गुरुवार, 26 मार्च 2020

परशुराम अवतार के कथा ( अग्निपुराण - चौथा अध्याय)

देवता और ब्रह्मण आदि का पालन करने वाले श्रीहरि ने जब देखा कि भूमण्डल के क्षत्रिय उद्धत स्वभाव के हो गये हैं, तो वे उन्हें मारकर पृथ्वी का भार उतारने और सर्वत्र शान्ति स्थापित करने के लिए जमदग्नि के अंशद्वारा रेणुका के गर्भ से अवतीर्ण हुए ।

भृगुनन्दन परशुराम शस्त्र विद्या के परांगत विद्वान थे । उन दिनों कृतवीर्य का पुत्र राजा अर्जुन भगवान् दत्तात्रेयजी की कृपा से हजार बाँहें पाकर समस्त भूमण्डल पर राज करता था । एक दिन वह वन में शिकार खेलने के लिए गया ॥ ८-१४॥

वहाँ वह बहुत थक गया । उस समय जमदग्नि मुनि ने उसे सेना सहित अपने आश्रम पर निमन्त्रित किया और कामधेनु के प्रभाव से सबको भोजन कराया। राजा ने मुनि से कामधेनु को अपने लिए माँगा; किन्तु उन्होने देने से इन्कार कर दिया। तब उसने बलपूर्वक उस धेनु को छीन लिया। यह समाचार पाकर परशुरामजीने हैहयपूरी में जा उसके साथ युद्ध किया और अपने फरसे से उसका मस्तक काटकर रणभूमि में उसे मार गिराया। फिर वे कामधेनु को साथ लेकर अपने आश्रम पर लौट आये।

एक दिन परशुरामजी जब वन में गये हुए थे, कृतवीर्य के पुत्रों ने आकर अपने पिता के वैर का बदला लेने के लिए जमदग्नि मुनि को मार डाला। जब परशुरामजी लौट कर आए तो अपने पिता को मारा गया देख उनके मन में बड़ा क्रोध हुआ उन्होंने इक्कीस बार समस्त भूमण्डल के क्षेत्रियों का संहार किया । फिर कुरुक्षेत्र में पाँच कुण्ड बनाकर वहीं उन्होंने अपने पितरों का तर्पण किया और सारी पृथ्वी कश्यप मुनि को दान देकर,वे महेन्द्रपर्वत पर रहने लगे ॥१५- २१॥

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