अग्निदेव कहते हैं - श्रीविष्णु के नाभि कमल से ब्रह्मा का प्रादुर्भाव हूआ। ब्रह्माजी से अत्रि, अत्रि से सोम, सोम से बुध एवं बुध से पुरुरवा उत्पन्न हुए। पुरुरवा से आयु, आयु से नहूष तथा नहूष से ययाति का जन्म हुआ। ययाति की पहली पत्नी देवयानि ने यदु और तुर्वसु नामक दो पुत्रों को जन्म दिया। उनकी दूसरी पत्नी शर्मिष्ठा के गर्भ से, जो वृषपर्वा की पुत्री थी, द्रुह्यु, अनु और पुरु - ये तीन पुत्र उत्पन्न हुए। यदु के वंश "यादव" नामसे प्रसिद्ध क्षत्रिय हुए। उन सबमें भगवान वासुदेव सर्वश्रेष्ठ थे। परम पुरुष भगवान विष्णु इस पृथ्वी का भार उतारने के लिए वसुदेव और देवकी के पुत्र रूप में प्रकट हुए थे। भगवान विष्णु की प्रेरणा से योग निद्रा ने क्रमशः छः गर्भ, जो पूर्वेजन्म में हिरण्यकशिपु के पुत्र थे, देवकी के उदर में स्थापित किये। सातवें गर्भ के रूप में बलभद्रजी प्रकट हुए थे। ये देवकी से रोहिणी के गर्भ में खींचकर लाये गये थे, इसलिए रोहिणेय कहलाये।
तदनन्तर श्रावण मास के (शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से लेकर कृष्णपक्ष की आमावस्या तक एक मास होता है। इस मान्यता के अनुसार गणना करने पर आज की गणना के अनुसार जो भाद्रपद कृष्ण अष्टमी है वही श्रावण कृष्ण अष्टमी सिद्ध होती है।) कृष्ण पक्ष की अष्टमी को आधी रात के समय चार भुजाधारी भगवान श्रीहरि प्रकट हुए। उस समय देवकी और वसुदेव ने उनका स्तवन किया। फिर वे दो बॉंहों वाले नन्हें से बालक बन गये। वसुदेव कंश के भय से अपने शिशु को यशोदा की शय्या पर पहुँचा दिया और यशोदा की नवजात बालिका को देवकी की शय्या पर लाकर सुला दिया। बच्चे के रोने की आवाज सुनकर कंश आ पहुँचा और देवकी के मना करने पर भी उसने उस बालिका को उठाकर शिला पर पटक दिया। उसने आकाशवाणी से सुन रखा था कि देवकी के आठवें गर्भ से मेरी मृत्यु होगी। इसलिए उसने देवकी के उत्पन्न हुए सभी शिशुओ को मार डाला।।१-९।।
कंश के द्वारा शिला पर पटकी हुई वह बालिका आकाश में उड़ गई और बोली - ' कंश! मुझे पटकने से तुम्हारा क्या लाभ हुआ? जिनके हाथों से तुम्हारा वध होगा वे देवताओ के सर्वस्वभूत भगवान तो इस पृथ्वी का भार उतारने के लिए अवतार ले चुके'।।१०-११।।
एक माली के द्वार पर उन्होंने बलरामजी के साथ फूल की मालाएँ धारण कीं और माली को उत्तम वर दिया । कंस की दासी कुब्जा ने उनके शरीर में चंदन का लेप कर दिया, इससे प्रसन्न होकर उन्होंने उसका कुबड़ापन दूर कर दिया - उसे सुडौल एवं सुन्दर बना दिया। आगे जाने पर रङ्गशाला के द्वार पर खड़े हुए कूबलयपीड नामक मतवाले हाथी को मारा और रङ्गभूमि में प्रवेश करके श्रीकृष्ण ने मञ्चपर बैठे हुए कंस आदि राजाओ के समक्ष चाणूर मल्ल के ललकारने पर उस से कूश्ती लड़ी और बलराम ने मुष्टिक नाम वाले पहलवान के साथ दंगल शुरु किया। उन दोनों भाईयों ने चाणूर, मूष्ठिक तथा अन्य पहलवानों को भी मार गिराया। तत्पश्चात श्रीहरि ने मथूराधिपति कंश को मारकर उसके पिता उग्रसेन को यदुवंशियों का राजा बनाया। कंश की दो रानियॉं थीं - अस्ति और प्राप्ति। वे दोनों जरासंध की पुत्रियॉं थी। उनकी प्रेरणा से जरासन्ध ने मथुरापुरी पर घेरा डाल दिया और यदुवंशियों के साथ बाणों से युद्ध करने लगा। बलराम और श्रीकृष्ण जरासन्ध को परास्त करके मथुरा छोड़कर गोमन्त पर्वत पर चले आये और द्वारका नगरी का निर्माण करके वहीं यदुवंशियों के साथ रहने लगे।
उन्होंने युद्ध में वासुदेव नाम धारण करने वाले पौण्ड्र्क को भी मारा तथा भूमिपुत्र नरकासुर का वध करके उसके द्वारा हरकर लायी हुई देवता, गन्धर्व तथा यक्षों की कन्याओ के साथ विवाह किया। श्रीकृष्ण की सोलह हजार आठ रानियॉं थीं, उनमें रुक्मिणी आदि प्रधान थीं।।२४-३१।।
इसके बाद नरकासुर का दमन करनेवाले भगवान श्रीकृष्ण सत्यभामा के साथ गरुड़ पर आरुढ होकर स्वर्गलोक में गये। वहॉं से इन्द्र को परस्त करके रत्नोंसहित मणिपर्वत तथा पारिजात वृक्ष उठा लाये और उन्हें सत्यभामा के भवन में स्थापित कर दिया।
श्रीकृष्ण ने सान्दीपनि मुनि से अस्त्र - शस्त्रों की शिक्षा ग्रहण की थी। शिक्षा पाने के अनन्तर उन्होंने गुरु दक्षिणा के रुप में गुरू के मरे हुए बालक को लाकर दिया था। इसके लिए उन्हें ' पञ्चजन' नामक दैत्य को परास्त करके यमराज के लोक में भी जाना पड़ा था। वहॉं यमराज ने उनकी बड़ी पूजा की थी।
उन्होंने राजा मुचुकन्द के द्वारा कालयवन का वध करवा दिया। उस समय राजा मुचुकन्द ने भी भगवान की पूजा की थी। भगवान श्रीकृष्ण वसुदेव, देवकी तथा भगवद्भक्त ब्राह्मणों का बड़ा आदर-सत्कार करते थे।
बलभद्रजी के द्वारा रेवती के गर्भ से निसठ और उल्मुक नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए। श्रीकृष्ण द्वारा जाम्बन्ती के गर्भ से साम्ब का जन्म हुआ। इसी प्रकार अन्य रानियों से अन्यान्य पुत्र उत्पन्न हुए।
रुक्मिणी के गर्भ से प्रद्द्युम्न का जन्म हुआ था। वे छ: दिन के थे, तभी शम्बरासुर उन्हें मायाबल से हर ले गया। उसने बालक को समुद्र में फेंक दिया। समुद्र में उसे एक मत्स्य निगल गया। उस मत्स्य को एक मल्लाह ने पकड़ा और शम्बरासुर को भेंट किया। फिर शम्बरासुर ने उस मत्स्य को मायावती के हवाले कर दिया। मायावती ने मत्स्य के पेट में अपने पति को देखकर बड़े आदर से उसका पालन पोषण किया। बड़े हो जाने पर मायावती ने प्रद्द्युम्न से कहा - ' नाथ! मैं आपकी पत्नी रति हूँ और आप मेरे पति कामदेव हैं। पूर्वकाल में भगवान शङ्कर ने आपको अनङ्ग (शरीर रहित) कर दिया था। आपके न रहने से शम्बरासुर मुझे हर लाया है। मैंने उसकी पत्नी होना स्वीकार नहीं किया है। आप माया के ज्ञाता हैं, अतः शम्बरासूर को मार डालिए'।।३२-३९।।
यह सुनकर प्रद्द्युम्न ने शम्बरासूर का वध किया और अपनी भार्या मायावती के साथ वे श्रीकृष्ण के पास चले गये। प्रद्द्युम्न से उदारबुद्धि अनिरुद्ध का जन्म हुआ। बड़े होने पर वे उषा के स्वामी हुए। राजा बलि के बाण नामक पुत्र था। उषा उसी की पुत्री थी। उसका निवास स्थान शोणितपुर में था। बाण ने बड़ी भारी तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे अपना पुत्र मान लिया।
एक दिन शिवजी ने बलोन्मत्त बाणासुर की युद्ध विषयक इच्छा से संतुष्ट होकर उससे कहा - ' बाण! जिस दिन तुम्हारे महल का मयूरध्वज अपने - आप टूटकर गिर जाय, उस दिन यह समझना कि तुम्हें युद्ध प्राप्त होगा।'
एक दिन कैलाश पर्वत पर भगवती पार्वती भगवान शङ्कर के साथ क्रीडा कर रहीं थीं। उन्हें देखकर उषा के मन में भी पति की अभिलाषा जाग्रत हुई। पार्वतीजी ने उसके मनोभाव को समझकर कहा - ' वैशाख मास की द्वादशी तिथि को रात के समय स्वप्न में जिस पुरूष का तुम्हें दर्शन होगा, वही तुम्हारा पति होगा।' पार्वतीजी की यह बात सुनकर उषा बहुत प्रसन्न हूई। उक्त तिथी को जब वह अपने घर में सो गयी, तब उसे वैसा ही स्वप्न दिखाई दिया। उषा की एक सखी चित्रलेखा थी। वह बाणासुर के मन्त्री कुष्भाण्ड की कन्या थी। उसके बनाये हुए चित्रपट से उषा ने अनिरूद्ध को पहचाना कि वे ही स्वप्न में उससे मिले थे। उसने चित्रलेखा के ही द्वारा श्रीकृष्ण - पौत्र अनिरूद्ध को द्वारका से अपने यहॉं बुला लिया। अनिरूद्ध आये और उषा के साथ विहार करते हुए रहने लगे। इसी समय मयूरध्वज के रक्षकों ने बाणासुर को ध्वज के गिरने की सूचना दी। फिर तो अनिरूद्ध और बाणासूर में भयंकर युद्ध हुआ।।४०-४७।।
तदनन्तर श्रावण मास के (शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से लेकर कृष्णपक्ष की आमावस्या तक एक मास होता है। इस मान्यता के अनुसार गणना करने पर आज की गणना के अनुसार जो भाद्रपद कृष्ण अष्टमी है वही श्रावण कृष्ण अष्टमी सिद्ध होती है।) कृष्ण पक्ष की अष्टमी को आधी रात के समय चार भुजाधारी भगवान श्रीहरि प्रकट हुए। उस समय देवकी और वसुदेव ने उनका स्तवन किया। फिर वे दो बॉंहों वाले नन्हें से बालक बन गये। वसुदेव कंश के भय से अपने शिशु को यशोदा की शय्या पर पहुँचा दिया और यशोदा की नवजात बालिका को देवकी की शय्या पर लाकर सुला दिया। बच्चे के रोने की आवाज सुनकर कंश आ पहुँचा और देवकी के मना करने पर भी उसने उस बालिका को उठाकर शिला पर पटक दिया। उसने आकाशवाणी से सुन रखा था कि देवकी के आठवें गर्भ से मेरी मृत्यु होगी। इसलिए उसने देवकी के उत्पन्न हुए सभी शिशुओ को मार डाला।।१-९।।
कंश के द्वारा शिला पर पटकी हुई वह बालिका आकाश में उड़ गई और बोली - ' कंश! मुझे पटकने से तुम्हारा क्या लाभ हुआ? जिनके हाथों से तुम्हारा वध होगा वे देवताओ के सर्वस्वभूत भगवान तो इस पृथ्वी का भार उतारने के लिए अवतार ले चुके'।।१०-११।।
ऐसा कहकर वह चली गई। उसी ने देवताओ की प्रार्थना से शुम्भ आदि दैत्यों का वध किया। तब इन्द्र ने इस प्रकार स्तुति की - ' जो आर्या, दुर्गा, वेदगर्भा, अम्बिका, भद्रकाली, भद्रा, क्षेम्या, क्षेमकरी तथा नैकबाहु(अनेक बॉंहोंवाली) आदि नामों से प्रसिद्ध हैं, उन जगदम्बा को मैं नमस्कार करता हूँ।' जो तीनों समय इन नामों का पाठ करता है, उसकी सब कामनाऍं पूर्ण होती है।
उधर कंश ने भी बालिका की बात सुनकर नवजात शिशुओ का वध करने के लिए पूतना आदि को सब ओर भेजा। कंश आदि से डरे हुए वसुदेव ने अपने दोनों पुत्रों की रक्षा के लिए उन्हें गोकुल में यशोदापति नन्दजी को सौप दिया था। वहॉं बलराम और श्रीकृष्ण - दोनों भाई गौओ तथ ग्वालबालों के साथ विचरा करते थे। यद्दपि वे सम्पूर्ण जगत के पालक थे, तो भी व्रज में गो पालक बन कर रहे। एक बार श्रीकृष्ण ऊधम से तंग आकर मैया यशोदा ने उन्हें रस्सी से ऊखल में बॉंध दिया। वे ऊखल घसीटते हुए दो अर्जून - वृक्षों के बीच से निकले। इससे वे दोनों वृक्ष टूटकर गिर पड़े। एक दिन श्रीकृष्ण एक छकड़े के नीचे सो रहे थे। वे माता के स्तनपान करने की इच्छा से अपने पैर फेंक - फेंककर रोने लगे। उनके पैर का हल्का सा आघात लगते ही छकड़ा उलट गया।।१२-१७।।
पूतना अपना स्तन पिलाकर श्रीकृष्ण को मारने के लिए उद्दत थी; किन्तु श्रीकृष्ण ने ही उसका काम तमाम कर दिया। उन्होंने वृन्दावन में जाने के पश्चात कालिय नाग को परास्त किया और उसे यमुना के कुण्ड से निकालकर समुद्र में भेज दिया। बलरामजी के साथ जा, गदहे का रुप धारण करनेवाले धेनुकासुर को मारकर, उन्होंने तालवन को क्षेमयुक्त स्थान बना दिया तथा वृषभरुपधारी अरिष्टासुर और अश्वरुपधारी केशी को मार डाला। फिर श्रीकृष्ण ने इन्द्रयाग के उत्सव को बंद कराया और उसके स्थान में गिरीराज गोवर्धन की पूजा प्रचलित की। इससे कूपित हो इन्द्र ने जो वर्षा आरम्भ की, उसका निवारण श्रीकृष्ण गोवर्धन पर्वत को धारण करके किया। अन्त में महेन्द्र ने आकर उनके चरणों में मस्तक झुकाया और उन्हें " गोविन्द" की पदवी दी। फिर अपने पुत्र अर्जून को उन्हें सौंपा। इससे संतुष्ट होकर श्रीकृष्ण ने पुन: इन्द्रयाग का भी उत्सव कराया। तदनन्तर एक दिन वे दोनों भाई कंश का संदेश लेकर आए हुए अक्रूर के साथ रथ पर बैठकर मथुरा चले गये। जाते समय श्रीकृष्ण में अनुराग रखने वाली गोपियॉं, जिनके साथ वे भॉंति - भॉंति की मधुर लीलाएँ कर चुके थे, उन्हें बहुत देर तक निहारती रहीं। मार्ग में अक्रूर ने उनकी स्तुति की।
मथुरा में एक धोबी को, जो बहुत बढ - चढ्कर बातें बना रहा था, मारकर श्रीकृष्ण ने उससे सारे वस्त्र ले लिए।।१८-२३।।
पूतना अपना स्तन पिलाकर श्रीकृष्ण को मारने के लिए उद्दत थी; किन्तु श्रीकृष्ण ने ही उसका काम तमाम कर दिया। उन्होंने वृन्दावन में जाने के पश्चात कालिय नाग को परास्त किया और उसे यमुना के कुण्ड से निकालकर समुद्र में भेज दिया। बलरामजी के साथ जा, गदहे का रुप धारण करनेवाले धेनुकासुर को मारकर, उन्होंने तालवन को क्षेमयुक्त स्थान बना दिया तथा वृषभरुपधारी अरिष्टासुर और अश्वरुपधारी केशी को मार डाला। फिर श्रीकृष्ण ने इन्द्रयाग के उत्सव को बंद कराया और उसके स्थान में गिरीराज गोवर्धन की पूजा प्रचलित की। इससे कूपित हो इन्द्र ने जो वर्षा आरम्भ की, उसका निवारण श्रीकृष्ण गोवर्धन पर्वत को धारण करके किया। अन्त में महेन्द्र ने आकर उनके चरणों में मस्तक झुकाया और उन्हें " गोविन्द" की पदवी दी। फिर अपने पुत्र अर्जून को उन्हें सौंपा। इससे संतुष्ट होकर श्रीकृष्ण ने पुन: इन्द्रयाग का भी उत्सव कराया। तदनन्तर एक दिन वे दोनों भाई कंश का संदेश लेकर आए हुए अक्रूर के साथ रथ पर बैठकर मथुरा चले गये। जाते समय श्रीकृष्ण में अनुराग रखने वाली गोपियॉं, जिनके साथ वे भॉंति - भॉंति की मधुर लीलाएँ कर चुके थे, उन्हें बहुत देर तक निहारती रहीं। मार्ग में अक्रूर ने उनकी स्तुति की।
मथुरा में एक धोबी को, जो बहुत बढ - चढ्कर बातें बना रहा था, मारकर श्रीकृष्ण ने उससे सारे वस्त्र ले लिए।।१८-२३।।
एक माली के द्वार पर उन्होंने बलरामजी के साथ फूल की मालाएँ धारण कीं और माली को उत्तम वर दिया । कंस की दासी कुब्जा ने उनके शरीर में चंदन का लेप कर दिया, इससे प्रसन्न होकर उन्होंने उसका कुबड़ापन दूर कर दिया - उसे सुडौल एवं सुन्दर बना दिया। आगे जाने पर रङ्गशाला के द्वार पर खड़े हुए कूबलयपीड नामक मतवाले हाथी को मारा और रङ्गभूमि में प्रवेश करके श्रीकृष्ण ने मञ्चपर बैठे हुए कंस आदि राजाओ के समक्ष चाणूर मल्ल के ललकारने पर उस से कूश्ती लड़ी और बलराम ने मुष्टिक नाम वाले पहलवान के साथ दंगल शुरु किया। उन दोनों भाईयों ने चाणूर, मूष्ठिक तथा अन्य पहलवानों को भी मार गिराया। तत्पश्चात श्रीहरि ने मथूराधिपति कंश को मारकर उसके पिता उग्रसेन को यदुवंशियों का राजा बनाया। कंश की दो रानियॉं थीं - अस्ति और प्राप्ति। वे दोनों जरासंध की पुत्रियॉं थी। उनकी प्रेरणा से जरासन्ध ने मथुरापुरी पर घेरा डाल दिया और यदुवंशियों के साथ बाणों से युद्ध करने लगा। बलराम और श्रीकृष्ण जरासन्ध को परास्त करके मथुरा छोड़कर गोमन्त पर्वत पर चले आये और द्वारका नगरी का निर्माण करके वहीं यदुवंशियों के साथ रहने लगे।
उन्होंने युद्ध में वासुदेव नाम धारण करने वाले पौण्ड्र्क को भी मारा तथा भूमिपुत्र नरकासुर का वध करके उसके द्वारा हरकर लायी हुई देवता, गन्धर्व तथा यक्षों की कन्याओ के साथ विवाह किया। श्रीकृष्ण की सोलह हजार आठ रानियॉं थीं, उनमें रुक्मिणी आदि प्रधान थीं।।२४-३१।।
इसके बाद नरकासुर का दमन करनेवाले भगवान श्रीकृष्ण सत्यभामा के साथ गरुड़ पर आरुढ होकर स्वर्गलोक में गये। वहॉं से इन्द्र को परस्त करके रत्नोंसहित मणिपर्वत तथा पारिजात वृक्ष उठा लाये और उन्हें सत्यभामा के भवन में स्थापित कर दिया।
श्रीकृष्ण ने सान्दीपनि मुनि से अस्त्र - शस्त्रों की शिक्षा ग्रहण की थी। शिक्षा पाने के अनन्तर उन्होंने गुरु दक्षिणा के रुप में गुरू के मरे हुए बालक को लाकर दिया था। इसके लिए उन्हें ' पञ्चजन' नामक दैत्य को परास्त करके यमराज के लोक में भी जाना पड़ा था। वहॉं यमराज ने उनकी बड़ी पूजा की थी।
उन्होंने राजा मुचुकन्द के द्वारा कालयवन का वध करवा दिया। उस समय राजा मुचुकन्द ने भी भगवान की पूजा की थी। भगवान श्रीकृष्ण वसुदेव, देवकी तथा भगवद्भक्त ब्राह्मणों का बड़ा आदर-सत्कार करते थे।
बलभद्रजी के द्वारा रेवती के गर्भ से निसठ और उल्मुक नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए। श्रीकृष्ण द्वारा जाम्बन्ती के गर्भ से साम्ब का जन्म हुआ। इसी प्रकार अन्य रानियों से अन्यान्य पुत्र उत्पन्न हुए।
रुक्मिणी के गर्भ से प्रद्द्युम्न का जन्म हुआ था। वे छ: दिन के थे, तभी शम्बरासुर उन्हें मायाबल से हर ले गया। उसने बालक को समुद्र में फेंक दिया। समुद्र में उसे एक मत्स्य निगल गया। उस मत्स्य को एक मल्लाह ने पकड़ा और शम्बरासुर को भेंट किया। फिर शम्बरासुर ने उस मत्स्य को मायावती के हवाले कर दिया। मायावती ने मत्स्य के पेट में अपने पति को देखकर बड़े आदर से उसका पालन पोषण किया। बड़े हो जाने पर मायावती ने प्रद्द्युम्न से कहा - ' नाथ! मैं आपकी पत्नी रति हूँ और आप मेरे पति कामदेव हैं। पूर्वकाल में भगवान शङ्कर ने आपको अनङ्ग (शरीर रहित) कर दिया था। आपके न रहने से शम्बरासुर मुझे हर लाया है। मैंने उसकी पत्नी होना स्वीकार नहीं किया है। आप माया के ज्ञाता हैं, अतः शम्बरासूर को मार डालिए'।।३२-३९।।
यह सुनकर प्रद्द्युम्न ने शम्बरासूर का वध किया और अपनी भार्या मायावती के साथ वे श्रीकृष्ण के पास चले गये। प्रद्द्युम्न से उदारबुद्धि अनिरुद्ध का जन्म हुआ। बड़े होने पर वे उषा के स्वामी हुए। राजा बलि के बाण नामक पुत्र था। उषा उसी की पुत्री थी। उसका निवास स्थान शोणितपुर में था। बाण ने बड़ी भारी तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे अपना पुत्र मान लिया।
एक दिन शिवजी ने बलोन्मत्त बाणासुर की युद्ध विषयक इच्छा से संतुष्ट होकर उससे कहा - ' बाण! जिस दिन तुम्हारे महल का मयूरध्वज अपने - आप टूटकर गिर जाय, उस दिन यह समझना कि तुम्हें युद्ध प्राप्त होगा।'
एक दिन कैलाश पर्वत पर भगवती पार्वती भगवान शङ्कर के साथ क्रीडा कर रहीं थीं। उन्हें देखकर उषा के मन में भी पति की अभिलाषा जाग्रत हुई। पार्वतीजी ने उसके मनोभाव को समझकर कहा - ' वैशाख मास की द्वादशी तिथि को रात के समय स्वप्न में जिस पुरूष का तुम्हें दर्शन होगा, वही तुम्हारा पति होगा।' पार्वतीजी की यह बात सुनकर उषा बहुत प्रसन्न हूई। उक्त तिथी को जब वह अपने घर में सो गयी, तब उसे वैसा ही स्वप्न दिखाई दिया। उषा की एक सखी चित्रलेखा थी। वह बाणासुर के मन्त्री कुष्भाण्ड की कन्या थी। उसके बनाये हुए चित्रपट से उषा ने अनिरूद्ध को पहचाना कि वे ही स्वप्न में उससे मिले थे। उसने चित्रलेखा के ही द्वारा श्रीकृष्ण - पौत्र अनिरूद्ध को द्वारका से अपने यहॉं बुला लिया। अनिरूद्ध आये और उषा के साथ विहार करते हुए रहने लगे। इसी समय मयूरध्वज के रक्षकों ने बाणासुर को ध्वज के गिरने की सूचना दी। फिर तो अनिरूद्ध और बाणासूर में भयंकर युद्ध हुआ।।४०-४७।।
नारदजी के मुख से अनिरुद्ध के शोणितपुर पहुँचने का समाचार सुनकर, भगवान श्रीकृष्ण प्रद्युम्न और बलभद्र को साथ ले, गरूड पर बैठकर वहॉं गये और अग्नि एवं माहेश्वर ज्वर को जीतकर शङ्करजी के साथ युद्ध करने लगे। श्रीकृष्ण और शङ्कर में परस्पर बाणों के आघात - प्रत्याघात से युक्त्त भीषण युद्ध होने लगा। नन्दी, गणेश और कार्तिकेय आदि प्रमुख वीरों को गरूड आदि ने तत्काल परास्त कर दिया। श्रीकृष्ण ने जृम्भणास्त्र का प्रयोग किया, जिससे भगवान शङ्कर जँभाई लेते हुये सो गये। इसी बीच में श्रीकृष्ण ने बाणसुर के हजार भुजाएँ काट डालीं। जृम्भणास्त्र का प्रभाव कम होने पर शिवजी ने बाणासुर के लिए अभयदान मॉंगा, तब श्रीकृष्ण ने दो भुजाओ के साथ बाणासुर को छोड़ दिया और शङ्करजी से कहा - ।।४८-५१।।
श्रीकृष्ण बोले - भगवन! आपने जब बाणासुर के लिए अभयदान दिया है, तो मैं ने भी दे दिया। हम दोनों में कोई भेद नहीं है। जो भेद मानता है, वह नरक में पड़ता है।।५२।।
अग्निदेव कहते हैं - तदनन्तर शिव आदिने श्रीकृष्ण का पूजन किया। वे अनिरूद्ध और उषा आदि के साथ द्वारका में जाकर उग्रसेन आदि यादवों के साथ आनन्द पूर्वक रहने लगे।।५३।।
अनिरूद्ध के वज्र नामक पुत्र हुआ। उसने मार्कण्डेय मुनि से सब विद्याओं का ज्ञान प्राप्त किया। बलभद्रजी ने प्रलम्बासुर को मारा, यमुनाजी के धारा को खींचकर फेर दिया, द्विविद नामक बानर का संहार किया तथा अपने हल के अग्र भाग से हस्तिनापुर को गङ्गा में झुकाकर कौरवों के घमंड को चूर - चूर कर दिया।
भगवान श्रीकृष्ण अनेक रूप धारण करके अपनी रुक्मिणी आदि रानियो के साथ विहार करते रहे। उन्होंने असंख्य पुत्रों को जन्म दिया। अन्त में यादवों का उपसंहार करके वे परमधाम को पधारे। जो इस हरिवंश का पाठ करता है, वह सम्पूर्ण कामनाएँ प्राप्त करके अन्त में श्रीहरि के पास जाता है।।५४-५६।।
श्रीकृष्ण बोले - भगवन! आपने जब बाणासुर के लिए अभयदान दिया है, तो मैं ने भी दे दिया। हम दोनों में कोई भेद नहीं है। जो भेद मानता है, वह नरक में पड़ता है।।५२।।
अग्निदेव कहते हैं - तदनन्तर शिव आदिने श्रीकृष्ण का पूजन किया। वे अनिरूद्ध और उषा आदि के साथ द्वारका में जाकर उग्रसेन आदि यादवों के साथ आनन्द पूर्वक रहने लगे।।५३।।
अनिरूद्ध के वज्र नामक पुत्र हुआ। उसने मार्कण्डेय मुनि से सब विद्याओं का ज्ञान प्राप्त किया। बलभद्रजी ने प्रलम्बासुर को मारा, यमुनाजी के धारा को खींचकर फेर दिया, द्विविद नामक बानर का संहार किया तथा अपने हल के अग्र भाग से हस्तिनापुर को गङ्गा में झुकाकर कौरवों के घमंड को चूर - चूर कर दिया।
भगवान श्रीकृष्ण अनेक रूप धारण करके अपनी रुक्मिणी आदि रानियो के साथ विहार करते रहे। उन्होंने असंख्य पुत्रों को जन्म दिया। अन्त में यादवों का उपसंहार करके वे परमधाम को पधारे। जो इस हरिवंश का पाठ करता है, वह सम्पूर्ण कामनाएँ प्राप्त करके अन्त में श्रीहरि के पास जाता है।।५४-५६।।
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