रविवार, 3 मई 2020

स्वायम्भूव मनु के वंश का वर्णन (अग्निपुराण - अठारहवॉं अध्याय)

अग्निदेव कहते हैं - मुने! स्वायम्भूव मनु से उनकी तपस्विनी भार्या शतरुपा ने प्रियव्रत और उत्तानपाद नामक दो पुत्र और एक सुन्दर कन्या उत्पन्न की। वह कमनीया कन्या (देवहूति) कर्दम ऋषि की भार्या हुई।

राजा प्रियव्र्त से सम्राट कुक्षि और विराट नामक सामर्थ्यशाली पुत्र उत्पन्न हुए।

उत्तानपाद से सुरुचि के गर्भ से उत्तम नामक पुत्र उत्पन्न हुआ और सुनिती के गर्भ से ध्रुव का जन्म हुआ। हे मुने! कुमार ध्रुव ने सुन्दर कीर्ति बढाने के लिए तीन हजार दिव्य वर्षों तक तप किया। (श्रीमद्भागवत के वर्णानुसार ध्रुव केवल छ: मास तपस्या करके सिद्धि के भागी हुए थे। अग्निपुराण में तपस्या काल बहुत अधिक कहा गया है। कल्पभेद से दोनों ही वर्णन संगत हो सकते हैं।) उस पर भगवान विष्णु ने उसे सप्तर्षियों के आगे स्थिर स्थान (ध्रुवपद) दिया। ध्रुव के इस अभ्युदय को देखकर शुक्राचार्य ने उनके सुयश का सूचक यह श्लोक पढा - "अहो! इस ध्रुव के तपस्या का कितना प्रभाव है, इसका शास्त्र - ज्ञान कितना अद्भुत है, जिसे आज सप्तर्षि भी आगे करके स्थित हैं।" उस ध्रुव से उनकी पत्नी शम्भु ने श्लिष्टि और भव्य नामक पुत्र उत्पन्न किये।

श्लिष्टि से उसकी पत्नी सुच्छाया ने क्रमश: रिपु, रिपुंजय, पुष्य, वृकल और वृकतेजा - इन पॉंच निष्पाप पुत्रों को अपने गर्भ में धारण किया। रिपु से बृहती ने चाक्षुष और सर्वतेजा को अपने गर्भ में स्थान दिया।।१-७।।

चाक्षुष ने वीरण प्रजापति की कन्या पुष्करिणी के गर्भ से मनु को जन्म दिया।

मनु से नड्वला के गर्भ से दस उत्तम पुत्र उत्पन्न हुए। उनके नाम क्रमश: उरु, पुरु, शतद्द्युम्न, तपस्वी, सत्यवाक, कवि, अग्निष्टुत, अतिरात्र, सुद्द्युम्न और अभिमन्यु हैं।

उरु के अंश से आग्नेयी ने अङ्ग, सुमना, स्वाति, क्रतु, अङ्गिरा और गय नामक छ: पुत्र उत्पन्न किये।

अङ्ग से सुनिथा ने एक ही संतान वेन को जन्म दिया। वह प्रजाओ की रक्षा न करके सदा पाप में ही लगा रहता था। उसे मुनियों ने कुशों से ही मार डाला। तदनन्तर ऋषियों ने संतान के लिए वेन के दायें हाथ का मंथन किया। हाथ का मन्थन करने से राजा पृथु प्रकट हुए। उन्हें देखकर मुनियों ने कहा - " ये महान तेजस्वी राजा अवश्य ही समस्त प्रजा को आनन्दित करेंगे तथा महान यश प्राप्त करेंगे।" क्षत्रिय वंश के पूर्वज वेन कुमार राजा पृथु अपने तेज से सबको दग्ध करते हुए - से धनुष और कवच धारण किये हुए ही प्रकट हुए थे; वे सम्पूर्ण प्रजा की रक्षा करने लगे।।८-१४।।

राजसूय यज्ञ में दीक्षित होनेवाले नरेशों में वे सबसे पहले भूपाल थे। उनके दो पुत्र हुए। स्तुति कर्म में निपुण अद्भुत कर्मा सूत और मागधों ने उनका स्तवन किया। वे प्रजाओ का रंजन करने के कारण "राजा" नाम से विख्यात हुए। उन्होंने प्रजाओ के जीवन - रक्षा के निमित्त अन्न की उपज बढाने के लिए गोरुप धारिणी पृथ्वी का दोहण किया। उस समय एक साथ ही देवता, मुनिवृन्द, गन्धर्व, अप्सरागण, पितर, दानव, सर्प, लता, पर्वत और मनुष्यों आदि के द्वारा अपने - अपने विभिन्न पात्रों में दुही जानेवाली पृथ्वी ने सबको इच्छानुसार दुध दिया, जिससे सबने प्राण धारण किये। पृथु के जो दो धर्मज्ञ पुत्र उत्पन्न हुए, उनके नाम अन्तर्धि और पालित थे।

अनर्धि के अंश से उनकी शिखण्डिनी नामवाली पत्नि ने हविर्धान को जन्म दिया।

अग्निकुमारी घिषणा ने हविर्धान के अंश से छ: पुत्रों को उत्पन्न किया। उनके नाम क्रमश: प्राचिनबर्हिष, शुक्र, गय, कृष्ण, व्रज और अजिन थे।

राजा प्राचीनबर्हिष सदैव यज्ञ में ही लगे रहते थे, जिससे उस समय पृथ्वी पर दूर - दूर तक पूर्वाग्र कुश फैल गये थे। इससे वे ऐश्वर्यशाली राजा "प्राचीनबर्हिष" नाम से विख्यात हुए। वे एक महान प्रजापति थे।।१५-२१।।

प्राचीनबर्हिष से उनकी पत्नी समुद्र - कन्या सवर्णा ने दस पुत्रों को अपने गर्भ में धारण किया। वे सभी 'प्र्चेता' नाम से प्रसिद्ध हुए और सब के सब धनुर्वेद में पारंगत थे। वे एक समान धर्म का पालन करते हुए समुद्र के जल में रहकर दस हजार वर्षो तक महान तप में लगे रहे। अन्त में भगवान विष्णु से प्रजापति होने का वरदान पाकर वे संतुष्ट हो जल से बाहर निकले। उस समय प्राय: समस्त भूमण्डल और आकाश बड़े - बड़े सघन वृक्षों से व्याप्त हो गया था। यह देख उन्होंने अपने मुख से प्रकट अग्नि और वायु के द्वारा सब वृक्षों को जला दिया। तब वृक्षों का यह संहार देख राजा सोम इन प्रचेताओ के पास जाकर बोले - "आप लोग अपना कोप शान्त करें; ये वृक्षगण आपको एक "मारिषा" नामवाली सुन्दर कन्या अर्पण करेंगे। यह कन्या तपस्वी मुनि कण्डु के अंश से प्रम्लोचा अप्सरा गर्भ से(स्वेद-बिन्दु के रुप में) प्रकट हुई है। मैं ने ही भविष्य की बातें जानकर इसे कन्या रूप में पाला पोसा है। इसके गर्भ से दक्ष उत्पन्न होंगे, जो प्रजा की वृद्धि करेंगे"।।२२-२७।।

प्रचेताओ ने उस कन्या को ग्रहण किया। तत्पश्चात उसके गर्भ से दक्ष उत्पन्न हुए। दक्ष ने चर, अचर, द्विपद और चतुष्पद आदि प्राणियों की मानसिक सृष्टि करके अन्तमें बहुत सी स्त्रियों को उत्पन्न किया। उनमें से दस को तो उन्होंने धर्मराज को अर्पण किया और तेरह कन्याएँ कश्यप को दीं। सत्ताईस कन्याएँ चन्द्रमा को, चार अरिष्टनेमि को, दो बहुपुत्र को और दो कन्याएँ अङ्गिरा को दीं। पूर्वकाल में मानसिक संकल्प से सृष्टि होती थी। उसके बाद उन द्क्ष कन्याओ से मैथुन द्वारा देवता और नाग आदि प्रकट हुए।

अब मैं धर्मराज से उनकी दस पत्नियों के गर्भ से जो संतानें हुई, उस धर्मसर्ग का वर्णन करूँगा। विश्वा नामवाली पत्नी से विश्वेदेव प्रकट हुए। साध्या ने साध्यों को जन्म दिया। मरुत्वती से मरूत्वान और वसु से वसुगण प्रकट हुए। भानु से भानु और मुहूर्ता से मुहूर्त नामक पुत्र उत्पन्न हुए। धर्मराज के द्वारा लम्बा से घोष नामक पुत्र हुआ और यामि नामक पत्नी से नागवीथी नामवाली कन्या उत्पन्न हुई। पृथ्वी का सम्पूर्ण विषय़ भी मरूत्वती से ही प्रकट हुआ। संकल्पा के गर्भ से संकल्पों की सृष्टि हुई। चन्द्र्मा से उनकी नक्षत्र रूपिणी पत्नियों के गर्भ से आठ पुत्र उत्पन्न हुए।।२८-३४।।

उनके नाम ये हैं - आप, ध्रुव, सोम, धर, अनिल, अनल, प्रत्युष और प्रभास - ये आठ वसु हैं।

आप के वैतण्ड्य, श्रम, शान्त और मुनि नामक पुत्र हुए.। ध्रुव का पुत्र लोकान्तकारी काल हुआ और सोम का पुत्र वर्चा हुआ। धर की पत्नी मनोहरा के गर्भ से द्रविण, हुतह्व्यवह, शिशिर, प्राण और रमण उत्पन्न हुए। अनल का पुत्र पुरोजव और अनल (अग्नि) क अविज्ञात था। अग्नि का पुत्र कुमार हुआ, जो संरकंडों की ढेरी पर उत्पन्न हुआ। उसके पीछे शाख, विशाख और नैगमेय नामक पुत्र हुए। कुमार कृत्तिका के गर्भ से उत्पन्न होने के कारण 'कार्तिकेय' कहलाये तथा कृत्तिका के दुसरे पुत्र सनत्कुमार नामक यति हुए। प्रत्युष से देवल का जन्म हुआ तथा प्रभास से विश्वकर्मा का। ये विश्वकर्मा देवताओ के बढई थे और हजारों प्रकार के शिल्पकारी का काम करते थे। उनके ही निर्माण किये हुए शिल्प और भूषण आदि के सहारे आज भी मनुष्य अपनी जिवीका चलाते हैं।

सुरभी ने कश्यपजी के अंश से ग्यारह रूद्रों को उत्पन्न किया तथा हे साधुश्रेष्ठ! सती ने अपनी तपस्या एवं महादेवजी के अनुग्रह से चार पुत्र उत्पन्न किये। उनके नाम अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य, त्वष्टा और रूद्र हैं। त्वष्टा के पुत्र महायशस्वी श्रीमान विश्वरुप हुए। हर, बहुरूप, त्र्यम्बक, अपराजित, वृषाकपि, शम्भू, कपर्दी, रैवत, मृगव्याध, सर्प और कपाली - ये ग्यारह रूद्र प्रधान हैं। यों तो सैकड़ो - लाखों रूद्र हैं, जिनसे यह चराचर जगत व्याप्त है।।३५-४५।।

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