रविवार, 5 अप्रैल 2020

रामायण - उत्तरकाण्ड की संक्षिप्त कथा (अग्निकाण्ड - ग्यारहवॉं अध्याय)

नारदजी कहते हैं - जब श्रीरघुनाथजी अयोध्या के राजसिंहासन पर आसीन हो गये, तब अगस्त्य आदि महर्षि उनका दर्शन करने के लिए गये। वहॉं उनका भली - भॉंति स्वागत - सत्कार हुआ। तदनन्तर उन ऋषियों ने कहा - 'भगवन! आप धन्य हैं, जो लङ्का में विजयी हुए और इन्द्रजित जैसे राक्षसों को मार गिराया। अब हम उनकी उत्पति की कथा बतलाते हैं, सुनिये -

ब्राह्माजी के पुत्र मुनिवर पुलस्त्य हुए और पुलस्त्य से महर्षि विश्रवा का जन्म हुआ। उनकी दो पत्नियॉं थी - पुण्योत्कटा और कैकसी। उनमें पुन्योत्कटा ज्येष्ठ थी। उसके गर्भ से धनाध्यक्ष कुबेर का जन्म हुआ। कैकसी के गर्भ से पहले रावण का जन्म हुआ, जिसके दस मुख और बीस भुजाएँ थीं। रावण ने तपस्या की और ब्रह्माजी ने उसे वरदान दिया, जिससे उसने समस्त देवताओ को जीत लिया। कैकसी के दुसरे पुत्र का नाम कुम्भकर्ण और तीसरे का विभिषण था। कुम्भकर्ण सदा निंद में ही पड़ा रहता था; किंतु विभिषण बड़े धर्मात्मा हुए। इन तीनों की बहन शूर्पणखा हुई। रावण से मेघनाद का जन्म हुआ। उसने इन्द्र को जीत लिया था, इसलिए "इन्द्रजित" के नाम से उसकी प्रसिद्धि हुई। वह रावण से भी अधिक बलवान था। परंतु देवताओ आदि के कल्याण की इच्छा रखने वाले आपने लक्ष्मण के द्वारा उसका वध करा दिया।' ऐसा कहकर वे अगस्त्य आदि ब्रह्मर्षि श्रीरघुनाथजी के द्वारा अभिनन्दित हो अपने - अपने आश्रम को चले गये।

तदनन्तर देवताओ की प्रार्थना से प्रभावित श्रीरामचन्द्रजी के आदेश से शत्रुघ्न ने लवणासुर को मारकर एक पूरी बसायी, जो "मथूरा" नाम से प्रसिद्ध हुई।

तत्पश्चात भरत ने श्रीराम की आज्ञा पाकर सिन्धु - तीर  निवासी शैलूष नामक बलोन्मत्त गन्धर्व का तथा उसके करोड़ वंशजों का अपने तीखे बाणों से संहार किया। फिर उस देश के गान्धार और मद्र दो विभाग करके, उनमें अपने पुत्र तक्ष और पुष्कर को स्थापित कर दिये।।१-९।।

इसके बाद भरत और शत्रुघ्न अयोध्या में चले आये और वहॉं श्रीरघुनाथजी की आराधना करते हुए रहने लगे। श्रीरामचन्द्रजी ने दुष्ट पुरुषों का युद्ध में संहार किया और शिष्ट पुरुषों का दान आदि के द्वारा भलीभॉंति पालन किया। उन्होंने लोकापवाद के भय से अपनी धर्मपत्नी सीता को वन में छोड़ दिया था। वहॉं वाल्मिकी मुनि के आश्रम में उनके गर्भ से दो श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न हुए, जिनके नाम कुश और लव थे। उनके उत्तम चरित्रों को सुनकर श्रीरामचन्द्रजी को भलीभॉंति निश्चय हो गया कि ये मेरे ही पुत्र हैं। तत्पश्चात उन दोनों को कोशल के दो राज्यों पर अभिषिक्त करके, 'मैं ब्रह्म हूँ' इसकी भावना पूर्वक ध्यानयोग में स्थित होकर उन्होंने देवताओ की प्रार्थना से भाईयों और पुरवासियों सहित अपने परमधाम में प्रवेश किया। अयोध्या में ग्यार हजार वर्षों तक राज्य करके वे अनेक यज्ञों का अनुष्ठान कर चुके थे। उनके बाद सीता के पुत्र कोशल जनपद के राजा हुए।।१०-१३।।

अग्निदेव कहते हैं - वसिष्ठ्जी! देवर्षि नारद से यह कथा सुनकर महर्षि वाल्मीकि ने विस्तार पूर्वक रामायण नामक महाकाव्य की रचना की। जो इस प्रसङ्ग को सुनता है, वह स्वर्गलोक को जाता है।।१४।।

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