शनिवार, 18 अप्रैल 2020

बुद्ध और कल्कि अवतारों की कथा (अग्निपुराण - सोलहवॉं अध्याय)

अग्निदेव कहते हैं - अब मैं बुद्धावतार का वर्णन करूँगा, जो पढ्ने और सुननेवालों के मनोरथ को सिद्ध करने वाला है। पूर्वकाल में देवता और असुरों में घोर संग्राम हुआ। उसमें दैत्यों ने देवताओ को परास्त कर दिया। तब देवतालोग त्राहि - त्राहि पुकारते हुए भगवान की शरण में गये। भगवान मायामोहमय रुप में आकर राजा शुद्धोदन के पुत्र हुए। उन्होंने दैत्यों को मोहित किया और उनसे वैदिक धर्म का परित्याग करा दिया। वे बुद्ध के अनुयायी दैत्य "बौद्ध" कहलाये। फिर उन्होंने दुसरे लोगों से बौद्ध धर्म का त्याग करवाया। इसके बाद माया - मोह ही "आर्ह्त" रुप में प्रकट हुआ। उसने दुसरे लोगों को भी "आर्ह्त" बनाया। इस प्रकार उनके अनुयायी वेद - धर्म से वञ्चित होकर पाखण्डी बन गये। उन्होंने नरक में ले जाने वाले कर्म करना आरम्भ कर दिया। वे सब के सब वर्णशंकर होंगे और नीच पुरुषों से दान लेंगें। इतना ही नहीं, वे लोग डाकू और दुराचारी भी होंगे। वाजसनेय मात्र ही "वेद" कहलायेगा। वेद की द्स - पॉंच शाखाऍं ही प्रमाणभूत मानी जायँगी। धर्म का चोला पहने हुए सब लोग अधर्म में ही रुचि रखने वाले होंगे। राजारुपधारी म्लेच्छ मनुष्यों का ही भक्षण करेंगें।।१-७।।

तदनन्तर भगवान कल्कि प्रकट होंगें। वे श्रीविष्णुयशा के पुत्र रूप से अवतीर्ण हो याज्ञवल्क्य को अपना पुरोहित बनायेंगें। उन्हें अस्त्र - शस्त्र विद्या का पूर्ण परिज्ञान होगा। वे हाथ में अस्त्र - शस्त्र लेकर म्लेच्छों का संहार कर डालेंगें तथा चारों वर्णों और समस्त आश्रमों में शास्त्रीय मर्यादा स्थापित करेंगें। समस्त प्रजा को धर्म के उत्तम मार्ग में लगायेंगे। उसके बाद श्रीहरि कल्कि रुप का परित्याग करके अपने धाम में चले जायेंगे। फिर तो पूर्ववत सतयुग का साम्राज्य होगा। साधुश्रेष्ठ! सभी वर्ण और आश्रम के लोग अपने - अपने धर्म में दृढ्तापूर्वक लग जायेंगे। इस प्रकार सभी कल्पों तथा मन्वन्तरों में श्रीहरि के अवतार होते हैं। उनमें से कुछ हो चुके, कुछ आगे होनेवाले हैं; उन सबकी कोई नियत संख्या नहीं है। जो मनुष्य श्रीविष्णु के अंशावतार तथा पूर्णावतार सहित दस अवतारों के पाठ अथवा श्रवण करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओ को प्राप्त कर लेता है तथा निर्मल ह्र्दय होकर परिवार सहित स्वर्ग को जाता है। इस प्रकार अवतार लेकर श्रीहरि धर्म की व्यवस्था और अधर्म का निराकरण करते हैं। वे ही जगत की सृष्टि आदि के कारण हैं।।८-१४।।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें