गुरुवार, 26 मार्च 2020

रामायण - बालकाण्ड की संक्षिप्त कथा (अग्निपुराण - पाँचवाँ अध्याय)

अग्निदेव कहते हैं - वशिष्ठ! अब मैं ठीक उसी प्रकार रामायण का वर्णन करूंगा, जैसे पूर्वकाल में नारदजी ने महर्षि वाल्मीकीजी को सुनाया था।

देवर्षि नारद कहते हैं - वाल्मीकीजी! भगवान् विष्णु के नाभिकमल से ब्रह्माजी उत्पन्न हुए हैं।

ब्रह्माजी के पुत्र हैं मरीचि।
मरीचि के पुत्र हैं कश्यप।
कश्यप के पुत्र हैं सूर्य ।
सूर्य के पुत्र हैं वैवस्वतमनुl
वैवस्वतमनु के पुत्र हैं इक्ष्वाकू।
इक्ष्वाकू के पुत्र हैं ककूतस्थ।
ककूतस्थ के पुत्र हैं रघु है ।

रघु के पुत्र हैं अज और अज के पुत्र दशरथ से रावण आदि राक्षसों का वध करने के लिए साक्षात भगवान विष्णु चार रूपों में प्रकट हुए। उनकी बड़ी रानी कौशल्या के गर्भ से श्रीरामचन्द्रजी का प्रादुर्भाव हुआ। कैकेयी से भरत और सुमित्रा से लक्ष्मण एवं शत्रुघ्न का जन्म हुआ ऋष्यशृंग ने उन तीनों रानियों को यज्ञ सिद्ध चरु दिये थे, जिन्हें खाने से इन चारोंकुमारों का अभिभाव हुआ। श्री राम आदि सभी अपने पिता के समान ही पराक्रमी थे। एक समय मुनिवर विश्वमित्र ने अपने यज्ञ में विघ्न डालनेवाले निशचरों का नाश करने के लिए राजा दशरथ से प्रार्थन की -" आप अपने पुत्र श्रीराम को मेरे साथ भेज दें ।" तब राजा ने श्रीराम और लक्ष्मण को मुनि के साथ भेज दिया। श्रीरामचन्द्रजी ने जाकर मुनि से अस्त्र - शास्त्रों की शिक्षा पाई और ताड़का नाम वाली निशाचरी का वध किया । फिर उन बलवान विरों ने मारीच नामक राक्षस को मानवास्त्र से मोहित करके दूर फेंक दिया और यज्ञविघातक राक्षस सुबाहु को दल - बलसहित मार डाला । इसके बाद वे कुछ काल तक मुनि सिद्धाश्रम में हि रहे। । तत्पश्चात विश्ववामित्र आदि महर्षियों के साथ लक्ष्मण सहित श्रीराम मिथिला - नरेश का धनुष - यज्ञ देखने के लिए गए ॥२-९॥

शतानन्दजी ने निमित्त - कारण बनकर श्रीराम से विश्वामित्र मुनि के प्रभाव का वर्णन किया। राजा जनक ने अपने यज्ञ में मुनियोंसहित श्रीरामचन्द्रजी का पूजन किया। श्रीराम ने धनुष को चढ़ा दिया और उसे अनायास ही तोड़ डाला। तदनन्तर महाराज जनक ने अपनी अयोनिजा कन्या सीता को, जिसके विवाह के लिए पराक्रम ही शुल्क निश्चित किया गया था, श्रीरामचन्द्रजी को समर्पित किया । श्रीराम ने भी अपने पिता राजा दशरथ आदि गरुजनों को मिथिला में पधार ने पर सबके सामने सीता का विधिपूर्वक पाणिग्रहण किया। उस समय लक्ष्मण ने भी मिथिलेश कन्या उर्मिला को अपनी पत्नी बनाया। राजा जनक के छोटे भाई कुशध्वज थे। उनकी दो कन्याएँ थी - श्रुतकीर्ति और माण्डवी । इनमें माण्डवी के साथ भरत ने और श्रुतकीर्ति के साथ शत्रुघ्न ने विवाह किया। तदनन्तर राजा जनक से भलीभाँति पूजित हो श्रीरामचन्द्रजी ने वशिष्ठ आदि महर्षियों के साथ वहाँ से प्रस्थान किया। मार्ग में जमदगिन नन्दन परशुराम को जीतकर वे अयोध्या पहुंचे। वहाँ जाने पर भरत और शत्रुघ्न अपने मामा राजा युधाजित की राजधानी को चले गये ॥१० - १५॥

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