नारदजी कहते हैं - भरत के ननिहाल चले जाने पर श्रीरामचन्द्रजी ही पिता- माता आदि के सेवा - सत्कार में रहने लगे । एक दिन राजा दशरथ ने श्रीरामचन्द्रजी से कहा - ' रघुनन्दन! मेरी बात सुनो । तुम्हारे गुणों पर अनुरक्त हो प्रजाजनों ने मन - ही - मन तुम्हें राजसिंहासन अभिषिक्त कर दिया है - प्रजा की यह हार्दिक इच्छा है कि तुम युवराज बनो; अतः कल प्रातःकाल मैं तुम्हें युवराज पद प्रदान कर दूंगा | आज रात में तुम सीता सहित उत्तम व्रत का पालन करते हुए संयमपूर्वक रहो।'
राजा के आठ मन्त्रियों तथा वशिष्ठजी ने भी उनके इस बात का अनुमोदन किया। उन आठ मन्त्रियों के नाम इस प्रकार हैं - दृष्टि, जयन्त, विजय, सिद्धार्थ, राज्यवर्धन, अशोक धर्मपाल तथा सुमंत्र। इनके अतिरिक्त वशिष्ठजी भी मन्त्रणा देते थे।
पिता और मन्त्रियों की बातें सुनकर श्री रघुनाथजी ने 'तथास्तु' कहकर उनकी आज्ञा शिरोधार्य की और माता कौशल्या को यह शुभ समाचार बताकर देवताओं की पूजा करके वे संयम में स्थित हो गये। उधर महाराज दशरथ वशिष्ठ आदि मन्त्रियों को यह कहकर कि 'आपलोग श्रीरामचन्द्र के राज्यामिषेक की सामग्री जुटायें', कैकेयी के भवन में चले गये।
कैकेयी के मन्थरा नामक एक दासी थी, जो बड़ी दुष्टा थी। उसने आयोध्या की सजावट होती देख श्रीरामचन्द्रजी के राज्याभिषेक की बात जानकर रानी कैकेयी से सारा हाल सुनाया ॥ १ - ८ ॥
मंथरा बोली -" तुम उठो! राम का राज्याभिषेक हो ने जा रहा है यह तुम्हारे पुत्र के लिए, मेरे लिए और तुम्हारे लिए भी मृत्यु के समान भयंकर वृत्तान्त है - इसमें कोई संदेह नहीं॥९॥
मंथरा कुबड़ी थी। उसकी बात सुनकर रानी कैकेयी को प्रसन्नता हुई। उन्होंने कुब्जा को एक आभूषण उतारकर दिया और कहा - मेरे लिए तो जैसे राम हैं, वैसे ही मेरे पुत्र भरत हैं। मुझे ऐसा कोई उपाय नहीं दिखायी देता, जिससे भरत को राज्य मिल सके।' मंथरा ने उस हार को फेंक दिया और कुपित होकर कैकेयी से कहा॥१०-११॥
मंथरा बोली - ओ नादान! तू अपने को, भरत को और मुझे भी राम से बचा। कल राम राजा होंगे। फिर राम के पूत्रों को राज्य मिलेगा। कैकेयी! अब राजवंश भरत से दूर हो जाएगा।
मैं भरत को राज्य दिलाने का एक उपाय बताती हूँ। पहले की बात है। देवासुर - संग्राम में शाम्बरा सुर ने देवताओं को मार भगाया था। तेरे स्वामी भी उस युद्ध में गये थे। उस समय तूने अपनी विद्या से रात में स्वामी की रक्षा की थी। इसके लिए महाराज ने तुझे दो वर देने की प्रतिज्ञा की थी। इस समय उन्हीं दो वरों को उनसे मांग। एक वर के द्वारा राम का चौदह वर्षो के लिए वनवास और दूसरे के द्वारा भरत का युवराज पद पर अभिषेक माँग ले। राजा इस समय वे दोनों वर दे देंगें॥१२-१५॥
इस प्रकार मंथरा के प्रोत्साहन देने पर कैकेयी अनर्थ में ही अर्थ की सिद्धि देखने लगी और बोली - 'कुब्जे! तूने बड़ा अचछा उपाय बताया है। राजा मेरा मनोरथ अवश्य पूर्ण करेंगें।' ऐसा कहकर वह कोपभवन में चली गयी और पृथ्वी पर अचेत - सी होकर पड़ रही। उधर महाराज दशरथ ब्राह्मण आदि का पूजन करके जब कैकेयी के भवन में आये तो उसे रोष में भरी हुई देखा। तब राजा ने पूछा - ' सुन्दरी! तुम्हारी ऐसी दशा क्यों हो रही है? तुम्हें कोई रोग तो नहीं सता रहा है? अथवा किसी भय से व्याकुल तो नहीं हो? बताओ, क्या चाहती हो? मैं अभी तुम्हारी इच्छा पूर्ण करता हूं। जिन श्रीराम के बिना मैं क्षणभर भी जीवित नहीं रह सकता, उन्हीं की शपथ खाकर कहता हूँ, तुम्हारा मनोरथ अवश्य पूर्ण करूँगा। सच - सच बताओ, क्या चाहती हो?" कैकेयी बोली - राजन! यदि आप मुझे कुछ देना चाहते हों, तो अपने सत्य की रक्षा के लिए पहले के दिये हुए दो वरदान देने की कृपा करें। मैं चाहती हूं, राम चौदह वर्षों तक संयम पूर्वक वन में निवास करें और इन सामग्रियों के द्वारा आज ही भरत युवराज पद पर अभिषेक हो जाय। महाराज! ये दोनों वरदान आप मुझे नहीं तो मैं विष पीकर मर जाऊँगी।" यह सुनकर राजा दशरथ वज्र से आहत हुए की भाँति मूर्छित होकर गिर पड़े। फिर थोड़ी देर में चेत होने पर उन्हेंने कैकेयी से कहा॥१६-२३॥
दशरथ बोल - "पापपूर्ण विचार रखनेवाली तू समस्त संसार का अप्रिय करनेवाली है। अरि! मैंने या राम ने तेरा क्या बिगाड़ा है, जो तू मुझसे एसी बात कर रही है। केवल तुझे प्रिय लगने वाला यह कार्य करके मैं संसार में भलीभाँति निन्दित हो जाऊँगा तु मेरी स्त्री नहीं कालरात्रि है । मेरा पुत्र भरत ऐसा नहीं है। पाणिनी! मेरे पुत्र के चले जाने पर जब मैं मर जाऊँगा तो तू विधवा होकर राज्य करना ॥ २४ - २५ ॥
प्रातः समय श्रीराम ने रथ सहित सुमन्त्र को विदा कर दिया तथा स्वयं लक्ष्मण और सीता के साथ नाव से गंगा पार हो वे प्रयाग में गये। वहाँ उन्होंने महर्षि भारद्वाज को प्रणाम किया और उनकी आज्ञा ले वहाँ से चित्रकूट पर्वत को प्रस्थान किये। चित्रकूट पहुंचकर वास्तु पूजा करने के अनन्तर पर्णकूटी बनाकर मन्दाकिनी के तट पर निवास किया।
श्रीराम के वन जाने के पश्चात छठे दिन के रात में राजा दशरथ ने कौशल्या को पहले की एक घटना सुनायी, जिसमें उनके द्वारा सरयू के तट पर अनजाने में यज्ञदत पुत्र श्रवण कुमार के मारे जाने एवम् उनके द्वारा दी गयी शाप का वृत्तान्त था।
इतनी कथा कहने के पश्चात राजा ने 'हा राम!' कहकर स्वर्गलोक प्रयाण किया। कौशल्या ने समझा, महाराज शोक से आतुर हैं; इस समय निंद आ गई होगी। ऐसा विचार करके वे सो गयी। प्रातःकाल सभी सोते हुए महाराज को जगाने लगे; किन्तु वे न जगे॥३४-४२॥
तब उन्हें मरा हुआ जान समस्त नर-नारी फूट-फूटकर रोने लगे। तत्पश्चात महर्षि वशिष्ठ ने राजा के शव को तेल भरी नौका में रखवाकर भरत को ननिहाल से तत्काल बुलवाया। भरत और शत्रुघ्न, सुमन्त्र के साथ शीघ्र ही अयोध्यापूरी आए। यहाँ का समाचार जानकर भरत को बडा दुःख हुआ। कैकेयी को शोक करती देख उसकी कठोर शब्दों में निन्दा करते हुए बोले - "तुने मेरे माथे कलंक का टीका दिया। मेरे सिर पर अपयश का भारी बोझ लाद दिया।" फिर उन्होंनें कौशल्या की प्रशंसा करके तेलपूर्ण नौका में रखे हुए पिता के शव का सरयू तर पर अन्त्येष्टि - संस्कार किया। तदन्तर वसिष्ठ आदि गुरुओं ने कहा - "भरत अब राज्य ग्रहण करो।" भरत बोले - मैं तो श्रीरामजी को ही राजा मानता हूँ। अब उन्हें यहाँ लाने के लिए वन में जाता हूँ। ऐसा कहकर वे वहाँ से दल - बल सहित चल दिये और श्रङ्गवेरपुर होते हुए प्रयाग पहुँचे। वहाँ महर्षि भरद्वाज ने उन्हें भोजन कराया । फिर भरद्वाज को नमस्कार करके वे सब प्रयाग से निकले और चित्रकूट में श्रीराम और लक्ष्मण के समीप आ पहुंचे। वहाँ भरत ने श्रीराम से कहा - " रघुनाथजी! हमारे पिता महाराजा दशरथ स्वर्गवासी हो गए। अब आप आयोध्या चलकर राज्य ग्रहण करें। मैं आपकी आज्ञा का पालन करते हुए वन में जाऊंगा।" यह सुनकर श्रीराम ने पिता का तर्पण किया और भरत से कहा - " तुम मेरी चरण पादुका लेकर आयोध्या लौट जाओ। मैं राज्य करने के लिए नहीं चलूँगा। पिता के सत्य की रक्षा के लिए चीर एवम् जटा धारण करके वन में ही रहूँगा।" श्रीराम के ऐसा कहने पर भरत सदल-बल लैट गये और अयोध्या छोड़कर नन्दिग्राम में रहने लगे। वहाँ चरण- पादुकाओं की पूजा करते हुए वे राज्य का भली-भाँति पालन करने लगे॥४३-५१॥
राजा के आठ मन्त्रियों तथा वशिष्ठजी ने भी उनके इस बात का अनुमोदन किया। उन आठ मन्त्रियों के नाम इस प्रकार हैं - दृष्टि, जयन्त, विजय, सिद्धार्थ, राज्यवर्धन, अशोक धर्मपाल तथा सुमंत्र। इनके अतिरिक्त वशिष्ठजी भी मन्त्रणा देते थे।
पिता और मन्त्रियों की बातें सुनकर श्री रघुनाथजी ने 'तथास्तु' कहकर उनकी आज्ञा शिरोधार्य की और माता कौशल्या को यह शुभ समाचार बताकर देवताओं की पूजा करके वे संयम में स्थित हो गये। उधर महाराज दशरथ वशिष्ठ आदि मन्त्रियों को यह कहकर कि 'आपलोग श्रीरामचन्द्र के राज्यामिषेक की सामग्री जुटायें', कैकेयी के भवन में चले गये।
कैकेयी के मन्थरा नामक एक दासी थी, जो बड़ी दुष्टा थी। उसने आयोध्या की सजावट होती देख श्रीरामचन्द्रजी के राज्याभिषेक की बात जानकर रानी कैकेयी से सारा हाल सुनाया ॥ १ - ८ ॥
मंथरा बोली -" तुम उठो! राम का राज्याभिषेक हो ने जा रहा है यह तुम्हारे पुत्र के लिए, मेरे लिए और तुम्हारे लिए भी मृत्यु के समान भयंकर वृत्तान्त है - इसमें कोई संदेह नहीं॥९॥
मंथरा कुबड़ी थी। उसकी बात सुनकर रानी कैकेयी को प्रसन्नता हुई। उन्होंने कुब्जा को एक आभूषण उतारकर दिया और कहा - मेरे लिए तो जैसे राम हैं, वैसे ही मेरे पुत्र भरत हैं। मुझे ऐसा कोई उपाय नहीं दिखायी देता, जिससे भरत को राज्य मिल सके।' मंथरा ने उस हार को फेंक दिया और कुपित होकर कैकेयी से कहा॥१०-११॥
मंथरा बोली - ओ नादान! तू अपने को, भरत को और मुझे भी राम से बचा। कल राम राजा होंगे। फिर राम के पूत्रों को राज्य मिलेगा। कैकेयी! अब राजवंश भरत से दूर हो जाएगा।
मैं भरत को राज्य दिलाने का एक उपाय बताती हूँ। पहले की बात है। देवासुर - संग्राम में शाम्बरा सुर ने देवताओं को मार भगाया था। तेरे स्वामी भी उस युद्ध में गये थे। उस समय तूने अपनी विद्या से रात में स्वामी की रक्षा की थी। इसके लिए महाराज ने तुझे दो वर देने की प्रतिज्ञा की थी। इस समय उन्हीं दो वरों को उनसे मांग। एक वर के द्वारा राम का चौदह वर्षो के लिए वनवास और दूसरे के द्वारा भरत का युवराज पद पर अभिषेक माँग ले। राजा इस समय वे दोनों वर दे देंगें॥१२-१५॥
इस प्रकार मंथरा के प्रोत्साहन देने पर कैकेयी अनर्थ में ही अर्थ की सिद्धि देखने लगी और बोली - 'कुब्जे! तूने बड़ा अचछा उपाय बताया है। राजा मेरा मनोरथ अवश्य पूर्ण करेंगें।' ऐसा कहकर वह कोपभवन में चली गयी और पृथ्वी पर अचेत - सी होकर पड़ रही। उधर महाराज दशरथ ब्राह्मण आदि का पूजन करके जब कैकेयी के भवन में आये तो उसे रोष में भरी हुई देखा। तब राजा ने पूछा - ' सुन्दरी! तुम्हारी ऐसी दशा क्यों हो रही है? तुम्हें कोई रोग तो नहीं सता रहा है? अथवा किसी भय से व्याकुल तो नहीं हो? बताओ, क्या चाहती हो? मैं अभी तुम्हारी इच्छा पूर्ण करता हूं। जिन श्रीराम के बिना मैं क्षणभर भी जीवित नहीं रह सकता, उन्हीं की शपथ खाकर कहता हूँ, तुम्हारा मनोरथ अवश्य पूर्ण करूँगा। सच - सच बताओ, क्या चाहती हो?" कैकेयी बोली - राजन! यदि आप मुझे कुछ देना चाहते हों, तो अपने सत्य की रक्षा के लिए पहले के दिये हुए दो वरदान देने की कृपा करें। मैं चाहती हूं, राम चौदह वर्षों तक संयम पूर्वक वन में निवास करें और इन सामग्रियों के द्वारा आज ही भरत युवराज पद पर अभिषेक हो जाय। महाराज! ये दोनों वरदान आप मुझे नहीं तो मैं विष पीकर मर जाऊँगी।" यह सुनकर राजा दशरथ वज्र से आहत हुए की भाँति मूर्छित होकर गिर पड़े। फिर थोड़ी देर में चेत होने पर उन्हेंने कैकेयी से कहा॥१६-२३॥
दशरथ बोल - "पापपूर्ण विचार रखनेवाली तू समस्त संसार का अप्रिय करनेवाली है। अरि! मैंने या राम ने तेरा क्या बिगाड़ा है, जो तू मुझसे एसी बात कर रही है। केवल तुझे प्रिय लगने वाला यह कार्य करके मैं संसार में भलीभाँति निन्दित हो जाऊँगा तु मेरी स्त्री नहीं कालरात्रि है । मेरा पुत्र भरत ऐसा नहीं है। पाणिनी! मेरे पुत्र के चले जाने पर जब मैं मर जाऊँगा तो तू विधवा होकर राज्य करना ॥ २४ - २५ ॥
राजा दशरथ सत्य के बन्धन में बंधे थे। उन्होंने श्रीराम को बुलाकर कहा - " बेटा! कैकेयी ने मुझे ठग लिया। तुम मुझे कैद करके राज्य को अपने अधिन कर लो। अन्यथा तुम्हें वन में निवास करना होगा और कैकेयी का पुत्र भरत राजा बनेगा।" श्रीरामचन्द्रजी ने पिता और कैकेयी को प्रणाम करके उनकी प्रदक्षिणा की और कौसल्या के चरणों में मस्तक झुकाकर उन्हें सांत्वना दी। फिर लक्ष्मण और पत्नी सीता को साथ ले ब्राह्मणों, दीनों और अनाथों को दान देकर सुमन्त्र सहित रथ पर बैठ कर नगर से बाहर निकल गए। उस समय माता - पिता आदि शोक से आतुर हो रहे थे। उस रात में श्रीरामचन्द्रजी ने तमसा नदि के तट पर निवास किया। उनके साथ बहुत - से पुरवासी भी गए थे। उन सबको सोता छोड़कर वे आगे बढ़ गए। प्रातःकाल होने पर जब श्रीरामचन्द्रजी नहीं दिखाई दिये तो नगरवासी निराश होकर पुनः आयोध्या लौट आए। श्रीराम के चले जाने से राजा दशरथ बहुत दुःखी हुए। वे रोते-रोते कैकेयी का महल छोड़कर कौशल्या के भवन में चले आये। उस समय नगर के समस्त स्त्री - पुरुष और रनिवास की स्त्रीयाँ फूट - फूटकर रो रही थीं। श्रीरामचन्द्रजी ने चीरवस्त्र धारण कर रखा था। वे रथ पर बैठे - बैठे श्रृंगवेरपुर जा पहुँचे। वहाँ निषादराज गुह ने उनका पूजन, स्वागत - सत्कार किया। श्रीरघुनाथजी ने इंगूदी - वृक्ष की जड़ के निकट विश्राम किया। लक्ष्मण और गुह रात भर जागकर पहरा देते रहे॥२६-३३॥
प्रातः समय श्रीराम ने रथ सहित सुमन्त्र को विदा कर दिया तथा स्वयं लक्ष्मण और सीता के साथ नाव से गंगा पार हो वे प्रयाग में गये। वहाँ उन्होंने महर्षि भारद्वाज को प्रणाम किया और उनकी आज्ञा ले वहाँ से चित्रकूट पर्वत को प्रस्थान किये। चित्रकूट पहुंचकर वास्तु पूजा करने के अनन्तर पर्णकूटी बनाकर मन्दाकिनी के तट पर निवास किया।
श्रीराम के वन जाने के पश्चात छठे दिन के रात में राजा दशरथ ने कौशल्या को पहले की एक घटना सुनायी, जिसमें उनके द्वारा सरयू के तट पर अनजाने में यज्ञदत पुत्र श्रवण कुमार के मारे जाने एवम् उनके द्वारा दी गयी शाप का वृत्तान्त था।
इतनी कथा कहने के पश्चात राजा ने 'हा राम!' कहकर स्वर्गलोक प्रयाण किया। कौशल्या ने समझा, महाराज शोक से आतुर हैं; इस समय निंद आ गई होगी। ऐसा विचार करके वे सो गयी। प्रातःकाल सभी सोते हुए महाराज को जगाने लगे; किन्तु वे न जगे॥३४-४२॥
तब उन्हें मरा हुआ जान समस्त नर-नारी फूट-फूटकर रोने लगे। तत्पश्चात महर्षि वशिष्ठ ने राजा के शव को तेल भरी नौका में रखवाकर भरत को ननिहाल से तत्काल बुलवाया। भरत और शत्रुघ्न, सुमन्त्र के साथ शीघ्र ही अयोध्यापूरी आए। यहाँ का समाचार जानकर भरत को बडा दुःख हुआ। कैकेयी को शोक करती देख उसकी कठोर शब्दों में निन्दा करते हुए बोले - "तुने मेरे माथे कलंक का टीका दिया। मेरे सिर पर अपयश का भारी बोझ लाद दिया।" फिर उन्होंनें कौशल्या की प्रशंसा करके तेलपूर्ण नौका में रखे हुए पिता के शव का सरयू तर पर अन्त्येष्टि - संस्कार किया। तदन्तर वसिष्ठ आदि गुरुओं ने कहा - "भरत अब राज्य ग्रहण करो।" भरत बोले - मैं तो श्रीरामजी को ही राजा मानता हूँ। अब उन्हें यहाँ लाने के लिए वन में जाता हूँ। ऐसा कहकर वे वहाँ से दल - बल सहित चल दिये और श्रङ्गवेरपुर होते हुए प्रयाग पहुँचे। वहाँ महर्षि भरद्वाज ने उन्हें भोजन कराया । फिर भरद्वाज को नमस्कार करके वे सब प्रयाग से निकले और चित्रकूट में श्रीराम और लक्ष्मण के समीप आ पहुंचे। वहाँ भरत ने श्रीराम से कहा - " रघुनाथजी! हमारे पिता महाराजा दशरथ स्वर्गवासी हो गए। अब आप आयोध्या चलकर राज्य ग्रहण करें। मैं आपकी आज्ञा का पालन करते हुए वन में जाऊंगा।" यह सुनकर श्रीराम ने पिता का तर्पण किया और भरत से कहा - " तुम मेरी चरण पादुका लेकर आयोध्या लौट जाओ। मैं राज्य करने के लिए नहीं चलूँगा। पिता के सत्य की रक्षा के लिए चीर एवम् जटा धारण करके वन में ही रहूँगा।" श्रीराम के ऐसा कहने पर भरत सदल-बल लैट गये और अयोध्या छोड़कर नन्दिग्राम में रहने लगे। वहाँ चरण- पादुकाओं की पूजा करते हुए वे राज्य का भली-भाँति पालन करने लगे॥४३-५१॥
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