बुधवार, 25 मार्च 2020

समुद्र - मंथन, कूर्म तथा मोहिनी - अवतार की कथा (आग्निपुराण - तीसरा अध्याय)

अग्नि देव कहते हैं - पूर्वकाल की बात हैं, देवासुर - संग्राम में दैत्यों ने देवताओं को परास्त कर दिया । वे दुर्वासा के शाप से भी लक्ष्मी से रहित हो गए थे । तब सम्पूर्ण देवता क्षीरसागर में शयन करने वाले भगवान विष्णु के पास जाकर बोले -'' भगवन् ! आप देवनाओं की रक्षा कीजिए ।'' यह सुनकर श्रीहरिने ब्रह्मा आदि देवताओं से कहा -'' देवगण! तुमलोग क्षीरसमुद्र को मथने, अमृत प्राप्त करने और लक्ष्मी को पाने के लिए असुरों से सन्धि कर लेनी चाहिए । मैं तुमलोगों को अमृत का भागी बनाऊँगा और दैत्यों को उसे वञ्चित रखूँगा । मन्दराचल को मथानी और वासु की नाग को नेती बनाकर आलस्यरहित हो मेरी सहायता से क्षीरसागर का मन्थन करो ।'' भगवान् विष्णु एसा कह ने पर देवता दैत्यों के साथ संधि करके क्षीरसमुद्र पर आये । फिर तो उन्हें एक साथ मिलकर समुद्र - मंथन आरम्भ किया जिस ओर वासु कि नाग की पुंछ थी, उसी ओर देवता खड़े थे । दानव वासु कि नाग के निःश्वास से क्षीण हो रहे थे और देवताओं को भगवान् अपनी कृपा दृष्टि से परिपुष्ट कर रहे थे । समुद्र - मन्थनआरम्भ होने पर कोई आधार न मिलने से मन्दराचल पर्वत समुद्र में डुब गया ॥ १ -७॥
तब भगवान विष्णु ने कूर्म (कछुए) का रूप धारण करके मन्दराचल को अपनी पीठ पर रख लिया । फिर जब समुद्र मथा जाने लगा, तो उसके भीतर से हलाहल विष प्रकट हुआ । उसे भगवान शंकर ने अपने कण्ठ में धारण कर लिया । इससे कण्ठ में काला दाग पड़ जाने के कारण वे 'नीलकण्ठ' नाम से प्रसिद्ध हुए । तत्पश्चात समुद्र से वारुणी देवी, पारिजात वृक्ष, कौस्तुभमणि, गौएँ तथा दिव्य अप्सराएँ प्रकट हुईं। फिर लक्ष्मी देवी का प्रादुर्भाव हुआ । वे भगवान विष्णु को प्राप्त हुई। सम्पूर्ण देवताओं ने उनका दर्शन और स्तवन किया। इससे वे लक्ष्मीवान हो गये । तदनन्तर भगवान विष्णुके अंशभूत धन्वन्तरि, जो आयुर्वेद के प्रवर्तक हैं, हाथ में अमृत से भरा हुआ कलश लिए प्रकट हुए । दैत्यों ने उनके हाथ से अमृत छीन लिया और उसमें से आधा देवताओं देकर वे सब चलते बने। उनमें जम्भ आदि दैत्य प्रधान थे। उन्हें जाते देख भगवान् विष्णु ने स्त्री का रूप धारण किया। उस रुपवती स्त्री को देखकर दैत्य मोहित हो गये और बोले -' सुमुखि! तुम हमारी भार्या हो जाओ और यह अमृत लेकर हमें पिलाओ ।' ' बहुत अच्छा' कहकर भगवान् ने उनके हाथ से अमृत ले लिया और उसे देवताओं को पिला दिया । उस समय राहु चन्द्रमा का रूप धारण करके अमृत पीने लगा । तब सूर्य और चन्द्रमा उसके कपट वेष को प्रकट कर दिया ॥ ८ - १४ ॥
यह देख भगवान श्रीहरि ने चक्र से उसका मस्तक काट डाला । उसका सिर अलग हो गया और भुजाओंसहित धर अलग रह गया । फिर भगवान् को दया आई उन्होंने राहु को अमर कर दिया । तब ग्रहस्वरूप राहु भगवान् श्रीहरि से कहा -' इन सूर्य और चन्द्रमा को मेरे द्वारा अनेको बार ग्रहण लगेगा । उस समय समय संसार के लोग जो कुछ दान करें, वह सब अक्षय हो । भगवान् विष्णु ने 'तथास्तु' कहकर सम्पूर्ण देवताओं के साथ राहु की बात का अनुमोदन किया । इसके बाद भगवान् ने स्त्री रूप त्याग दिया; किंतु महादेवजी को भगवान् के उस रूप का पुनदर्शन करने की इच्छा हुई। अतः उन्होंने अनुरोध किया -' भगवन् आप अपने स्त्रीरूप का दर्शन करावें । महादेवजी की प्रार्थना से भगवान श्रीहरि ने उन्हें अपने स्त्रीरूप का दर्शन कराया । वे भगवान् की माया से एसे मोहित हो गए की पार्वतीजी को त्यागकर उस स्त्री के पीछे लग गए। उन्होंनें नग्न और उन्मत्त होकर मोहिनी के केश पकड़ लिए । मोहिनी अपने केशों को छुड़ा कर चल दी। उसे जाती देख महादेवजी भी उसके पीछे - पीछे दौड़ने लगे। उस समय पृथ्वी पर जहाँ - जहाँ भगवान् शंकर का वीर्य गिरा, वहाँ - वहाँ शिवलिंगों का क्षेत्र एवं सुवर्ण की खानें हो गई। तत्पश्चात ' यह माया है' - ऐसा जानकर भगवान् शंकर अपने स्वरूप में स्थित हुए। तब भगवान् श्रीहरि ने प्रकट होकर शिवजी से कहा - ' रूद्र तुमने मेरी माया को जीत लिया । पृथ्वी पर तुम्हारे शिवा दूसरा कोई ऐसा पुरुष नहीं है, जो मेरी इस माया को जीत सके ।'
भगवान् के प्रयत्न से दैत्यों को अमृत नहीं मिलने पाया; अतः देवताओं ने उन्हें युद्ध में मार गिराया। फिर देवता स्वर्ग में विराजमान हुए और दैत्य लोग पाताल में रहने लगे ॥१५-२३॥ 

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