अग्निदेव कहते हैं - युधिष्ठिर और दुर्योधन की सेनाएँ कुरुक्षेत्र के मैदान में जा डटीं। अपने विपक्ष में पितामह भीष्म तथा आचार्य द्रोण आदि गुरूजनों को देखकर अर्जुन युद्ध से विरत हो गये, तब भगवान श्रीकृष्ण ने कहा - " पार्थ! भीष्म आदि गुरूजन शोक के योग नहीं हैं। मनुष्य का शरीर विनाशशील है; किन्तु आत्मा का कभी नाश नही होता। यह आत्मा परब्रह्म है। " मैं ब्रह्म हूँ" - इस प्रकार तुम उस आत्मा को समझो। कार्य की सिद्धि या असिद्धि में समान भाव से रहकर कर्मयोग का आश्रय ले क्षात्रधर्म का पालन करो।" श्रीकृष्ण के ऐसा कहने पर अर्जुन रथारुढ़ हो युद्ध में प्रवृत्त हुए। उन्होंने शंङ्खध्वनि की। दुर्योधन की सेना में पहले पितामह भीष्म सेनापति हुए। पाण्डवों के सेनापति शिखण्डी थे। इन दोनों में भारी युद्ध छिड़ गया। भीष्म सहित कौरव पक्ष के योद्धा उस युद्ध में पाण्डव पक्ष के सैनिकों पर प्रहार करने लगे और शिखण्डी आदि पाण्डव पक्ष के वीर कौरव सैनिकों को अपने बाणों का निशाना बनाने लगे। कौरवों और पाण्डवों का वह युद्ध, देवासुर - संग्राम के समान जान पड़ता था। आकाश में खड़े होकर देखनेवाले देवताओ को वह युद्ध बड़ा आनन्ददायक प्रतीत हो रहा था। भीष्म ने दस दिनों तक युद्ध करके पाण्डवों के अधिकांश सेना को अपने बाणों से मार गिराया।।१ - ७।।
दसवें दिन अर्जुन ने वीरवर भीष्म पर बाणों की भारी वृष्टि की। उधर द्रुपद की प्रेरणा से शिखण्डी ने भी पानी बरसाने वाले मेघ की भॉंति भीष्म पर बाणों की झड़ी लगा दी। दोनों ओर के हाथीसवार, घुड़सवार, रथी और पैदल एक - दुसरे के बाणों से मारे गये। भीष्म की मृत्यु उनकी इच्छा के अधीन थी। उन्होने युद्ध का मार्ग दिखाकर वसु देवता के कहने पर वसुलोक में जाने की तैयारी की और बाणशय्या पर सो रहे। वे उत्तरायण की प्रतीक्षा में भगवान श्रीविष्णु का ध्यान और स्तवन करते हुए समय व्यतीत करने लगे। भीष्म के बाण- शय्या पर गिर जाने के बाद जब दुर्योधन शोक से व्याकुल हो उठा, तब आचार्य द्रोण ने सेनापतित्व का भार ग्रहण किया। उधर हर्ष मनाती हुई पाण्डवों की सेना में धृष्ट्द्द्युम्न सेनापति हुए। उन दोनों में बड़ा भयंकर युद्ध हुआ, जो यमलोक की आबादी बढाने वाला था। विराट और द्रुपद आदि राजा द्रोणरूपी समुद्र में डुब गये। हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिकों से युक्त दुर्योधन की विशाल वाहिनी धृष्ट्द्द्युम्न के हाथ से मारी जाने लगी। उस समय द्रोण काल के समान जान पड़ते थे। इतने में ही उनके कानों में यह आवाज आयी की 'अश्वत्थामा मारा गया'। इतना सुनते ही आचार्य द्रोण ने अस्त्र - शस्त्र त्याग दिये। ऐसे समय में धृष्ट्द्द्युम्न के बाणों से आहत होकर वे पृथ्वी पर गिर पड़े।।८ - १४।।
द्रोण बड़े दुर्धर्ष थे। वे सम्पूर्ण क्षत्रियों का विनाश करके पॉंचवें दिन मारे गये। दुर्योधन पुन: शोक से आतुर हो उठा। उस समय कर्ण उसके सेना का कर्णधार हुआ। पाण्ड्व सेना का आधिपत्य अर्जुन को मिला। कर्ण और अर्जुन में भॉंति - भॉंति केअस्त्र - शस्त्रों की मार - काट से युक्त महाभयानक युद्ध हुआ, जो देवासुर संग्राम को भी मात करनेवाला था। कर्ण और अर्जुन के संग्राम में कर्ण ने अपने बाणों से शत्रु पक्ष के बहुत से वीरों का संहार कर डाला; किन्तु दुसरे दिन अर्जुन ने उसे मार गिराया।।१५ - १७।।
तदनन्तर राजा शल्य कौरव सेना के सेनापति हुए; किंतु वे युद्ध में आधे दिन तक ही टिक सके। दोपहर होते - होते राजा युद्धिष्ठिर ने उन्हें मार गिराया। दुर्योधन की प्राय: सारी सेना युद्ध में मारी गयी थी। अन्ततोगत्वा उसका भीमसेन के साथ युद्ध हुआ। उसने पाण्ड्व - पक्ष के पैदल आदि बहुत से सैनिकों का भीमसेन पर धावा किया। उस समय गदा से प्रहार करते हुए दुर्योधन को भीमसेन ने मौत के घाट उतार दिया। दुर्योधन के अन्य छोटे भाई भी भीमसेन के हाथ से ही मारे गये थे।
महाभारत संग्राम के उस अठारहवें दिन रात्री काल में महाबली अश्वत्मा ने पाण्ड्वों की सोयी हुई एक अक्षौहिणी सेना को सदा के लिए सुला दिया। उसने द्रौपदी के पॉंचों पुत्रों, उसके पाञ्चाल देशीय बन्धुओ तथा धृष्ट्द्द्युम्न को भी जीवित नहीं छोड़ा। द्रौपदी पुत्रहीन होकर रोने - बिलखने लगी। तब अर्जुन ने सींक के अस्त्र से अश्वत्मा को परास्त करके उसकी मणि निकाल ली। उसे मारा जाता देख द्रौपदी ने ही अनुनय - विनय करके उसके प्राण बचाये।।१८-२२।।
इतने पर भी दुष्ट अश्वत्मा ने उत्तरा के गर्भ को नष्ट करने के लिए उस पर अस्त्र का प्रयोग किया। वह गर्भ उसके प्रहार से प्राय: दग्ध हो गया था; किंतु भगवान श्रीकृष्ण ने उसको पुन: जीवन - दान दिया। उत्तरा का वही गर्भस्थ शिशु आगे चलकर राजा परीक्षित के नाम से विख्यात हुआ।
कृतवर्मा, कृपाचार्य तथा अश्वत्मा - ये तीन कौरव पक्षीय वीर उस संग्राम से जीवित बचे। दूसरी ओर पॉंच पाण्डव, सात्यकि तथा भगवान श्रीकृष्ण - ये सात ही जीवित रह सके; दुसरे कोई नहीं बचे।
उस समय सब ओर अनाथा स्त्रीयों का आर्तनाद वयाप्त हो रहा था। भीमसेन आदि भाईयों के साथ जाकर युद्धिष्ठिर ने उन्हें सात्वना दी तथा रणभूमि में मारे गये सभी वीरों का दाह - संस्कार करके उनके लिए जलाञ्जलि दे धन आदि का दान किया।
तत्पश्चात कुरुक्षेत्र में शरशय्यापर आसीन शान्तनुनन्दन भीष्म के पास जाकर युद्धिष्ठिर ने उनसे समस्त शान्तिदायक धर्म, राजधर्म, मोक्षधर्म तथा दानधर्म की बातें सुनीं। फिर वे राजसिंहासन पर आसीन हुए। इसके बाद उस शत्रुमर्दन राजा ने अश्वमेध - यज्ञ करके उसमें ब्राह्मणों को बहुत धन दान किया। तदनन्तर द्वारका से लौटे हुए अर्जुन के मुख से मूसलकाण्ड के कारण प्राप्त हुए शाप से पारस्परिक युद्ध द्वारा यादवों के संहार का समाचार सुनकर युद्धिष्ठिर ने परीक्षीत को राजासन पर बिठाया और स्वयं भाईयों के साथ महाप्रस्थान कर स्वर्गलोक को चले गये।।२३-२७।।
दसवें दिन अर्जुन ने वीरवर भीष्म पर बाणों की भारी वृष्टि की। उधर द्रुपद की प्रेरणा से शिखण्डी ने भी पानी बरसाने वाले मेघ की भॉंति भीष्म पर बाणों की झड़ी लगा दी। दोनों ओर के हाथीसवार, घुड़सवार, रथी और पैदल एक - दुसरे के बाणों से मारे गये। भीष्म की मृत्यु उनकी इच्छा के अधीन थी। उन्होने युद्ध का मार्ग दिखाकर वसु देवता के कहने पर वसुलोक में जाने की तैयारी की और बाणशय्या पर सो रहे। वे उत्तरायण की प्रतीक्षा में भगवान श्रीविष्णु का ध्यान और स्तवन करते हुए समय व्यतीत करने लगे। भीष्म के बाण- शय्या पर गिर जाने के बाद जब दुर्योधन शोक से व्याकुल हो उठा, तब आचार्य द्रोण ने सेनापतित्व का भार ग्रहण किया। उधर हर्ष मनाती हुई पाण्डवों की सेना में धृष्ट्द्द्युम्न सेनापति हुए। उन दोनों में बड़ा भयंकर युद्ध हुआ, जो यमलोक की आबादी बढाने वाला था। विराट और द्रुपद आदि राजा द्रोणरूपी समुद्र में डुब गये। हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सैनिकों से युक्त दुर्योधन की विशाल वाहिनी धृष्ट्द्द्युम्न के हाथ से मारी जाने लगी। उस समय द्रोण काल के समान जान पड़ते थे। इतने में ही उनके कानों में यह आवाज आयी की 'अश्वत्थामा मारा गया'। इतना सुनते ही आचार्य द्रोण ने अस्त्र - शस्त्र त्याग दिये। ऐसे समय में धृष्ट्द्द्युम्न के बाणों से आहत होकर वे पृथ्वी पर गिर पड़े।।८ - १४।।
द्रोण बड़े दुर्धर्ष थे। वे सम्पूर्ण क्षत्रियों का विनाश करके पॉंचवें दिन मारे गये। दुर्योधन पुन: शोक से आतुर हो उठा। उस समय कर्ण उसके सेना का कर्णधार हुआ। पाण्ड्व सेना का आधिपत्य अर्जुन को मिला। कर्ण और अर्जुन में भॉंति - भॉंति केअस्त्र - शस्त्रों की मार - काट से युक्त महाभयानक युद्ध हुआ, जो देवासुर संग्राम को भी मात करनेवाला था। कर्ण और अर्जुन के संग्राम में कर्ण ने अपने बाणों से शत्रु पक्ष के बहुत से वीरों का संहार कर डाला; किन्तु दुसरे दिन अर्जुन ने उसे मार गिराया।।१५ - १७।।
तदनन्तर राजा शल्य कौरव सेना के सेनापति हुए; किंतु वे युद्ध में आधे दिन तक ही टिक सके। दोपहर होते - होते राजा युद्धिष्ठिर ने उन्हें मार गिराया। दुर्योधन की प्राय: सारी सेना युद्ध में मारी गयी थी। अन्ततोगत्वा उसका भीमसेन के साथ युद्ध हुआ। उसने पाण्ड्व - पक्ष के पैदल आदि बहुत से सैनिकों का भीमसेन पर धावा किया। उस समय गदा से प्रहार करते हुए दुर्योधन को भीमसेन ने मौत के घाट उतार दिया। दुर्योधन के अन्य छोटे भाई भी भीमसेन के हाथ से ही मारे गये थे।
महाभारत संग्राम के उस अठारहवें दिन रात्री काल में महाबली अश्वत्मा ने पाण्ड्वों की सोयी हुई एक अक्षौहिणी सेना को सदा के लिए सुला दिया। उसने द्रौपदी के पॉंचों पुत्रों, उसके पाञ्चाल देशीय बन्धुओ तथा धृष्ट्द्द्युम्न को भी जीवित नहीं छोड़ा। द्रौपदी पुत्रहीन होकर रोने - बिलखने लगी। तब अर्जुन ने सींक के अस्त्र से अश्वत्मा को परास्त करके उसकी मणि निकाल ली। उसे मारा जाता देख द्रौपदी ने ही अनुनय - विनय करके उसके प्राण बचाये।।१८-२२।।
इतने पर भी दुष्ट अश्वत्मा ने उत्तरा के गर्भ को नष्ट करने के लिए उस पर अस्त्र का प्रयोग किया। वह गर्भ उसके प्रहार से प्राय: दग्ध हो गया था; किंतु भगवान श्रीकृष्ण ने उसको पुन: जीवन - दान दिया। उत्तरा का वही गर्भस्थ शिशु आगे चलकर राजा परीक्षित के नाम से विख्यात हुआ।
कृतवर्मा, कृपाचार्य तथा अश्वत्मा - ये तीन कौरव पक्षीय वीर उस संग्राम से जीवित बचे। दूसरी ओर पॉंच पाण्डव, सात्यकि तथा भगवान श्रीकृष्ण - ये सात ही जीवित रह सके; दुसरे कोई नहीं बचे।
उस समय सब ओर अनाथा स्त्रीयों का आर्तनाद वयाप्त हो रहा था। भीमसेन आदि भाईयों के साथ जाकर युद्धिष्ठिर ने उन्हें सात्वना दी तथा रणभूमि में मारे गये सभी वीरों का दाह - संस्कार करके उनके लिए जलाञ्जलि दे धन आदि का दान किया।
तत्पश्चात कुरुक्षेत्र में शरशय्यापर आसीन शान्तनुनन्दन भीष्म के पास जाकर युद्धिष्ठिर ने उनसे समस्त शान्तिदायक धर्म, राजधर्म, मोक्षधर्म तथा दानधर्म की बातें सुनीं। फिर वे राजसिंहासन पर आसीन हुए। इसके बाद उस शत्रुमर्दन राजा ने अश्वमेध - यज्ञ करके उसमें ब्राह्मणों को बहुत धन दान किया। तदनन्तर द्वारका से लौटे हुए अर्जुन के मुख से मूसलकाण्ड के कारण प्राप्त हुए शाप से पारस्परिक युद्ध द्वारा यादवों के संहार का समाचार सुनकर युद्धिष्ठिर ने परीक्षीत को राजासन पर बिठाया और स्वयं भाईयों के साथ महाप्रस्थान कर स्वर्गलोक को चले गये।।२३-२७।।
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