अग्निदेव कहते है - अब मैं श्रीकृष्ण की महिमा को लक्षित करने वाले महाभारत का उपाख्यान सुनाता हूँ , जिसमें श्रीहरि ने पाण्ड्वों को निमित्त बनाकर इस पृथ्वी का भार उतारा था। भगवान श्रीविष्णु के नाभिकमल से ब्रह्माजी उत्पन्न हुए। ब्रह्माजी से अत्रि, अत्रि से चन्द्र्मा, चन्द्र्मा से बुध और बुध से इलानन्दन पुरूरवा का जन्म हुआ। पुरुरवा से आयु, आयु से राजा नहुष और नहुष से ययाति उत्पन्न हुए। ययाति से पुरू हुए। पूरू के वंश में भरत और भरत के कुल में राजा कुरू हुए। कुरू के वंश में शान्तनु का जन्म हुआ। शान्तनु से गङ्गानन्दन भीष्म उत्पन्न हुए। उनके दो छोटे भाई और थे - चित्राङ्गद और विचित्रवीर्य। ये शान्तनु से सत्यवती के गर्भ से उत्पन्न हुए थे। शान्तनु के स्वर्ग चले जाने पर भीष्म ने अविवाहित रहकर अपने भाई विचित्रवीर्य के राज्य का पालन किया। चित्राङ्गद बाल्यावस्था में ही चित्राङ्गद नामक गन्धर्व के द्वारा गये। फिर भीष्म संग्राम में विपक्षी को परास्त करके काशिराज की दो कन्याओ - अम्बिका और अम्बालिका को हर लाये। वे दोनों विचित्रवीर्य की भार्याऍं हुईं।
कुछ समय के पश्चात राजा विचित्रवीर्य राजयक्ष्मा से ग्रस्त हो स्वर्गवासी हो गये। तब सत्यवती के अनुमति से व्यासजी के द्वारा अम्बिका के गर्भ से धृतराष्ट्र और अम्बालिका के गर्भ से पाण्डू उत्पन्न हुए। धृतराष्ट्र ने गान्धारी के गर्भ से सौ पुत्रों को जन्म दिया, जिनमें दुर्योधन सबसे बड़ा था।।१-८।।
राजा पाण्डू वन में रहते थे। वे एक ऋषि के शापवश शतश्रङ्ग मुनि के आश्रम के पास स्त्री समागम के कारण मृत्यु को प्राप्त हुए। इसलिए आज्ञा के अनुसार कुन्ती के गर्भ से धर्म के अंश से युधिष्ठिर का जन्म हुआ। वायु से भीम और इन्द्र से अर्जुन उत्पन्न हुए। पाण्डू की दुसरी पत्नी माद्री के गर्भ से अश्विनीकुमारों के अंश से नकुल - सहदेव का जन्म हुआ। शापवश एक दिन माद्री के साथ सम्भोग होने से पाण्डू की मृत्यू हो गयी और माद्री भी उनके साथ सती हो गयी।
जब कुन्ती का विवाह नही हुआ था, उसी समय सूर्य के अंश से कर्ण का जन्म हुआ था। वह दूर्योधन के आश्रय में रहता था। दैवयोग से कौरवों और पाण्डवों में वैर की आग प्रज्वलित हो उठी। दुर्योधन बहुत खोटी बुद्धि का मनुष्य था। उसने लाक्षा से बने हुए घर में पाण्ड्वों को रखकर आग लगाकर उन्हें जलाने का प्रयत्न किया; किंतु पॉंचो पाण्डव अपनी माता के साथ उस जलते हुए घर से बाहर निकल गये। वहॉं से एकचक्रा नगरी में जाकर वे मुनि के वेश में एक ब्राह्मण के घर में निवास करने लगे। फिर बक नामक राक्षस का वध करके वे पाञ्चाल राज्य में, जहॉं द्रौपदी का स्वयंवर होने वाला था, गये। वहॉं अर्जुन के बाहुबल से मत्स्यभेद होने पर, पाण्डवों ने द्रौपदी को पत्नी रूप में प्राप्त किया। तत्पश्चात दुर्योधन आदि को उनके जीवित होने का पता चलने पर उन्होंने कौरवों से अपना आधा राज्य भी प्राप्त कर लिया। अर्जून अग्निदेव से दिव्य गाण्डीव धनुष और उत्तम रथ प्राप्त किया था। उन्हें युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण जैसे सारथि मिले थे तथा उन्होंने आचार्य द्रोण से ब्रह्मास्त्र आदि दिव्य आयुध और कभी नष्ट न होने वाले बाण प्राप्त किये थे। सभी पाण्डव सब प्रकार की विद्याओं में प्रवीण थे।।९-१६।।
पाण्डुकुमार अर्जुन ने श्रीकृष्ण के साथ खाण्डव वन में इन्द्र के द्वारा की हुई वृष्टि का अपने बाणों की छ्त्राकार बान्ध से निवारण करते हुए अग्नि को तृप्त किया था। पाण्डवों ने सम्पूर्ण दिशाओ पर विजय पायी। युद्धिष्ठिर राज्य करने लगे। उन्होंने प्रचूर स्वर्णराशि से परिपूर्ण राजसूय यज्ञ का अनुष्ठान किया। उनका यह वैभव दुर्योधन के लिए असह्य हो गया। उसने अपने भाई दु:शासन वैभव प्राप्त सुह्रद कर्ण के कहने से शकुनि को साथ ले, द्द्यूत सभा में जूए में प्रवृत होकर, युद्धिष्ठिर और उनके राज्य को कपट - द्द्यूत के द्वारा हँसते - हँसते जीत लिया। जूए में परास्त होकर युद्धिष्ठिर अपने भाईयों के साथ वन में चले गये। वहॉं उन्होंने अपने प्रतिज्ञा के अनुसार बारह वर्ष व्यतीत किये। वे वन में पहले ही की भॉंति प्रतिदिन बहुसंख्यक ब्राह्मणों को भोजन कराते थे। एक दिन उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से अठासी - हजार द्विजों सहित दुर्वासा को परितृप्त किया। वहॉं उनके साथ उनकी पत्नी द्रौपदी तथा पूरोहित धौम्यजी भी थे।
बारहवॉं वर्ष बीतने पर वे विराट नगर में गये। वहॉं युधिष्ठिर सबसे अपरिचित रहकर "कङ्क" नामक ब्राह्मण के रूप में रहने लगे। भीमसेन रसोइया बने थे। अर्जुन ने अपना नाम "बृहन्नला" रखा था। पाण्डव पत्नी द्रौपदी रनिवास में "सैरन्ध्री" के रूप में रहने लगी। इसी प्रकार नकुल - सहदेव ने भी अपने नाम बदल लिये थे। भीमसेन ने रात्रीकाल में द्रौपदी का सतीत्व हरण करने वाले कीचक को मार डाला। तत्पश्चात कौरव विरात की गौओ को हरकर ले जाने लगे, तब उन्हें अर्जुन ने परास्त किया। उस समय कौरवों ने पाण्डवों को पहचान लिया। श्रीकृष्ण की बहन सुभद्रा ने अर्जुन से अभिमन्यु नामक पुत्र उत्पन्न किया था। उसे राजा विराट ने अपनी कन्या उत्तरा से विवाह किया।।१७-२५।।
धर्मराज युधिष्ठिर सात अक्षौहिणी सेना के स्वामी होकर कौरवों के साथ युद्ध करने को तैयार हुए। पहले भगवान श्रीकृष्ण परम क्रोधी दुर्योधन के पास दूत बनकर गये। उन्होंने ग्यारह अक्षौहिणी सेना के स्वामी राजा दुर्योधन से कहा - ' राजन! तुम युधिष्ठिर को आधा राज्य दे दो या उन्हें पॉंच ही गॉंव अर्पित कर दो; नहीं तो उनके साथ युद्ध करो।' श्रीकृष्ण की बात सुनकर दुर्योधन ने कहा - ' मैं उन्हें सूई की नोक के बराबर भूमि भी नहीं दूंँगा; हॉं, उनसे युद्ध अवश्य करूँगा।' ऐसा कहकर वह भगवान श्रीकृष्ण को बन्दी बनाने के लिए उद्द्त हो गया। उस समय राजसभा में भगवान श्रीकृष्ण ने अपने परम दुर्धर्ष विश्वरुप का दर्शन कराकर दुर्योधन को भयभीत कर दिया। फिर विदुर ने अपने घर ले जाकर भगवान का पूजन और सत्कार किया।
तदनन्तर वे युधिष्ठिर के पास लौट गये और बोले - "महाराज! आप दुर्योधन के साथ युद्ध किजिये"।।२६-२९।।
कुछ समय के पश्चात राजा विचित्रवीर्य राजयक्ष्मा से ग्रस्त हो स्वर्गवासी हो गये। तब सत्यवती के अनुमति से व्यासजी के द्वारा अम्बिका के गर्भ से धृतराष्ट्र और अम्बालिका के गर्भ से पाण्डू उत्पन्न हुए। धृतराष्ट्र ने गान्धारी के गर्भ से सौ पुत्रों को जन्म दिया, जिनमें दुर्योधन सबसे बड़ा था।।१-८।।
राजा पाण्डू वन में रहते थे। वे एक ऋषि के शापवश शतश्रङ्ग मुनि के आश्रम के पास स्त्री समागम के कारण मृत्यु को प्राप्त हुए। इसलिए आज्ञा के अनुसार कुन्ती के गर्भ से धर्म के अंश से युधिष्ठिर का जन्म हुआ। वायु से भीम और इन्द्र से अर्जुन उत्पन्न हुए। पाण्डू की दुसरी पत्नी माद्री के गर्भ से अश्विनीकुमारों के अंश से नकुल - सहदेव का जन्म हुआ। शापवश एक दिन माद्री के साथ सम्भोग होने से पाण्डू की मृत्यू हो गयी और माद्री भी उनके साथ सती हो गयी।
जब कुन्ती का विवाह नही हुआ था, उसी समय सूर्य के अंश से कर्ण का जन्म हुआ था। वह दूर्योधन के आश्रय में रहता था। दैवयोग से कौरवों और पाण्डवों में वैर की आग प्रज्वलित हो उठी। दुर्योधन बहुत खोटी बुद्धि का मनुष्य था। उसने लाक्षा से बने हुए घर में पाण्ड्वों को रखकर आग लगाकर उन्हें जलाने का प्रयत्न किया; किंतु पॉंचो पाण्डव अपनी माता के साथ उस जलते हुए घर से बाहर निकल गये। वहॉं से एकचक्रा नगरी में जाकर वे मुनि के वेश में एक ब्राह्मण के घर में निवास करने लगे। फिर बक नामक राक्षस का वध करके वे पाञ्चाल राज्य में, जहॉं द्रौपदी का स्वयंवर होने वाला था, गये। वहॉं अर्जुन के बाहुबल से मत्स्यभेद होने पर, पाण्डवों ने द्रौपदी को पत्नी रूप में प्राप्त किया। तत्पश्चात दुर्योधन आदि को उनके जीवित होने का पता चलने पर उन्होंने कौरवों से अपना आधा राज्य भी प्राप्त कर लिया। अर्जून अग्निदेव से दिव्य गाण्डीव धनुष और उत्तम रथ प्राप्त किया था। उन्हें युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण जैसे सारथि मिले थे तथा उन्होंने आचार्य द्रोण से ब्रह्मास्त्र आदि दिव्य आयुध और कभी नष्ट न होने वाले बाण प्राप्त किये थे। सभी पाण्डव सब प्रकार की विद्याओं में प्रवीण थे।।९-१६।।
पाण्डुकुमार अर्जुन ने श्रीकृष्ण के साथ खाण्डव वन में इन्द्र के द्वारा की हुई वृष्टि का अपने बाणों की छ्त्राकार बान्ध से निवारण करते हुए अग्नि को तृप्त किया था। पाण्डवों ने सम्पूर्ण दिशाओ पर विजय पायी। युद्धिष्ठिर राज्य करने लगे। उन्होंने प्रचूर स्वर्णराशि से परिपूर्ण राजसूय यज्ञ का अनुष्ठान किया। उनका यह वैभव दुर्योधन के लिए असह्य हो गया। उसने अपने भाई दु:शासन वैभव प्राप्त सुह्रद कर्ण के कहने से शकुनि को साथ ले, द्द्यूत सभा में जूए में प्रवृत होकर, युद्धिष्ठिर और उनके राज्य को कपट - द्द्यूत के द्वारा हँसते - हँसते जीत लिया। जूए में परास्त होकर युद्धिष्ठिर अपने भाईयों के साथ वन में चले गये। वहॉं उन्होंने अपने प्रतिज्ञा के अनुसार बारह वर्ष व्यतीत किये। वे वन में पहले ही की भॉंति प्रतिदिन बहुसंख्यक ब्राह्मणों को भोजन कराते थे। एक दिन उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से अठासी - हजार द्विजों सहित दुर्वासा को परितृप्त किया। वहॉं उनके साथ उनकी पत्नी द्रौपदी तथा पूरोहित धौम्यजी भी थे।
बारहवॉं वर्ष बीतने पर वे विराट नगर में गये। वहॉं युधिष्ठिर सबसे अपरिचित रहकर "कङ्क" नामक ब्राह्मण के रूप में रहने लगे। भीमसेन रसोइया बने थे। अर्जुन ने अपना नाम "बृहन्नला" रखा था। पाण्डव पत्नी द्रौपदी रनिवास में "सैरन्ध्री" के रूप में रहने लगी। इसी प्रकार नकुल - सहदेव ने भी अपने नाम बदल लिये थे। भीमसेन ने रात्रीकाल में द्रौपदी का सतीत्व हरण करने वाले कीचक को मार डाला। तत्पश्चात कौरव विरात की गौओ को हरकर ले जाने लगे, तब उन्हें अर्जुन ने परास्त किया। उस समय कौरवों ने पाण्डवों को पहचान लिया। श्रीकृष्ण की बहन सुभद्रा ने अर्जुन से अभिमन्यु नामक पुत्र उत्पन्न किया था। उसे राजा विराट ने अपनी कन्या उत्तरा से विवाह किया।।१७-२५।।
धर्मराज युधिष्ठिर सात अक्षौहिणी सेना के स्वामी होकर कौरवों के साथ युद्ध करने को तैयार हुए। पहले भगवान श्रीकृष्ण परम क्रोधी दुर्योधन के पास दूत बनकर गये। उन्होंने ग्यारह अक्षौहिणी सेना के स्वामी राजा दुर्योधन से कहा - ' राजन! तुम युधिष्ठिर को आधा राज्य दे दो या उन्हें पॉंच ही गॉंव अर्पित कर दो; नहीं तो उनके साथ युद्ध करो।' श्रीकृष्ण की बात सुनकर दुर्योधन ने कहा - ' मैं उन्हें सूई की नोक के बराबर भूमि भी नहीं दूंँगा; हॉं, उनसे युद्ध अवश्य करूँगा।' ऐसा कहकर वह भगवान श्रीकृष्ण को बन्दी बनाने के लिए उद्द्त हो गया। उस समय राजसभा में भगवान श्रीकृष्ण ने अपने परम दुर्धर्ष विश्वरुप का दर्शन कराकर दुर्योधन को भयभीत कर दिया। फिर विदुर ने अपने घर ले जाकर भगवान का पूजन और सत्कार किया।
तदनन्तर वे युधिष्ठिर के पास लौट गये और बोले - "महाराज! आप दुर्योधन के साथ युद्ध किजिये"।।२६-२९।।
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