मंगलवार, 31 मार्च 2020

रामायण - किष्किन्धा काण्ड (अग्निपुराण - आठवाँ अध्याय)

नारदजी कहते हैं - श्रीरामचन्द्रजी पम्पा सरोवर पर जाकर सीता के लिये शोक करने लगे। वहाँ वे शबरी से मिले। फिर हनुमानजी से उनकी भेट हुई। हनुमानजी उन्हें सुग्रीव के पास ले गये और सुग्रीव के साथ उनकी मित्रता करायी। श्रीरामचन्द्रजी सबके देखते - देखते ताड़ के सात वृक्षों को एक ही बाण से बीन्ध डाला और दुन्दुभि नामक दानव के विशाल शरीर को पैर की ठोकर से दस योजन दूर फेंक दिया। इसके बाद सुग्रीव के शत्रु वाली को, जो भाई होते हुये भी उसके साथ वैर रखता था, मार डाला और किष्किन्धापुरी, वानरो का साम्राज्य, रुमा और तारा इन सबको ऋष्यमूक पर्वत पर वानरराज सुग्रीव के अधीन कर दिया। तदनन्तर किष्किन्धापुरी के स्वामी सुग्रीव ने कहा - ' श्रीराम! आपको सीताजी की प्राप्ति जिस प्रकार भी हो सके, ऐसा उपाय मैं कर रहा हूँ।' यह सुनने के बाद श्रीरामचन्द्रजी ने माल्यवान पर्वत के शिखर पर वर्षा के चार महीने व्यतीत किये और सुग्रीव किष्किन्धा में रहने लगे। चौमासे के बाद भी जब सुग्रीव दिखाई नही दिये, तब श्रीरामचन्द्रजी की आज्ञा से लक्ष्मण ने किष्किन्धा में जाकर कहा - 'सुग्रीव! तुम श्रीरामचन्द्रजी के पास चलो। अपनी प्रतिज्ञा पर अटल रहो, नही तो वाली मरकर जिस मार्ग से गया है, वह मार्ग अभी बन्द नही हुआ है। अतएव वाली के पथ का अनुसरण न करो।' सुग्रीव ने कहा - 'सुमित्रानन्दन! विषय भोग में आसक्त हो जाने के कारण मुझे बीते हुए समय का भान न रहा। अतः मेरे अपराध को क्षमा किजीए'।।१-७॥

ऐसा कहकर वानरराज सुग्रीव श्रीरामचन्द्रजी के पास गये और उन्हें नमस्कार करके बोले - 'भगवन! मैंने सब वानरों को बुला लिया है। अब आपकी इच्छा के अनुसार सीताजी की खोज करने के लिए उन्हें भेजुँगा। वे पूर्वादि दिशाओं में जाकर एक महिने तक सीताजी की खोज करें। जो एक महिने के बाद लौटेगा मैं उसे मार डालूँगा। यह सुनकर बहुत - से वानर पूर्व, पश्चिम और उत्तर दिशाओं के मार्ग पर चल पड़े तथा वहाँ जनककुमारी को न पाकर नियत समय के भीतर श्रीराम और सुग्रीव के पास लौट आए। हनुमानजी श्रीरामचन्द्रजी की दी हुई अँगूठी लेकर अन्य वानरों के साथ दक्षिण दिशा में जानकीजी की खोज कर रहे थे। वे लोग सुप्रभा की गुफा के निकट विन्ध्यपर्वत पर ही एक माससे अधिक काल तक ढुँढते फिरे; किंतु उन्हें सीताजी का दर्शन हुआ। अन्त में निराश होकर आपस में कहने लगे - "हमलोगों को व्यर्थ ही प्राण देने पड़ेंगे, धन्य है वह जटायु, जिसने सीता के लिए रावण के द्वारा मारा जाकर युद्ध में प्राण त्याग दिया था"॥८ - १३॥

उनकी यह बातें संपाति नामक गिद्ध के कानों में पड़ी। वह वानरों के प्राण त्यागने की चर्चा से उनको खाने की ताक में लगा था। किंतु जटायु की चर्चा सुनकर रुक गया और बोला - 'वानरों! जटायु मेरा भाई था। वह मेरे ही साथ सुर्य मण्डल की ओर उड़ा चला जा रहा था। मैंने अपनी पंखों की ओट में रखकर सूर्य की प्रखर किरणों के ताप से बचाया। अतः वह तो सकुशल बच गया; किंतु मेरे पंखें जल गयीं, इसलिए मैं यहीं गिर पड़ा। आज श्रीरामचन्द्रजी की वार्ता सुनने से फिर मेरे पंख निकल आये। अब मैं जानकीजी को देखता हूँ; वे लंका में अशोक वाटिका के भीतर हैं। लवण समुद्र के द्वीप में त्रिकूट पर्वत पर लंका बसी हुई है। यहाँ से वहाँ तक का समुद्र सौ योजन विस्तृत है। यह जानकर सब वानर श्रीराम और सुग्रीव के पास जायें और उन्हें सब समाचार बता दें॥१४-१७ ॥

रामायण - अरण्यकाण्ड की संक्षिप्त कथा ( अग्निपुराण - सातवाँ अध्याय )

नारदजी कहते हैं - मुने! श्रीरामचन्द्रजी ने महर्षि वशिष्ठ तथा माताओं को प्रणाम करके उन सबको भरत के साथ विदा कर दिया। तत्पश्चात महर्षि अत्री तथा उनकी पत्नी अनसूया को, शरभंग मुनि को, सुतीक्षण को तथा अगस्त्यजी के भ्राता अग्निजिह्व मुनि को प्रणाम करते हुए श्रीरामचन्द्रजी ने अगस्त्य मुनि के आश्रम पर जा उनके चरणों में मस्तक झुकाया और मुनि की कृपा से दिव्य धनुष एवं दिव्य खड्ग प्राप्त करके वे दण्डकारण्य में आये। वहाँ जनस्थान के भीतर पञ्चवटी नामक स्थान में गोदावरी के तट पर रहने लगे।

एक दिन शूर्पणखा नामवाली भयंकर राक्षसी राम, लक्ष्मण सीता को खा जाने के लिए पंचवटी में आयी; किंतु श्रीरामचन्द्रजी का अत्यन्त मनोहर रूप देखकर वह काम के अधीन हो गयी और बोली॥१-४॥

शूर्पणखा ने कहा - तुम कौन हो? कहाँ से आये हो? मेरी प्रार्थना से अब तुम मेरे पति हो जाओ। यदि मेरे साथ तुम्हारा सम्बन्ध होने में ये दोनों बाधक हैं तो, मैं इन दोनों को अभी खाये लेती हूँ॥५॥

ऐसा कहकर वो उन्हें खा जाने को तैयार हो गई। तब श्रीरामचन्द्रजी के कहने पर लक्ष्मण ने शूर्पणखा की नाक और दोनों कान भी काट लिये। कटे हुये अंगों से रक्त की धार बहाती हुई शूर्पणखा अपने भाई खर के पास गयी और इस प्रकार बोली - "खर! मेरी नाक कट गई। इस अपमान के बाद मैं जीवित नहीं रह सकती। अब तो मेरा जीवन तभी रह सकता है, जब तुम मुझे राम का, उनकी पत्नी सीता का तथा उनके भाई लक्ष्मण का गरम - गरम रक्त पिलाओ। खर ने उसे 'बहुत अच्छा' कहकर शान्त किया और दूषण तथा त्रिशिरा के साथ चौदह हजार राक्षसों की सेना लेकर श्रीरामचन्द्रजी पर चढ़ाई की। श्रीराम ने भी उनका सामना किया और राक्षसों को बींधना आरम्भ किया। शत्रुओं के हाथी, घोड़े, रथ और पैदल सहित समस्त चतुरङ्गिनी सेना को उन्होंने यमलोक पहुँचा दिया तथा अपने साथ युद्ध करने वाले खर, दूषण और त्रिशिरा को भी मौत के घाट उतार दिया। अब शूर्पणखा लंका में पहुँची और रावण के सामने जा पृथ्वी पर गिर पड़ी । उसने क्रोध से भरकर रावण से कहा -" अरे ! तु राजा और राक्षस कहलाने के योग्य नहीं  है। खर आदि समस्त राक्षसों का संहार करने वाले राम की पत्नी सीता को हर ले। मैं राम और लक्ष्मण का रक्त पीकर ही जिवीत रहुँगी, अन्यथा नहीं ॥६ - १२ ॥

शूर्पणखा की बात सुनकर रावण ने कहा -  "अच्छा, ऐसा ही होगा।"  फिर उसने मारीच से कहा - " तुम स्वर्णमय विचित्र मृग का रूप धारण करके सीता के पास जाओ और राम तथा लक्ष्मण को अपने पीछे आश्रम से दूर हटा ले जाओ। मैं सीता का हरण करूँगा। यदि मेरी बात न मानोगे, तो तुम्हारी मृत्यु निश्चित है।" मारीच ने रावण से कहा - " रावण! धनुर्धर राम सक्षात मृत्यु हैं।" फिर उसने मन ही मन सोचा - 'यदि नहीं जाऊँगा तो रावण के हाथ से मरना होगा और जाऊँगा तो श्रीराम के हाथ से। इस प्रकार अगर मरना अनिवार्य है, तो इसके लिए श्रीराम ही श्रेष्ठ हैं, रावण नहीं; क्योंकि श्रीराम के हाथ से मरने पर मेरी मुक्ति हो जायेगी। ऐसा विचारकर वह मृगरूप धारण करके वह सीता के सामने बारंबार आने जाने लगा। तब सीताजी की प्रेरणा से श्रीराम दूर तक उसका पीछा करके उसे बाण से मार डाला। मरते समय उस मृग ने 'हा सीते! हा लक्ष्मण!' कहकर पुकार लगायी। उस समय सिता के कहने पर लक्ष्मण अपनी इच्छा के विरुद्ध  श्रीरामचन्द्रजी के पास गये। इसी बीच में रावण ने भी मौका पाकर सिता को हर लिया। मार्ग में जाते समय उसने गिद्धराज जटायु का वध करके सीता को लङ्का ले जाकर अशोक वाटिका में रखा। वहाँ सीता से बोला - 'तुम मेरी पटरानी बन जाओ।' फिर राक्षसियों के तरफ देखकर बोला - 'निशाचरियों! इसकी रखवाली करो' ॥१३-१९॥

उधर श्रीरामचन्द्रजी जब मारीच को मारकर लौटे, तो लक्ष्मण को आते देखकर बोले - 'सुमित्रानंदन! वह मृग तो मायामय था, वास्तव में वह एक राक्षस था;किंतु तुम जो इस समय यहाँ आ गये, इससे जान पड़ता है, निश्च्य ही कोई सिता को हर ले गया।' श्रीरामचन्द्रजी आश्रम पर गये; किन्तु वहाँ सीता नही दिखाई दी। उस समय वे आर्त होकर शोक और विलाप करने लगे - 'हा प्रिये जानकी! तु मुझे छोड़कर कहा चली गयी?'  लक्ष्मण ने श्रीराम को सन्त्वना दी। तब वे वन मे घुम - घुमकर सीता की खोज करने लगे। इसी समय उनकी जटायु से भेट हुई। जटयु ने यह कहकर कि 'सीता को रावण हर ले गया है' प्राण त्याग दिये। तब श्रीरघुनाथजी ने अपने हाथ से जटायु का दाह - सन्स्कार किया। इसके बाद उन्होने कबन्ध का वध किया। कबन्ध ने शाप मुक्त होने पर श्रीरामचन्द्रजी से कहा - आप सुग्रीव से मिलिय़े।।२०-२४।।

रविवार, 29 मार्च 2020

रामायण - अयोध्याकाण्ड की संक्षिप्त कथा (अग्निपूराण - छठा अध्याय)

नारदजी कहते हैं - भरत के ननिहाल चले जाने पर श्रीरामचन्द्रजी ही पिता- माता आदि के सेवा - सत्कार में रहने लगे । एक दिन राजा दशरथ ने  श्रीरामचन्द्रजी से कहा - ' रघुनन्दन! मेरी बात सुनो । तुम्हारे गुणों पर अनुरक्त हो प्रजाजनों ने मन - ही - मन तुम्हें राजसिंहासन अभिषिक्त कर दिया है - प्रजा की यह हार्दिक इच्छा है कि तुम युवराज बनो; अतः कल प्रातःकाल मैं तुम्हें युवराज पद प्रदान कर दूंगा | आज रात में तुम सीता सहित उत्तम व्रत का पालन करते हुए संयमपूर्वक रहो।'

राजा के आठ मन्त्रियों तथा वशिष्ठजी ने भी उनके इस बात का अनुमोदन किया। उन आठ मन्त्रियों के नाम इस प्रकार हैं - दृष्टि, जयन्त, विजय, सिद्धार्थ, राज्यवर्धन, अशोक धर्मपाल तथा सुमंत्र। इनके अतिरिक्त वशिष्ठजी भी मन्त्रणा देते थे।

पिता और मन्त्रियों की बातें सुनकर श्री रघुनाथजी ने 'तथास्तु' कहकर उनकी आज्ञा शिरोधार्य की और माता कौशल्या को यह शुभ समाचार बताकर देवताओं की पूजा करके वे संयम में स्थित हो गये। उधर महाराज दशरथ वशिष्ठ आदि मन्त्रियों को यह कहकर कि 'आपलोग श्रीरामचन्द्र के  राज्यामिषेक की सामग्री जुटायें', कैकेयी के भवन में चले गये।

कैकेयी के मन्थरा नामक एक दासी थी, जो बड़ी दुष्टा थी। उसने आयोध्या की सजावट होती देख श्रीरामचन्द्रजी के राज्याभिषेक की बात जानकर रानी कैकेयी से सारा हाल सुनाया ॥ १ - ८ ॥

मंथरा बोली -" तुम उठो! राम का राज्याभिषेक हो ने जा रहा है यह तुम्हारे पुत्र के लिए, मेरे लिए और तुम्हारे लिए भी मृत्यु के समान भयंकर वृत्तान्त है - इसमें कोई संदेह नहीं॥९॥

मंथरा कुबड़ी थी। उसकी बात सुनकर रानी कैकेयी को प्रसन्नता हुई। उन्होंने कुब्जा को एक आभूषण उतारकर दिया और कहा - मेरे लिए तो जैसे राम हैं, वैसे ही मेरे पुत्र भरत हैं। मुझे ऐसा कोई उपाय नहीं दिखायी देता, जिससे भरत को राज्य मिल सके।' मंथरा ने उस हार को फेंक दिया और कुपित होकर कैकेयी से कहा॥१०-११॥

मंथरा बोली - ओ नादान! तू अपने को, भरत को और मुझे भी राम से बचा। कल राम राजा होंगे। फिर राम के पूत्रों को राज्य मिलेगा। कैकेयी! अब राजवंश भरत से दूर हो जाएगा।

मैं भरत को राज्य दिलाने का एक उपाय बताती हूँ। पहले की बात है। देवासुर - संग्राम में शाम्बरा सुर ने देवताओं को मार भगाया था। तेरे स्वामी भी उस युद्ध में गये थे। उस समय तूने अपनी विद्या से रात में स्वामी की रक्षा की थी। इसके लिए महाराज ने तुझे दो वर देने की प्रतिज्ञा की थी। इस समय उन्हीं दो वरों को उनसे मांग। एक वर के द्वारा राम का चौदह वर्षो के लिए वनवास और दूसरे के द्वारा भरत का युवराज पद पर अभिषेक माँग ले। राजा इस समय वे दोनों वर दे देंगें॥१२-१५॥

इस प्रकार मंथरा के प्रोत्साहन देने पर कैकेयी अनर्थ में ही अर्थ की सिद्धि देखने लगी और बोली - 'कुब्जे! तूने बड़ा अचछा उपाय बताया है। राजा मेरा मनोरथ अवश्य पूर्ण करेंगें।' ऐसा कहकर वह कोपभवन में चली गयी और पृथ्वी पर अचेत - सी होकर पड़ रही। उधर महाराज दशरथ ब्राह्मण आदि का पूजन करके जब कैकेयी के भवन में आये तो उसे रोष में भरी हुई देखा। तब राजा ने पूछा - ' सुन्दरी! तुम्हारी ऐसी दशा क्यों हो रही है? तुम्हें कोई रोग तो नहीं सता रहा है? अथवा किसी भय से व्याकुल तो नहीं हो? बताओ, क्या चाहती हो? मैं अभी तुम्हारी इच्छा पूर्ण करता हूं। जिन श्रीराम के बिना मैं क्षणभर भी जीवित नहीं रह सकता, उन्हीं की शपथ खाकर कहता हूँ, तुम्हारा मनोरथ अवश्य पूर्ण करूँगा। सच - सच बताओ, क्या चाहती हो?" कैकेयी बोली - राजन! यदि आप मुझे कुछ देना चाहते हों, तो अपने सत्य की रक्षा के लिए पहले के दिये हुए दो वरदान देने की कृपा करें। मैं चाहती हूं, राम चौदह वर्षों तक संयम पूर्वक वन में निवास करें और इन सामग्रियों के द्वारा आज ही भरत युवराज पद पर अभिषेक हो जाय। महाराज! ये दोनों वरदान आप मुझे नहीं तो मैं विष पीकर मर जाऊँगी।" यह सुनकर राजा दशरथ वज्र से आहत हुए की भाँति मूर्छित होकर गिर पड़े। फिर थोड़ी देर में चेत होने पर उन्हेंने कैकेयी से कहा॥१६-२३॥

दशरथ बोल - "पापपूर्ण विचार रखनेवाली तू समस्त संसार का अप्रिय करनेवाली है। अरि! मैंने या राम ने तेरा क्या बिगाड़ा है, जो तू मुझसे एसी बात कर रही है। केवल तुझे प्रिय लगने वाला यह कार्य करके मैं संसार में भलीभाँति निन्दित हो जाऊँगा तु मेरी स्त्री नहीं कालरात्रि है । मेरा पुत्र भरत ऐसा नहीं है। पाणिनी! मेरे पुत्र के चले जाने पर जब मैं मर जाऊँगा तो तू विधवा होकर राज्य करना ॥ २४ - २५ ॥

राजा दशरथ सत्य के बन्धन में बंधे थे। उन्होंने श्रीराम को बुलाकर कहा - " बेटा! कैकेयी ने मुझे ठग लिया। तुम मुझे कैद करके राज्य को अपने अधिन कर लो। अन्यथा तुम्हें वन में निवास करना होगा और कैकेयी का पुत्र भरत राजा बनेगा।" श्रीरामचन्द्रजी ने पिता और कैकेयी को प्रणाम करके उनकी प्रदक्षिणा की और कौसल्या के चरणों में मस्तक झुकाकर उन्हें सांत्वना दी। फिर लक्ष्मण और पत्नी सीता को साथ ले ब्राह्मणों, दीनों और अनाथों को दान देकर सुमन्त्र सहित रथ पर बैठ कर नगर से बाहर निकल गए। उस समय माता - पिता आदि शोक से आतुर हो रहे थे। उस रात में श्रीरामचन्द्रजी ने तमसा नदि के तट पर निवास किया। उनके साथ बहुत - से पुरवासी भी गए थे। उन सबको सोता छोड़कर वे आगे बढ़ गए। प्रातःकाल होने पर जब श्रीरामचन्द्रजी नहीं दिखाई दिये तो नगरवासी निराश होकर पुनः आयोध्या लौट आए। श्रीराम के चले जाने से राजा दशरथ बहुत दुःखी हुए। वे रोते-रोते कैकेयी का महल छोड़कर कौशल्या के भवन में चले आये। उस समय नगर के समस्त स्त्री - पुरुष और रनिवास की स्त्रीयाँ फूट - फूटकर रो रही थीं। श्रीरामचन्द्रजी ने चीरवस्त्र धारण कर रखा था। वे रथ पर बैठे - बैठे श्रृंगवेरपुर जा पहुँचे। वहाँ निषादराज गुह ने उनका पूजन, स्वागत - सत्कार किया। श्रीरघुनाथजी ने इंगूदी - वृक्ष की जड़ के निकट विश्राम किया। लक्ष्मण और गुह रात भर जागकर पहरा देते रहे॥२६-३३॥

प्रातः समय श्रीराम ने रथ सहित सुमन्त्र को विदा कर दिया तथा स्वयं लक्ष्मण और सीता के साथ नाव से गंगा पार हो वे प्रयाग में गये। वहाँ उन्होंने महर्षि भारद्वाज को प्रणाम किया और उनकी आज्ञा ले वहाँ से चित्रकूट पर्वत को प्रस्थान किये। चित्रकूट पहुंचकर वास्तु पूजा करने के अनन्तर पर्णकूटी बनाकर मन्दाकिनी के तट पर निवास किया।

श्रीराम के वन जाने के पश्चात छठे दिन के रात में राजा दशरथ ने कौशल्या को पहले की एक घटना सुनायी, जिसमें उनके द्वारा सरयू के तट पर अनजाने में यज्ञदत पुत्र श्रवण कुमार के मारे जाने एवम् उनके द्वारा दी गयी शाप का वृत्तान्त था।

इतनी कथा कहने के पश्चात राजा ने 'हा राम!' कहकर स्वर्गलोक प्रयाण किया। कौशल्या ने समझा, महाराज शोक से आतुर हैं; इस समय निंद आ गई होगी। ऐसा विचार करके वे सो गयी। प्रातःकाल सभी सोते हुए महाराज को जगाने लगे; किन्तु वे न जगे॥३४-४२॥

तब उन्हें मरा हुआ जान समस्त नर-नारी फूट-फूटकर रोने लगे। तत्पश्चात महर्षि वशिष्ठ ने राजा के शव को तेल भरी नौका में रखवाकर भरत को ननिहाल से तत्काल बुलवाया। भरत और शत्रुघ्न, सुमन्त्र के साथ शीघ्र ही अयोध्यापूरी आए। यहाँ का समाचार जानकर भरत को बडा दुःख हुआ। कैकेयी को शोक करती देख उसकी कठोर शब्दों में निन्दा करते हुए बोले - "तुने मेरे माथे कलंक का टीका दिया। मेरे सिर पर अपयश का भारी बोझ लाद दिया।" फिर उन्होंनें कौशल्या की प्रशंसा करके तेलपूर्ण नौका में रखे हुए पिता के शव का सरयू तर पर अन्त्येष्टि - संस्कार किया। तदन्तर वसिष्ठ आदि गुरुओं ने कहा - "भरत अब राज्य ग्रहण करो।" भरत  बोले - मैं तो श्रीरामजी को ही राजा मानता हूँ। अब उन्हें यहाँ लाने के लिए वन में जाता हूँ। ऐसा कहकर वे वहाँ से दल - बल सहित चल दिये और श्रङ्गवेरपुर होते हुए प्रयाग पहुँचे। वहाँ महर्षि भरद्वाज ने उन्हें भोजन कराया । फिर भरद्वाज को नमस्कार करके वे सब प्रयाग से निकले और चित्रकूट में श्रीराम और लक्ष्मण के समीप आ पहुंचे। वहाँ भरत ने श्रीराम से कहा - " रघुनाथजी! हमारे पिता महाराजा दशरथ स्वर्गवासी हो गए। अब आप आयोध्या चलकर राज्य ग्रहण करें। मैं आपकी आज्ञा का पालन करते हुए वन में जाऊंगा।" यह सुनकर श्रीराम ने पिता का तर्पण किया और भरत से कहा - " तुम मेरी चरण पादुका लेकर आयोध्या लौट जाओ। मैं राज्य करने के लिए नहीं चलूँगा। पिता के सत्य की रक्षा के लिए चीर एवम् जटा धारण करके वन में ही रहूँगा।" श्रीराम के ऐसा कहने पर भरत सदल-बल लैट गये और अयोध्या छोड़कर नन्दिग्राम में रहने लगे। वहाँ चरण- पादुकाओं की पूजा करते हुए वे राज्य का भली-भाँति पालन करने लगे॥४३-५१॥

गुरुवार, 26 मार्च 2020

रामायण - बालकाण्ड की संक्षिप्त कथा (अग्निपुराण - पाँचवाँ अध्याय)

अग्निदेव कहते हैं - वशिष्ठ! अब मैं ठीक उसी प्रकार रामायण का वर्णन करूंगा, जैसे पूर्वकाल में नारदजी ने महर्षि वाल्मीकीजी को सुनाया था।

देवर्षि नारद कहते हैं - वाल्मीकीजी! भगवान् विष्णु के नाभिकमल से ब्रह्माजी उत्पन्न हुए हैं।

ब्रह्माजी के पुत्र हैं मरीचि।
मरीचि के पुत्र हैं कश्यप।
कश्यप के पुत्र हैं सूर्य ।
सूर्य के पुत्र हैं वैवस्वतमनुl
वैवस्वतमनु के पुत्र हैं इक्ष्वाकू।
इक्ष्वाकू के पुत्र हैं ककूतस्थ।
ककूतस्थ के पुत्र हैं रघु है ।

रघु के पुत्र हैं अज और अज के पुत्र दशरथ से रावण आदि राक्षसों का वध करने के लिए साक्षात भगवान विष्णु चार रूपों में प्रकट हुए। उनकी बड़ी रानी कौशल्या के गर्भ से श्रीरामचन्द्रजी का प्रादुर्भाव हुआ। कैकेयी से भरत और सुमित्रा से लक्ष्मण एवं शत्रुघ्न का जन्म हुआ ऋष्यशृंग ने उन तीनों रानियों को यज्ञ सिद्ध चरु दिये थे, जिन्हें खाने से इन चारोंकुमारों का अभिभाव हुआ। श्री राम आदि सभी अपने पिता के समान ही पराक्रमी थे। एक समय मुनिवर विश्वमित्र ने अपने यज्ञ में विघ्न डालनेवाले निशचरों का नाश करने के लिए राजा दशरथ से प्रार्थन की -" आप अपने पुत्र श्रीराम को मेरे साथ भेज दें ।" तब राजा ने श्रीराम और लक्ष्मण को मुनि के साथ भेज दिया। श्रीरामचन्द्रजी ने जाकर मुनि से अस्त्र - शास्त्रों की शिक्षा पाई और ताड़का नाम वाली निशाचरी का वध किया । फिर उन बलवान विरों ने मारीच नामक राक्षस को मानवास्त्र से मोहित करके दूर फेंक दिया और यज्ञविघातक राक्षस सुबाहु को दल - बलसहित मार डाला । इसके बाद वे कुछ काल तक मुनि सिद्धाश्रम में हि रहे। । तत्पश्चात विश्ववामित्र आदि महर्षियों के साथ लक्ष्मण सहित श्रीराम मिथिला - नरेश का धनुष - यज्ञ देखने के लिए गए ॥२-९॥

शतानन्दजी ने निमित्त - कारण बनकर श्रीराम से विश्वामित्र मुनि के प्रभाव का वर्णन किया। राजा जनक ने अपने यज्ञ में मुनियोंसहित श्रीरामचन्द्रजी का पूजन किया। श्रीराम ने धनुष को चढ़ा दिया और उसे अनायास ही तोड़ डाला। तदनन्तर महाराज जनक ने अपनी अयोनिजा कन्या सीता को, जिसके विवाह के लिए पराक्रम ही शुल्क निश्चित किया गया था, श्रीरामचन्द्रजी को समर्पित किया । श्रीराम ने भी अपने पिता राजा दशरथ आदि गरुजनों को मिथिला में पधार ने पर सबके सामने सीता का विधिपूर्वक पाणिग्रहण किया। उस समय लक्ष्मण ने भी मिथिलेश कन्या उर्मिला को अपनी पत्नी बनाया। राजा जनक के छोटे भाई कुशध्वज थे। उनकी दो कन्याएँ थी - श्रुतकीर्ति और माण्डवी । इनमें माण्डवी के साथ भरत ने और श्रुतकीर्ति के साथ शत्रुघ्न ने विवाह किया। तदनन्तर राजा जनक से भलीभाँति पूजित हो श्रीरामचन्द्रजी ने वशिष्ठ आदि महर्षियों के साथ वहाँ से प्रस्थान किया। मार्ग में जमदगिन नन्दन परशुराम को जीतकर वे अयोध्या पहुंचे। वहाँ जाने पर भरत और शत्रुघ्न अपने मामा राजा युधाजित की राजधानी को चले गये ॥१० - १५॥

परशुराम अवतार के कथा ( अग्निपुराण - चौथा अध्याय)

देवता और ब्रह्मण आदि का पालन करने वाले श्रीहरि ने जब देखा कि भूमण्डल के क्षत्रिय उद्धत स्वभाव के हो गये हैं, तो वे उन्हें मारकर पृथ्वी का भार उतारने और सर्वत्र शान्ति स्थापित करने के लिए जमदग्नि के अंशद्वारा रेणुका के गर्भ से अवतीर्ण हुए ।

भृगुनन्दन परशुराम शस्त्र विद्या के परांगत विद्वान थे । उन दिनों कृतवीर्य का पुत्र राजा अर्जुन भगवान् दत्तात्रेयजी की कृपा से हजार बाँहें पाकर समस्त भूमण्डल पर राज करता था । एक दिन वह वन में शिकार खेलने के लिए गया ॥ ८-१४॥

वहाँ वह बहुत थक गया । उस समय जमदग्नि मुनि ने उसे सेना सहित अपने आश्रम पर निमन्त्रित किया और कामधेनु के प्रभाव से सबको भोजन कराया। राजा ने मुनि से कामधेनु को अपने लिए माँगा; किन्तु उन्होने देने से इन्कार कर दिया। तब उसने बलपूर्वक उस धेनु को छीन लिया। यह समाचार पाकर परशुरामजीने हैहयपूरी में जा उसके साथ युद्ध किया और अपने फरसे से उसका मस्तक काटकर रणभूमि में उसे मार गिराया। फिर वे कामधेनु को साथ लेकर अपने आश्रम पर लौट आये।

एक दिन परशुरामजी जब वन में गये हुए थे, कृतवीर्य के पुत्रों ने आकर अपने पिता के वैर का बदला लेने के लिए जमदग्नि मुनि को मार डाला। जब परशुरामजी लौट कर आए तो अपने पिता को मारा गया देख उनके मन में बड़ा क्रोध हुआ उन्होंने इक्कीस बार समस्त भूमण्डल के क्षेत्रियों का संहार किया । फिर कुरुक्षेत्र में पाँच कुण्ड बनाकर वहीं उन्होंने अपने पितरों का तर्पण किया और सारी पृथ्वी कश्यप मुनि को दान देकर,वे महेन्द्रपर्वत पर रहने लगे ॥१५- २१॥

वामन अवतार के कथा ( अग्निपुराण - चौथा अध्याय)

पूर्वकाल में देवता और असुरों में युद्ध हुआ । उस युद्ध में बलि आदि दैrयों ने देवताओं को परास्त करके उन्हें स्वर्ग से निकाल दिया । तब वे श्रीहरि के शरण में गये । भगवान् ने उन्हें अभयदान दिया कश्यप तथा अदिति की स्तुति से प्रसन्न हो, वे अदिति के गर्भ से वामन रूप में प्रकट हुए ।

उस समय दैत्यराज बलि गंगाद्वार में यज्ञ कर रहे थे । भगवान् उनके यज्ञ में गये और वहाँ यजमान की स्तुति गान करने लगे ॥ ४ -७॥

वामन के मुख से वेदों का पाठ सुनकर राजा बलि उन्हें वर देने को उदृत हो गये और शुक्राचार्य के मना करने पर भी बोले - "ब्रह्मन! आपकी जो इच्छा हो, मुझसे मांगें। मैं आपको वह वस्तु अवश्य दूंगा। वामन ने बलि से कहा - " मुझे अपने गुरु के लिए तीन पग भूमि की आवश्यकता है; वही दिजिए।'' बलि ने कहा - " अवश्य दूँगा।" तब संकल्प का जल हाथ में पड़ते ही भगवान् वामन " अवामन" हो गये। उन्होंने विराट रूप धारण कर लिया, और भूर्लोक, भुवर्लेक एवं स्वर्गलोक को अपने तीन पगों नाप लिया । श्रीहरि ने बलि को सुतललोक में भेज दिया, और त्रिलोकी का राज्य इन्द्र को दे डाला । इन्द्र ने देवताओं के साथ भगवान् श्रीहरि का स्तवन किया। वे तीनों लोकों के स्वामी होकर सुख से रहने लगे ।

बुधवार, 25 मार्च 2020

नृसिंह अवतार के कथा ( अग्निपुराण - चौथा अध्याय)

हिरण्याक्ष के एक भाई था, जो " हिरण्यकशिपू" के नाम से प्रसिद्ध था। उसने देवताओं के यज्ञ भाग अपने अधीन कर लिए और उन सबके अधिकार छीनकर वह स्वयं ही उसका उपभोग करने लगा। भगवान् नृसिंह रूप धारण करके उसके सहायक असुरों सहित उस दैत्य का वध किया। तrपश्चात सम्पूर्ण देवताओं को अपने - अपने पद पर प्रतिष्ठत कर दिया। उस समय देवताओं ने उन नृसिंह का स्तवन किया। 

वराह अवतार के कथा ( अग्निपुराण - चौथा अध्याय)

अग्निदेव कहते हैं - वशिष्ठ! पूर्वकाल में " हिरण्याक्ष" नामक दैत्य असुरों का राजा था। वह देवताओं को जीतकर स्वर्ण में रहने लगा। देवताओं ने भगवान विष्णु के पास जाकर उनकी स्तुति की। तब उन्होंने यज्ञवाराह रूप धारण किया और देवताओं के कण्टक रूप उस दानव को दैत्य सहित मारकर एवम् देवताओं आदि की रक्षा की । उसके बाद भगवान श्रीहरि अन्तर्धान हो गये॥ १- ५ ॥

समुद्र - मंथन, कूर्म तथा मोहिनी - अवतार की कथा (आग्निपुराण - तीसरा अध्याय)

अग्नि देव कहते हैं - पूर्वकाल की बात हैं, देवासुर - संग्राम में दैत्यों ने देवताओं को परास्त कर दिया । वे दुर्वासा के शाप से भी लक्ष्मी से रहित हो गए थे । तब सम्पूर्ण देवता क्षीरसागर में शयन करने वाले भगवान विष्णु के पास जाकर बोले -'' भगवन् ! आप देवनाओं की रक्षा कीजिए ।'' यह सुनकर श्रीहरिने ब्रह्मा आदि देवताओं से कहा -'' देवगण! तुमलोग क्षीरसमुद्र को मथने, अमृत प्राप्त करने और लक्ष्मी को पाने के लिए असुरों से सन्धि कर लेनी चाहिए । मैं तुमलोगों को अमृत का भागी बनाऊँगा और दैत्यों को उसे वञ्चित रखूँगा । मन्दराचल को मथानी और वासु की नाग को नेती बनाकर आलस्यरहित हो मेरी सहायता से क्षीरसागर का मन्थन करो ।'' भगवान् विष्णु एसा कह ने पर देवता दैत्यों के साथ संधि करके क्षीरसमुद्र पर आये । फिर तो उन्हें एक साथ मिलकर समुद्र - मंथन आरम्भ किया जिस ओर वासु कि नाग की पुंछ थी, उसी ओर देवता खड़े थे । दानव वासु कि नाग के निःश्वास से क्षीण हो रहे थे और देवताओं को भगवान् अपनी कृपा दृष्टि से परिपुष्ट कर रहे थे । समुद्र - मन्थनआरम्भ होने पर कोई आधार न मिलने से मन्दराचल पर्वत समुद्र में डुब गया ॥ १ -७॥
तब भगवान विष्णु ने कूर्म (कछुए) का रूप धारण करके मन्दराचल को अपनी पीठ पर रख लिया । फिर जब समुद्र मथा जाने लगा, तो उसके भीतर से हलाहल विष प्रकट हुआ । उसे भगवान शंकर ने अपने कण्ठ में धारण कर लिया । इससे कण्ठ में काला दाग पड़ जाने के कारण वे 'नीलकण्ठ' नाम से प्रसिद्ध हुए । तत्पश्चात समुद्र से वारुणी देवी, पारिजात वृक्ष, कौस्तुभमणि, गौएँ तथा दिव्य अप्सराएँ प्रकट हुईं। फिर लक्ष्मी देवी का प्रादुर्भाव हुआ । वे भगवान विष्णु को प्राप्त हुई। सम्पूर्ण देवताओं ने उनका दर्शन और स्तवन किया। इससे वे लक्ष्मीवान हो गये । तदनन्तर भगवान विष्णुके अंशभूत धन्वन्तरि, जो आयुर्वेद के प्रवर्तक हैं, हाथ में अमृत से भरा हुआ कलश लिए प्रकट हुए । दैत्यों ने उनके हाथ से अमृत छीन लिया और उसमें से आधा देवताओं देकर वे सब चलते बने। उनमें जम्भ आदि दैत्य प्रधान थे। उन्हें जाते देख भगवान् विष्णु ने स्त्री का रूप धारण किया। उस रुपवती स्त्री को देखकर दैत्य मोहित हो गये और बोले -' सुमुखि! तुम हमारी भार्या हो जाओ और यह अमृत लेकर हमें पिलाओ ।' ' बहुत अच्छा' कहकर भगवान् ने उनके हाथ से अमृत ले लिया और उसे देवताओं को पिला दिया । उस समय राहु चन्द्रमा का रूप धारण करके अमृत पीने लगा । तब सूर्य और चन्द्रमा उसके कपट वेष को प्रकट कर दिया ॥ ८ - १४ ॥
यह देख भगवान श्रीहरि ने चक्र से उसका मस्तक काट डाला । उसका सिर अलग हो गया और भुजाओंसहित धर अलग रह गया । फिर भगवान् को दया आई उन्होंने राहु को अमर कर दिया । तब ग्रहस्वरूप राहु भगवान् श्रीहरि से कहा -' इन सूर्य और चन्द्रमा को मेरे द्वारा अनेको बार ग्रहण लगेगा । उस समय समय संसार के लोग जो कुछ दान करें, वह सब अक्षय हो । भगवान् विष्णु ने 'तथास्तु' कहकर सम्पूर्ण देवताओं के साथ राहु की बात का अनुमोदन किया । इसके बाद भगवान् ने स्त्री रूप त्याग दिया; किंतु महादेवजी को भगवान् के उस रूप का पुनदर्शन करने की इच्छा हुई। अतः उन्होंने अनुरोध किया -' भगवन् आप अपने स्त्रीरूप का दर्शन करावें । महादेवजी की प्रार्थना से भगवान श्रीहरि ने उन्हें अपने स्त्रीरूप का दर्शन कराया । वे भगवान् की माया से एसे मोहित हो गए की पार्वतीजी को त्यागकर उस स्त्री के पीछे लग गए। उन्होंनें नग्न और उन्मत्त होकर मोहिनी के केश पकड़ लिए । मोहिनी अपने केशों को छुड़ा कर चल दी। उसे जाती देख महादेवजी भी उसके पीछे - पीछे दौड़ने लगे। उस समय पृथ्वी पर जहाँ - जहाँ भगवान् शंकर का वीर्य गिरा, वहाँ - वहाँ शिवलिंगों का क्षेत्र एवं सुवर्ण की खानें हो गई। तत्पश्चात ' यह माया है' - ऐसा जानकर भगवान् शंकर अपने स्वरूप में स्थित हुए। तब भगवान् श्रीहरि ने प्रकट होकर शिवजी से कहा - ' रूद्र तुमने मेरी माया को जीत लिया । पृथ्वी पर तुम्हारे शिवा दूसरा कोई ऐसा पुरुष नहीं है, जो मेरी इस माया को जीत सके ।'
भगवान् के प्रयत्न से दैत्यों को अमृत नहीं मिलने पाया; अतः देवताओं ने उन्हें युद्ध में मार गिराया। फिर देवता स्वर्ग में विराजमान हुए और दैत्य लोग पाताल में रहने लगे ॥१५-२३॥ 

मंगलवार, 24 मार्च 2020

मात्स्यावतार की कथा (अग्निपुराण - दूसरा अध्याय )

वशिष्ठजी ने कहा - अग्निदेव! आप सृष्टि आदि के कारणभूत भगवान विष्णु के मत्स्य आदि अवतारों का वर्णन किजिये। साथ ही ब्रह्मस्वरूप अग्निपुराण को भी सुनाइये, जिसे पुर्वकाल में आपने श्रीविष्णु भगवान के मुख से सुना था ।।१।।








अग्निदेव बोले - वशिष्ठ! सुनो, मैं श्रीहरि के मत्स्यावतार का वर्णन करता हूँ । अवतार- धारण का कार्य दुष्टों के विनाश और साधु - पुरुषों की रक्षा के लिए होता है | बीते हुए कल्प के अन्त में  "ब्राह्म" नामक नैमित्तिक प्रलय हुआ था । मुने! उस समय " भू " आदि लोक समुद्र के जल में डुब गये थे । प्रलय के पहले की बात है । वैवस्वत मनु भोग और मोक्ष की सिद्धि के लिए तपस्या कर रहे थे। एक दिन जब वे कृतमाला नदि में जल से पितरों का तर्पण कर रहे थे, उनकी अन्जलि के जल में एक बहुत छोटा- सा मत्स्य आ गया। राजा ने उसे जल में फेंक देने का विचार किया । तब मत्स्य ने कहा - 'महाराज मुझे जल में न फेंके । यहाँ ग्राह आदि जल - जन्तुओं से मुझे भय है ।' यह सुनकर मनु ने उसे अपके कलश के जल में डाल दिया । मत्स्य उसमें पड़ते ही बड़ा हो गया और पुनः मनु से कहा -' राजन् मुझे इससे बड़ा स्थान दो ।' उसकी यह बात सुनकर राजा ने उसे एक बड़े जलपात्र में डाल दिया । उसमें भी बड़ा होकर मत्स्य ने राजा से बोला - ' मनो! मुझे कोई विस्तृत स्थान दो।' तब उन्होंने पुनः उसे सरोवर के जल में डाला; किंतु वहाँ भी बढ़कर वह सरोवर के बराबर हो गया और बोला - ' मुझे इससे बड़ा स्थान दो ।' तब मनु ने उसे फिर समुद्र में ही ले जाकर डाल दिया । वहाँ वह मत्स्य क्षण भर में लाख योजन बडा हो गया । उस अदभुत मत्स्य को देखकर मनु को बडा विस्मय हुआ । वे बोले - 'आप कौन हैं? निश्चय ही आप भगवान् श्रीविष्णु जान पड़ते हैं । नारायण! आपको नमस्कार है । जनार्दन! आप किसलिए अपनी माया से मुझे मोहित कर रहे हैं ।।२-१०।।

मनु के एसा कहने पर सबके पालन में संलग्र रहने वाले मत्स्य रूप धारी भगवान् उनसे बोले -' राजन् ! मैं दुष्टों का नाश और जगत की रक्षा करने के लिए अवतीर्ण हुआ हूँ । आज से सातवें दिन समुद्र सम्पूर्ण जगत को डुबा देगा उस समय तुम्हारे पास नौक उपस्थित होगी । तुम उस पर सब प्रकार के बीज आदि रखकर बैठ जाना । सप्तर्षि भी तुम्हारे साथ रहेंगे। जब तक ब्रह्या की रात रहेगी, तबतक तुम उसी नाव पर विचरते रहोगे । नाव आने के बाद मैं भी इसी रूप में उपस्थित होऊँगा । उस समय तुम मेरे सिंग में महासर्पमयी रस्सी से उस नाव को बाँध देना । ऐसा कहकर भगवान मत्स्य अन्तर्धान हो गये और वैवस्वत मनु उनके बताये हुए समय की प्रतीक्षा करते हुए वहीं रहने लगे । जब नियत समय पर समुद्र अपनी सीमा लांघकर बढ़ने लगा, तब वे पूर्वोक्त नौकापर बैठ गये । उस समय एक सींग धारण करने सुवर्णमय मत्स्य भगवान का प्रादुर्भाव हुआ। उनका विशाल शरीर दस लाख योजन लंबा था। उनके सींग में नाव बांध कर राजा ने उसे 'मत्स्य' नामक पुराण का श्रवण किया, जो सब पापों का नाश करनेवाला है। मनु मत्स्य भगवान की नाना प्रकार के स्तोत्रों द्वारा स्तुति भी करते थे । प्रलय के अन्त में ब्रह्या जी से वेद को हर लेनेवाले ' हयग्रीव' नामक दानव का वध करके भगवान ने वेद मन्त्र आदि की रक्षा की। तत्पश्चात वाराहकल्प आने पर श्रीहरि ने कच्छप रूप धारण किया ॥११ - १७॥