम कौन हो? कहाँ से आये हो? मेरी प्रार्थना से अब तुम मेरे पति हो जाओ। यदि मेरे साथ तुम्हारा सम्बन्ध होने में ये दोनों बाधक हैं तो, मैं इन दोनों को अभी खाये लेती हूँ॥५॥
ऐसा कहकर वो उन्हें खा जाने को तैयार हो गई। तब श्रीरामचन्द्रजी के कहने पर लक्ष्मण ने शूर्पणखा की नाक और दोनों कान भी काट लिये। कटे हुये अंगों से रक्त की धार बहाती हुई शूर्पणखा अपने भाई खर के पास गयी और इस प्रकार बोली - "खर! मेरी नाक कट गई। इस अपमान के बाद मैं जीवित नहीं रह सकती। अब तो मेरा जीवन तभी रह सकता है, जब तुम मुझे राम का, उनकी पत्नी सीता का तथा उनके भाई लक्ष्मण का गरम - गरम रक्त पिलाओ। खर ने उसे 'बहुत अच्छा' कहकर शान्त किया और दूषण तथा त्रिशिरा के साथ चौदह हजार राक्षसों की सेना लेकर श्रीरामचन्द्रजी पर चढ़ाई की। श्रीराम ने भी उनका सामना किया और राक्षसों को बींधना आरम्भ किया। शत्रुओं के हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सहित समस्त चतुरङ्गिनी सेना को उन्होंने यमलोक पहुँचा दिया तथा अपने साथ युद्ध करने वाले खर, दूषण और त्रिशिरा को भी मौत के घाट उतार दिया। अब शूर्पणखा लंका में पहुँची और रावण के सामने जा पृथ्वी पर गिर पड़ी । उसने क्रोध से भरकर रावण से कहा -" अरे ! तु राजा और राक्षस कहलाने के योग्य नहीं है। खर आदि समस्त राक्षसों का संहार करने वाले राम की पत्नी सीता को हर ले। मैं राम और लक्ष्मण का रक्त पीकर ही जिवीत रहुँगी, अन्यथा नहीं ॥६ - १२ ॥
शूर्पणखा की बात सुनकर रावण ने कहा - "अच्छा, ऐसा ही होगा।" फिर उसने मारीच से कहा - " तुम स्वर्णमय विचित्र मृग का रूप धारण करके सीता के पास जाओ और राम तथा लक्ष्मण को अपने पीछे आश्रम से दूर हटा ले जाओ। मैं सीता का हरण करूँगा। यदि मेरी बात न मानोगे, तो तुम्हारी मृत्यु निश्चित है।" मारीच ने रावण से कहा - " रावण! धनुर्धर राम सक्षात मृत्यु हैं।" फिर उसने मन ही मन सोचा - 'यदि नहीं जाऊँगा तो रावण के हाथ से मरना होगा और जाऊँगा तो श्रीराम के हाथ से। इस प्रकार अगर मरना अनिवार्य है, तो इसके लिए श्रीराम ही श्रेष्ठ हैं, रावण नहीं; क्योंकि श्रीराम के हाथ से मरने पर मेरी मुक्ति हो जायेगी। ऐसा विचारकर वह मृगरूप धारण करके वह सीता के सामने बारंबार आने जाने लगा। तब सीताजी की प्रेरणा से श्रीराम दूर तक उसका पीछा करके उसे बाण से मार डाला। मरते समय उस मृग ने 'हा सीते! हा लक्ष्मण!' कहकर पुकार लगायी। उस समय सिता के कहने पर लक्ष्मण अपनी इच्छा के विरुद्ध श्रीरामचन्द्रजी के पास गये। इसी बीच में रावण ने भी मौका पाकर सिता को हर लिया। मार्ग में जाते समय उसने गिद्धराज जटायु का वध करके सीता को लङ्का ले जाकर अशोक वाटिका में रखा। वहाँ सीता से बोला - 'तुम मेरी पटरानी बन जाओ।' फिर राक्षसियों के तरफ देखकर बोला - 'निशाचरियों! इसकी रखवाली करो' ॥१३-१९॥
उधर श्रीरामचन्द्रजी जब मारीच को मारकर लौटे, तो लक्ष्मण को आते देखकर बोले - 'सुमित्रानंदन! वह मृग तो मायामय था, वास्तव में वह एक राक्षस था;किंतु तुम जो इस समय यहाँ आ गये, इससे जान पड़ता है, निश्च्य ही कोई सिता को हर ले गया।' श्रीरामचन्द्रजी आश्रम पर गये; किन्तु वहाँ सीता नही दिखाई दी। उस समय वे आर्त होकर शोक और विलाप करने लगे - 'हा प्रिये जानकी! तु मुझे छोड़कर कहा चली गयी?' लक्ष्मण ने श्रीराम को सन्त्वना दी। तब वे वन मे घुम - घुमकर सीता की खोज करने लगे। इसी समय उनकी जटायु से भेट हुई। जटयु ने यह कहकर कि 'सीता को रावण हर ले गया है' प्राण त्याग दिये। तब श्रीरघुनाथजी ने अपने हाथ से जटायु का दाह - सन्स्कार किया। इसके बाद उन्होने कबन्ध का वध किया। कबन्ध ने शाप मुक्त होने पर श्रीरामचन्द्रजी से कहा - आप सुग्रीव से मिलिय़े।।२०-२४।।
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