शनिवार, 18 अप्रैल 2020

यदुकूल का संहार और पाण्डवों का स्वर्गगमन (अग्निपुराण - पन्द्रहवॉं अध्याय)

अग्निदेव कहते हैं - ब्रह्मन! जब युद्धिष्ठिर राजसिंहासन पर विराजमान हो गये, तब धृतराष्ट्र गृहस्थ - आश्रम से वानप्रस्थ - आश्रम में प्रविष्ट हो वन में चले गये। उनके साथ देवी गान्धारी और कुन्ती भी थी। विदुरजी दावानल से दग्ध हो स्वर्ग सिधारे। इस प्रकार भगवान श्रीविष्णु ने पृथ्वी का भार उतारा और धर्म की स्थापना तथा अधर्म का नाश करने के लिए पाण्डवों को निमित्त बनाकर दानव - दैत्य आदि का संहार किया। तत्पश्चात भूमि का भार बढाने वाले यादवकूल का भी ब्राह्मणों के शाप के बहाने मूसल के द्वारा संहार कर डाला। अनिरूद्ध के पुत्र वज्र को राजा के पद पर अभिशिक्त किया। तदनन्तर देवताओ के अनुरोध से प्रभास क्षेत्र में श्रीहरि स्वयं ही स्थूल शरीर की लीला का संवरण करके अपने धाम को पधारे।।१-४।।

वे इन्द्रलोक और ब्र्ह्मलोक में स्वर्गवासी देवताओ द्वारा पूजित होते हैं। बलभद्रजी शेषनाग के स्वरूप थे; अत: उन्होंने पातालरूपी स्वर्ग का आश्रय लिया। अविनाशी भगवान श्रीहरि ध्यानी पुरूषों के ध्येय है। उनके अन्तर्धान हो जानेपर समुद्र ने उनकी निजी निवास स्थान को छोड़कर शेष द्वारकापुरी को जल में डुबा दिया।

अर्जुन ने मरे हुए यादवों का दाह संस्कार करके उनके लिए जलाञ्जलि दी और धन आदि का दान किया। भगवान श्रीकृष्ण की रानियों को, जो पहले अप्सराएँ और अष्टावक्र के शाप से मानवीरूप में प्रकट हुईं थीं, लेकर ह्स्तिनापुर को चले। मार्ग मे डंडे लिए हुए ग्वालों ने अर्जुन का तिरस्कार करके उन सबको छीन लिया। यह भी अष्टावक्र के शाप से ही सम्भव हुआ था। इससे अर्जुन के मन में बड़ा शोक हुआ। फिर महर्षि व्यास के सान्त्वना देने पर उन्हें यह निश्चय हुआ कि 'भगवान श्रीकृष्ण के समीप रहने से ही मुझमें बल था।' हस्तिनापुर में आकर उन्होंने भाइयों सहित राजा युद्धिष्ठिर से, जो उस समय प्रजावर्ग का पालन करते थे, यह सब समाचार निवेदन किया। वे बोले - 'भैया! वही धनुष है, वे ही बाण हैं, वही रथ हैं और वही घोड़े हैं; किन्तु भगवान श्रीकृष्ण के बिना सब कुछ उसी प्रकार नष्ट हो गया, जैसे अश्रोत्रिय को दिया हुआ दान।' यह सुनकर धर्मराज युद्धिष्टिर ने राज्य सिंहासन पर परीक्षित को स्थापित कर दिया।।५-११।।

इसके बाद बुद्धिमान राजा संसार की अनित्यता का विचार करके द्रौपदी तथा भाईयों को साथ लेकर महाप्रस्थान के पथ पर अग्रसर हुए। मार्ग में वे श्रीहरि के अष्टोत्तरशत नामों का जाप करते हुए यात्रा करते थे। उस महापथ में क्रमश: द्रौपदी, सहदेव, नकुल, अर्जुन और भीमसेन एक - एक करके गिर पड़े। इससे राजा शोकमग्न हो गये। तदनन्तर वे इन्द्र के द्वारा लाये हुए रथ पर आरूढ हो भाइयों सहित स्वर्ग को चले गये। वहॉं उन्होंने दुर्योधन सहित धृतराष्ट्र पुत्रों को देखा। तदनन्तर, उनपर कृपा करने के लिए अपने धाम से पधारे हुए भगवान वासुदेव का भी दर्शन किया। इससे उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई.। यह तुम्हें मैं ने महाभारत का प्रसंग सुनाया है। जो इसका पाठ करेगा, वह स्वर्गलोक में सम्मानित होगा।।१२-१५।।

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